₹2700 की दवा पर ₹27 हजार की कीमत क्यों? कैंसर जैसी गंभीर बीमारी के इलाज में दवा की कीमत और अस्पतालों की पारदर्शिता पर उठते सवाल

-डॉ. प्रियंका सौरभ
कैंसर का नाम सुनते ही किसी परिवार के सामने केवल बीमारी की चिंता नहीं आती, बल्कि इलाज के खर्च का भय भी खड़ा हो जाता है। जांच, ऑपरेशन, कीमोथेरेपी, रेडियोथेरेपी और जीवनरक्षक दवाओं का खर्च पहले ही सामान्य परिवार की आर्थिक क्षमता को चुनौती देता है। ऐसे में यदि किसी आवश्यक दवा की कीमत उसके खुदरा विक्रेता तक पहुंचने वाली कीमत से कई गुना अधिक हो, तो सवाल केवल बाजार का नहीं रहता, बल्कि स्वास्थ्य-व्यवस्था की संवेदनशीलता, पारदर्शिता और नियमन का भी बन जाता है।
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष कैंसर की एक दवा का उदाहरण सामने आया, जिसकी कीमत खुदरा विक्रेता के लिए लगभग 2,700 रुपये बताई गई, जबकि उसकी अधिकतम खुदरा कीमत यानी एमआरपी 27,000 रुपये थी। यानी दोनों के बीच करीब दस गुना का अंतर। 22 सितंबर की सुनवाई में न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने इस अंतर पर बेहद कड़ी टिप्पणी की थी। 29 सितंबर को हुई अगली सुनवाई में भी अदालत ने इसी सवाल को आगे बढ़ाते हुए केंद्र से पूछा कि दवाओं की कीमत में इतना बड़ा अंतर क्यों हो और क्या दवाओं के लिए एक समान सीमा निर्धारित नहीं की जा सकती। अदालत ने 16 प्रतिशत के एक समान मार्जिन की संभावना पर भी सवाल रखा, लेकिन यह ध्यान रखना जरूरी है कि यह अदालत की ओर से पूछा गया सवाल था, अंतिम आदेश या लागू नियम नहीं। मामले की अगली सुनवाई 12 अक्टूबर 2026 को सूचीबद्ध की गई है।
यह प्रकरण इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां सवाल केवल 27 हजार रुपये की एक दवा का नहीं है। सवाल यह है कि जीवन बचाने वाली दवाओं के मूल्य निर्धारण की पूरी शृंखला कितनी पारदर्शी है। निर्माता से दवा निकलने के बाद वितरक, थोक विक्रेता, खुदरा विक्रेता और अस्पताल तक पहुंचते-पहुंचते कीमत किस आधार पर बदलती है? यदि किसी दवा का मूल्य 2,700 रुपये है तो उसकी एमआरपी दस गुना अधिक तय करने का आर्थिक औचित्य क्या है? मरीज के पास इन कीमतों को समझने और तुलना करने का कितना अवसर है?
भारत में दवाओं की कीमत नियंत्रित करने के लिए Drugs (Prices Control) Order, 2013 यानी DPCO का ढांचा मौजूद है। आवश्यक दवाओं की सूची में शामिल निर्धारित दवाओं के लिए सरकार अधिकतम कीमत तय करती है और राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण यानी NPPA इसकी भूमिका निभाता है। लेकिन सभी दवाएं समान तरीके से मूल्य नियंत्रण के दायरे में नहीं आतीं। यही वह क्षेत्र है जहां कीमत निर्धारण की पारदर्शिता और मरीज के हित के बीच संतुलन का प्रश्न उठता है।
सुप्रीम कोर्ट की चिंता का एक दूसरा पहलू निजी अस्पतालों की इन-हाउस फार्मेसी से जुड़ा है। यदि मरीज को अस्पताल यह कहे कि उपचार के दौरान दवा केवल अस्पताल की निर्धारित फार्मेसी से ही खरीदनी होगी, तो मरीज के पास कीमत की तुलना करने का विकल्प सीमित हो जाता है। बीमारी की गंभीरता और डॉक्टर पर निर्भरता के कारण मरीज पहले ही कमजोर स्थिति में होता है। ऐसे समय में उसे दवा के दूसरे स्रोत या कम कीमत वाले वैकल्पिक विकल्प की जानकारी न मिलना उपभोक्ता अधिकारों से जुड़ा गंभीर प्रश्न है।
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना होगा—हर निजी अस्पताल या हर दवा कंपनी को दोषी मान लेना उचित नहीं होगा। दवा के मूल्य में अनुसंधान, उत्पादन, गुणवत्ता नियंत्रण, परिवहन, भंडारण, वितरण और अन्य लागतें भी होती हैं। लेकिन इन लागतों के नाम पर कीमतों में असामान्य अंतर हो तो उसका स्पष्ट हिसाब और नियामकीय जांच आवश्यक हो जाती है। सुप्रीम कोर्ट में सरकार की ओर से भी यह संकेत दिया गया कि व्यवस्था में सुधार की गुंजाइश पर विचार किया जा सकता है।
इस पूरे मामले में सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं का पहलू भी महत्वपूर्ण है। यदि किसी मरीज का इलाज सरकारी योजना के अंतर्गत हो रहा है और दवाओं का भुगतान अंततः सार्वजनिक धन से होता है, तो अत्यधिक कीमत का असर केवल मरीज पर नहीं बल्कि करदाताओं पर भी पड़ सकता है। अदालत ने इसी संदर्भ में सरकारी प्रतिपूर्ति और अस्पतालों द्वारा दवाएं उपलब्ध कराने की व्यवस्था पर सवाल उठाए।
भारत में कैंसररोधी दवाओं का बाजार भी लगातार बढ़ा है। फार्मास्यूटिकल्स विभाग की 2025-26 की वार्षिक रिपोर्ट के हवाले से उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, 2024-25 में भारत में कैंसर-रोधी दवाओं की बिक्री लगभग 5,281 करोड़ रुपये रही, जबकि 2021-22 में यह करीब 3,382 करोड़ रुपये थी। यह वृद्धि अपने आप में गलत या अनुचित नहीं है, क्योंकि कैंसर के उपचार की मांग, रोग की पहचान और उपचार के विकल्पों में बदलाव भी बाजार को प्रभावित करते हैं। लेकिन बढ़ते बाजार के साथ मरीजों के हितों की निगरानी भी उतनी ही मजबूत होनी चाहिए।
सबसे जरूरी सुधार पारदर्शिता का है। मरीज को दवा की वास्तविक कीमत, एमआरपी, उपलब्ध वैकल्पिक ब्रांड और अस्पताल द्वारा लगाए जा रहे अतिरिक्त शुल्क की स्पष्ट जानकारी मिलनी चाहिए। अस्पतालों को दवा खरीद की बाध्यता के मामलों में स्पष्ट नीति रखनी चाहिए। यदि किसी कारण से अस्पताल की फार्मेसी से ही दवा लेना जरूरी है तो उसका कारण मरीज को बताया जाना चाहिए। सरकारी योजनाओं के तहत दवाओं की कीमतों और प्रतिपूर्ति की नियमित ऑडिट व्यवस्था भी मजबूत होनी चाहिए।
सस्ती दवा का अर्थ केवल सस्ता ब्रांड उपलब्ध कराना नहीं है। दवा की गुणवत्ता, प्रभावशीलता और विश्वसनीयता भी सुनिश्चित करनी होगी। जेनेरिक दवाओं को बढ़ावा देना उपयोगी हो सकता है, लेकिन डॉक्टर, मरीज और फार्मासिस्ट के बीच जिम्मेदार सूचना-व्यवस्था भी जरूरी है। मरीज को यह भरोसा होना चाहिए कि कम कीमत का विकल्प घटिया या नकली दवा नहीं है।
स्वास्थ्य सेवा को केवल बाजार की सामान्य वस्तु मानकर नहीं देखा जा सकता। बीमारी के समय व्यक्ति की आर्थिक क्षमता और निर्णय लेने की स्वतंत्रता दोनों सीमित हो जाती हैं। इसलिए जीवनरक्षक दवाओं की कीमतों में उचित संतुलन लोकतांत्रिक कल्याणकारी व्यवस्था की जिम्मेदारी है।
₹2,700 और ₹27,000 के बीच का अंतर केवल दस गुना कीमत का अंतर नहीं है। किसी गरीब परिवार के लिए यही अंतर इलाज जारी रखने और इलाज छोड़ देने के बीच का अंतर बन सकता है। किसी मध्यमवर्गीय परिवार के लिए यही अंतर बचत समाप्त होने, कर्ज लेने या संपत्ति बेचने का कारण बन सकता है। इसलिए दवा की कीमत तय करने वाली व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जिसमें मुनाफा कमाने का अधिकार और मरीज के जीवन का अधिकार—दोनों के बीच स्पष्ट और न्यायसंगत संतुलन हो।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों ने इस बहस को देश के सामने फिर से ला खड़ा किया है। अब जरूरत केवल तीखी टिप्पणियों की नहीं, बल्कि ऐसी स्पष्ट नीति की है जिसमें कीमत निर्धारण की प्रक्रिया पारदर्शी हो, अस्पतालों की फार्मेसी व्यवस्था पर प्रभावी निगरानी हो, सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं में सार्वजनिक धन का विवेकपूर्ण उपयोग हो और मरीज को उचित कीमत पर गुणवत्तापूर्ण दवा मिल सके।
दवा बीमारी से लड़ने का साधन है, मरीज की मजबूरी से मुनाफा कमाने का माध्यम नहीं।

