जब जीवन बोझ लगने लगे: युवाओं की खामोश चीख और गीता का उत्तर

कोटा की कोचिंग गलियों से लेकर कॉरपोरेट के चमचमाते दफ्तरों तक सब जगह एक सन्नाटा पसरा है। अच्छे नंबर, अच्छी नौकरी, अच्छा जीवन ; यह सब कुछ पाने की दौड़ में युवा खुद को ही खो रहा है और जब भीतर से आवाज़ आती है,“अब और नहीं…” तो समाज अक्सर कह देता है, “मजबूत बनो!” परंतु सच यह है कि यह “कमज़ोरी” नहीं, यह दिशाहीनता है।
युद्धभूमि में खड़ा अर्जुन तो यही कह रहा था,
“मेरे हाथ काँप रहे हैं, मन भ्रमित है, मैं लड़ नहीं सकता…” यह वही मानसिक स्थिति है, जिसे आज हम डिप्रेशन और एंग्जायटी के नाम से जानते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि तब संवाद हुआ, आज अक्सर सन्नाटा होता है।तब कृष्ण ने अर्जुन से कहा,”भागो मत, समझो।” यही बात हमें पॉपुलर फ़िल्म “डियर ज़िंदगी”में भी दिखती है।उसकी नायिका कायरा, जो बाहर से सफल दिखती है, भीतर से बिखरी हुई है।वह भागती है; रिश्तों से, फैसलों से, खुद से लेकिन जब वह अपने मन की गांठें खोलना शुरू करती है, तो उसे समझ आता है कि समस्या जीवन में नहीं, जीवन को देखने के नजरिए में है।
पहली समझ : तुम परिणाम नहीं हो;
आज का युवा खुद को “रैंक” और “रिज़ल्ट” में मापता है।एक असफलता आती है, और लगता है कि सब खत्म।पर गीता कहती है,
“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।”
अर्थ साफ है कि तुम्हारा अधिकार प्रयास पर है, परिणाम पर नहीं। यह कोई आदर्शवादी उपदेश नहीं, यह मानसिक स्वतंत्रता का सूत्र है। जब हमारा ध्यान “क्या मिलेगा?” से हटकर “मैं क्या कर सकता हूँ?” पर आता है तब मन हल्का होने लगता है। ठीक वैसे ही जैसे फ़िल्म “छिछोरे” में दिखाया गया कि जहाँ “लूज़र” कहलाने का डर एक युवा को आत्महत्या की कगार तक ले जाता है।पर कहानी हमें यह सिखाती है,”केवल किसी चीज़ में हार जाना ही जीवन हार जाना नहीं होता।”
दूसरी समझ : यह क्षण स्थायी नहीं है;
आत्महत्या का विचार अक्सर एक क्षणिक अंधेरा होता है।पर हम उसी क्षण को स्थायी निर्णय बना देते हैं।गीता कहती है,” सुख-दुःख, लाभ-हानि ये सब बदलते रहते हैं।
जो आज असहनीय लग रहा है,वही कल एक अनुभव बन सकता है। बॉलीवुड फ़िल्म “तमाशा” का वेद भी तो इसी संघर्ष से गुजरता है ।वह बाहरी दुनिया की उम्मीदों में जीते-जीते अपनी असली पहचान भूल जाता है और जब वह खुद को पहचानता है, तब जीवन बोझ नहीं, अभिव्यक्ति बन जाता है।
तीसरी समझ : तुम्हारा जीवन किसी एक असफलता से बड़ा है; युवाओं में एक खतरनाक सोच घर कर गई है कि,“अगर मैं यहाँ हार गया, तो मैं कहीं का नहीं रहा।” गीता इस भ्रम को तोड़ते हुए बताती है कि तुम्हारी पहचान तुम्हारे स्वधर्म से है, किसी एक रिज़ल्ट से नहीं।हर व्यक्ति का एक अलग रास्ता है और तुलना उस रास्ते की सबसे बड़ी दुश्मन है।तुम्हारी डिविनिटी तुम्हारी है और मेरी डिविनिटी मेरी ।
चौथी समझ : भागना समाधान नहीं है;
अर्जुन भी भागना चाहता था।वह कहता है,“मैं युद्ध नहीं करूँगा।” कृष्ण उसे रोकते हैं
क्योंकि भागना समस्या को खत्म नहीं करता,
वह केवल उसे स्थगित करता है।आज का युवा भी जब हारता है तो वह जीवन से ही भागने की सोचने लगता है।पर गीता कहती है,”समझो, संभलो और फिर आगे बढ़ो।
पाँचवी समझ: समाधान क्या है?: संवाद, समत्व और सहारा;
गीता का संदेश अकेले खड़े रहने का नहीं है
बल्कि संतुलन और समर्थन का है।अपने मन की बात कहो; चाहे दोस्त से, परिवार से या किसी विशेषज्ञ से मदद लें; काउंसलर या हेल्पलाइन; सबसे आवश्यक “अकेले मत रहें “खुद को तुलना की आग से बाहर निकालो। छोटे-छोटे कर्मों में अर्थ खोजो और सबसे जरूरी है कि खुद को एक असफलता की सजा मत दो।गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद का कहना है कि यह जीवन एक परीक्षा नहीं, एक यात्रा है और हर यात्रा में पड़ाव आते हैं , ठहराव आते हैं, अटकाव आते हैं ,भटकाव आते हैं, चुनाव आते हैं, दबाव आते हैं, बिखराव भी आते हैं लेकिन बदलाव में स्वाभाव न बदले तो वह यात्रा जादुई यात्रा बन जाती है ।जब सब कुछ खत्म होता हुआ लगे तो याद रखो कि
तुम्हारे भीतर अभी भी वह शक्ति है जो एक नए अध्याय की शुरुआत कर सकती है
क्योंकि गीता सिर्फ यह नहीं सिखाती कि कैसे जिया जाए, वह यह भी सिखाती है कि
जब जीने का मन न हो, तब भी क्यों जिया जाए।गीता कोई ग्रंथ नहीं , जीने का अंदाज़ है यह।हर टूटन के बाद भी, खुद से मिलने का राज़ है यह ।

