यमुना–सरस्वती–घग्गर लिंक: उत्तर भारत की जल सुरक्षा का व्यवहारिक मार्ग हथिनीकुंड से राजस्थान तक पाइपलाइन संभव है, तो यमुना को घग्गर से जोड़ने की व्यवहार्यता का अध्ययन क्यों नहीं?

विशेष संवाद
सुरेंद्र भाटिया (प्रधान संपादक, पल-पल सिरसा) एवं वरिष्ठ पत्रकार व चिंतक गुरजीत मान के बीच विस्तृत चर्चा पर आधारित
सिरसा। उत्तर भारत आज जल संकट के ऐसे दौर से गुजर रहा है, जहां एक ओर मानसून के दौरान नदियों का करोड़ों घनमीटर अतिरिक्त जल बिना समुचित उपयोग के आगे बह जाता है, वहीं दूसरी ओर हरियाणा, पंजाब और राजस्थान के अनेक क्षेत्र वर्ष के अधिकांश समय पेयजल और सिंचाई के लिए संघर्ष करते हैं। बढ़ती जनसंख्या, गिरते भूजल स्तर, जलवायु परिवर्तन और कृषि की बढ़ती आवश्यकताओं को देखते हुए अब जल प्रबंधन के दीर्घकालिक एवं वैज्ञानिक विकल्पों पर गंभीरता से विचार करना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता बन चुका है।
हाल ही में हरियाणा और राजस्थान के बीच हुए समझौते के अंतर्गत हथिनीकुंड बैराज से पाइपलाइन के माध्यम से राजस्थान तक पानी पहुंचाने की प्रस्तावित योजना ने पूरे उत्तर भारत में जल प्रबंधन को लेकर नई चर्चा शुरू कर दी है। इसी विषय पर पल-पल के प्रधान संपादक सुरेंद्र भाटिया और वरिष्ठ पत्रकार एवं चिंतक गुरजीत मान के बीच विस्तृत संवाद हुआ, जिसमें उत्तर भारत की जल सुरक्षा के लिए यमुना–सरस्वती–घग्गर लिंक की संभावनाओं पर गंभीर विचार-विमर्श किया गया।
300 किलोमीटर पाइपलाइन संभव है, तो 35 किलोमीटर नदी लिंक का अध्ययन क्यों नहीं?
वरिष्ठ पत्रकार गुरजीत मान का कहना है कि यदि सरकार हथिनीकुंड बैराज से राजस्थान तक सैकड़ों किलोमीटर लंबी पाइपलाइन बिछाने की योजना पर गंभीरता से काम कर सकती है, तो भारत रत्न पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के "नदियों को जोड़ो" विजन की भावना के अनुरूप यमुना और घग्गर नदी तंत्र को जोड़ने की संभावनाओं का भी वैज्ञानिक परीक्षण कराया जाना चाहिए।
उन्होंने बताया कि आदि बद्री वह क्षेत्र माना जाता है, जहां यमुना और प्राचीन सरस्वती नदी का उद्गम क्षेत्र एक-दूसरे के अपेक्षाकृत निकट है। विभिन्न जल विशेषज्ञों ने समय-समय पर इस दूरी को अलग-अलग बताया है। कुछ विशेषज्ञों के अनुसार लगभग 18 किलोमीटर नई नहर बनाकर दोनों जल प्रणालियों को जोड़ा जा सकता है, जबकि अन्य विशेषज्ञ इस दूरी को लगभग 35 से 40 किलोमीटर मानते हैं।
गुरजीत मान का कहना है कि वास्तविक दूरी चाहे जो भी हो, उसका अंतिम निर्धारण केवल विस्तृत वैज्ञानिक सर्वेक्षण और व्यवहार्यता अध्ययन के बाद ही संभव है। यदि अध्ययन इस परियोजना को तकनीकी और पर्यावरणीय दृष्टि से उपयुक्त सिद्ध करता है, तो यह सैकड़ों किलोमीटर लंबी पाइपलाइन की तुलना में अधिक प्राकृतिक, टिकाऊ और दीर्घकालिक समाधान सिद्ध हो सकता है।
सरस्वती बन सकती है प्राकृतिक जलवाहिनी
चर्चा के दौरान यह विचार भी सामने आया कि यदि यमुना के अतिरिक्त एवं नियंत्रित जल को पुनर्जीवित सरस्वती नदी के मार्ग से घग्गर नदी तक पहुंचाया जाए, तो इससे केवल जल स्थानांतरण ही नहीं होगा, बल्कि एक प्राचीन नदी तंत्र को भी नया जीवन मिल सकता है।
हरियाणा सरकार पहले से ही सरस्वती नदी के पुनर्जीवन से जुड़े अनेक कार्य कर रही है। यदि भविष्य में इन प्रयासों को यमुना से वैज्ञानिक आधार पर जोड़ा जा सके, तो यह उत्तर भारत के जल प्रबंधन की दिशा में एक महत्वपूर्ण मॉडल बन सकता है।
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घग्गर नदी को बारहमासी बनाने की संभावना
गुरजीत मान का मानना है कि वर्तमान समय में घग्गर नदी का अधिकांश प्रवाह वर्षा पर निर्भर है। बरसात के कुछ महीनों को छोड़ दें तो वर्ष के बड़े हिस्से में नदी या तो लगभग सूखी रहती है अथवा उसमें बहुत सीमित जल प्रवाह दिखाई देता है। यदि यमुना के अतिरिक्त एवं नियंत्रित जल को वैज्ञानिक योजना के अंतर्गत सरस्वती नदी के पुनर्जीवित मार्ग से घग्गर तक पहुंचाया जाए, तो नदी में लंबे समय तक जल प्रवाह बनाए रखने की संभावना विकसित हो सकती है।
उन्होंने कहा कि इसके साथ-साथ घग्गर में गिरने वाले सीवरेज और औद्योगिक नालों का पूर्ण उपचार, आधुनिक सीवेज ट्रीटमेंट प्लांटों की स्थापना तथा प्रदूषण नियंत्रण के प्रभावी उपाय भी समान रूप से आवश्यक होंगे। केवल पानी पहुंचा देना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि नदी को स्वच्छ बनाए रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण होगा। स्वच्छ और प्रवाहमान नदी ही कृषि, पर्यावरण और पेयजल सुरक्षा के लिए दीर्घकालिक आधार बन सकती है।
हरियाणा के अनेक जिलों को मिल सकता है लाभ
चर्चा के दौरान सुरेंद्र भाटिया और गुरजीत मान ने कहा कि यदि विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन के बाद यह परियोजना व्यवहारिक सिद्ध होती है, तो इसका लाभ हरियाणा के अनेक जिलों को मिल सकता है। विशेष रूप से यमुनानगर, कुरुक्षेत्र, करनाल, कैथल, जींद, फतेहाबाद, हिसार और सिरसा जैसे जिलों में भूजल स्तर सुधारने, सिंचाई सुविधाओं का विस्तार करने तथा पेयजल उपलब्धता बढ़ाने में सहायता मिल सकती है।
इसी प्रकार पंजाब के सीमावर्ती क्षेत्रों और राजस्थान के श्रीगंगानगर तथा हनुमानगढ़ जैसे जिलों के लिए भी भविष्य में इस प्राकृतिक जल तंत्र की उपयोगिता का वैज्ञानिक अध्ययन किया जा सकता है। यदि नदी तंत्र में पर्याप्त एवं नियंत्रित जल प्रवाह सुनिश्चित हो सके, तो इसका लाभ केवल कृषि तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पर्यावरण संरक्षण, भूजल पुनर्भरण, जैव विविधता तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मिलेगा।
राजस्थान के लिए भी बन सकता है प्राकृतिक विकल्प
सुरेंद्र भाटिया ने चर्चा के दौरान कहा कि यदि भविष्य में घग्गर नदी में पर्याप्त जल प्रवाह सुनिश्चित किया जा सके, तो राजस्थान के कुछ क्षेत्रों तक भी इसी प्राकृतिक नदी तंत्र के माध्यम से पानी पहुंचाने की संभावनाओं का अध्ययन किया जाना चाहिए। इससे अत्यधिक लंबी पाइपलाइन परियोजनाओं पर निर्भरता कम हो सकती है तथा प्राकृतिक जलधाराओं का अधिक प्रभावी उपयोग संभव हो सकता है।
दोनों वरिष्ठ पत्रकारों का मत था कि नदी आधारित समाधान दीर्घकाल में अधिक टिकाऊ हो सकते हैं, बशर्ते उनका निर्माण वैज्ञानिक अध्ययन, पर्यावरणीय संतुलन और जल उपलब्धता के वास्तविक आंकड़ों के आधार पर किया जाए।

