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बचपन और स्क्रीन की दुनिया: बच्चों पर मोबाइल व टीवी का प्रभाव

 
बचपन और स्क्रीन की दुनिया:


आज के आधुनिक समय में मोबाइल और टीवी बच्चों के जीवन का सामान्य हिस्सा बनते जा रहे हैं। जहां एक ओर ये साधन ज्ञान और मनोरंजन का माध्यम हैं, वहीं दूसरी ओर इनका अत्यधिक उपयोग बच्चों के मानसिक, शारीरिक और भावनात्मक विकास पर गंभीर प्रभाव डाल सकता है। मनोविज्ञान इस विषय में स्पष्ट रूप से संतुलन और सावधानी की सलाह देता है।

मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, जन्म से लेकर 2 वर्ष तक के बच्चों को स्क्रीन (मोबाइल या टीवी) से पूरी तरह दूर रखना चाहिए, क्योंकि यह समय उनके मस्तिष्क के तीव्र विकास का होता है। इस अवस्था में बच्चे अपने आसपास के वातावरण, स्पर्श, ध्वनि और मानवीय संपर्क से सीखते हैं। यदि इस समय उन्हें स्क्रीन की आदत लग जाती है, तो उनके सीखने और समझने की क्षमता प्रभावित हो सकती है।

2 से 5 वर्ष तक के बच्चों के लिए भी स्क्रीन समय बहुत सीमित होना चाहिए—अधिकतम एक घंटा और वह भी माता-पिता की निगरानी में। 6 वर्ष के बाद भी बच्चों के लिए स्क्रीन समय संतुलित होना जरूरी है, ताकि उनके अध्ययन, खेल और सामाजिक जीवन पर नकारात्मक प्रभाव न पड़े।

मनोविज्ञान यह भी बताता है कि अधिक स्क्रीन टाइम से बच्चों का ध्यान (Attention Span) कम हो जाता है, जिससे वे पढ़ाई या अन्य गतिविधियों में लंबे समय तक ध्यान नहीं लगा पाते। इसके अलावा, बच्चों के व्यवहार में चिड़चिड़ापन, आक्रामकता और जिद्दीपन भी बढ़ सकता है। भाषा विकास पर भी इसका असर पड़ता है, क्योंकि मोबाइल देखने वाले बच्चे कम संवाद करते हैं और उनकी बोलने की क्षमता धीमी हो सकती है।

शारीरिक रूप से भी स्क्रीन का अत्यधिक उपयोग हानिकारक है। इससे आंखों में जलन, सूखापन, सिरदर्द और कम उम्र में चश्मा लगने जैसी समस्याएं बढ़ती हैं। साथ ही, लगातार बैठकर स्क्रीन देखने से बच्चों में मोटापा, नींद की कमी और शरीर में दर्द जैसी समस्याएं भी उत्पन्न हो सकती हैं।

ऐसी स्थिति में माता-पिता की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। सबसे पहले, उन्हें स्वयं एक अच्छा उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए, क्योंकि बच्चे वही सीखते हैं जो वे देखते हैं। घर में स्क्रीन उपयोग के स्पष्ट नियम बनाए जाने चाहिए, जैसे भोजन के समय या सोने से पहले मोबाइल का उपयोग न करना। बच्चों को खेलकूद, पढ़ाई, चित्रकला और पारिवारिक गतिविधियों में व्यस्त रखना चाहिए, ताकि उनका ध्यान स्वाभाविक रूप से स्क्रीन से हटे।

इसके साथ ही, यह भी जरूरी है कि बच्चों को दिखाए जाने वाले कंटेंट की गुणवत्ता पर ध्यान दिया जाए और उनके साथ संवाद बनाए रखा जाए, ताकि उनका भावनात्मक विकास भी सही दिशा में हो सके।

अंततः, मनोविज्ञान यह नहीं कहता कि तकनीक पूरी तरह गलत है, बल्कि यह कहता है कि उसका संतुलित और सीमित उपयोग ही बच्चों के लिए लाभकारी है। सही मार्गदर्शन और समय पर नियंत्रण से ही बच्चों का बचपन सुरक्षित और स्वस्थ बनाया जा सकता है।

कंचन मेहता दिशा, सिरसा
मनोविज्ञान में स्नातकोत्तर