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श्री ब्रह्मर्षि आश्रम तिरुपति में अष्ट लक्ष्मी महायज्ञ के तीसरे दिन विजय अष्ट लक्ष्मी पूजा, गुरुदेव ने प्रवचनों से बरसाई भक्तों पर अमृत वर्षा ​​​​​​​

 
 श्री ब्रह्मर्षि आश्रम तिरुपति में अष्ट लक्ष्मी महायज्ञ के तीसरे दिन विजय अष्ट लक्ष्मी पूजा,  गुरुदेव ने प्रवचनों से बरसाई भक्तों पर अमृत वर्षा ​​​​​​​
  तिरुपति, 23 दिसंबर। श्री सिद्धेश्वर तीर्थ स्थित श्री ब्रह्मर्षि आश्रम, तिरुपति में सिद्धगुरु श्री सिद्धेश्वर ब्रह्मर्षि गुरुदेव की दिव्य उपस्थिति में चल रहे आठ दिवसीय अष्ट लक्ष्मी महायज्ञ के तीसरे दिन विजय अष्ट लक्ष्मी पूजा श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक वातावरण में सम्पन्न हुई। इस पावन अवसर पर देश-विदेश से बड़ी संख्या में गुरुभक्त आश्रम पहुंचे और पूजा-अर्चना का पुण्य लाभ प्राप्त किया।

आश्रम के आचार्य पंडित श्री श्रीनिवास श्रीमाली के नेतृत्व में विद्वान ब्राह्मणों द्वारा विधिवत रूप से विजया लक्ष्मी की पूजा कराई गई। इस दौरान आचार्य श्रीमाली ने पूजा की विधि, महत्व और उससे प्राप्त होने वाले आध्यात्मिक व सांसारिक लाभों के बारे में श्रद्धालुओं को विस्तार से बताया। उन्होंने कहा कि विजया लक्ष्मी की उपासना से जीवन में सकारात्मकता, आत्मबल और धर्म के मार्ग पर विजय प्राप्त होती है। 
महायज्ञ के अंतर्गत ब्रह्म मुहूर्त की पूजा भी होती है। इस समय की गई  पूजा का भी विशेष महत्व बताया गया। आचार्य ने कहा कि ब्रह्म मुहूर्त में की गई साधना और पूजा का प्रभाव अत्यंत सकारात्मक होता है, साधक को एक अतिरिक्त ऊर्जा प्रदान करता है, जिससे साधक को अलग अनुभूति और मानसिक शांति प्राप्त होती है। इस दौरान पूरा आश्रम वातावरण मंत्रोच्चार, धूप-दीप और भक्ति भाव से ओतप्रोत रहा।
महायज्ञ के दौरान सिद्धगुरु श्री सिद्धेश्वर ब्रह्मर्षि गुरुदेव ने उपस्थित भक्तों को आध्यात्मिक संदेश देते हुए कहा कि मनुष्य को अपने विचारों और कर्मों पर विशेष ध्यान देना चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि तुम किसी के लिए अच्छा सोचते हो, तो उसका फल तुम्हें भी अवश्य मिलता है। और यदि तुम बुरा करोगे, तो उसका प्रभाव तुम्हारे जीवन पर जरूर पड़ेगा।
गुरुदेव ने संगति के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जीवन में सभी से मिलना-जुलना आवश्यक है, लेकिन आत्मिक उन्नति के लिए अच्छे और सत्संगी लोगों से जुड़ाव रखना अत्यंत जरूरी है। उन्होंने कहा कि सामाजिक सेवा एक श्रेष्ठ कार्य है, लेकिन भक्ति उससे अलग और ऊँचा मार्ग है। त्याग, तप और भक्ति के बिना आत्मा की मुक्ति संभव नहीं है। आत्मा की शुद्धि और भीतर के प्रकाश को जाग्रत करने के लिए मनुष्य को भक्ति के मार्ग पर चलना होगा।
उन्होंने परधर्म के साथ-साथ स्वधर्म के पालन की बात कहते हुए गौतम बुद्ध का उदाहरण दिया और कहा कि बुद्ध ने अच्छे कर्मों और साधना से बोधि प्राप्त की और संसार को उसका मार्ग दिखाया। यदि मनुष्य सच में ऊपर उठना चाहता है, तो उसे स्वयं को इतना शुद्ध और उत्तम बनाना होगा कि वह भगवान को प्राप्त कर सके या अपने भीतर ही भगवान का अनुभव कर सके।
गुरुदेव ने कहा कि मनुष्य अच्छा होगा तो समाज अच्छा होगा, समाज अच्छा होगा तो राष्ट्र अच्छा होगा और राष्ट्र अच्छा होगा तो विश्व अच्छा होगा।” उन्होंने अच्छे संस्कार, सकारात्मक सोच और चरित्र निर्माण को जीवन की सबसे बड़ी साधना बताया।
जीवन में सफलता की परिभाषा बताते हुए गुरुदेव ने कहा कि सफलता का अर्थ केवल धन, पद या शक्ति नहीं है। वास्तविक सफलता यह है कि आपके होने से यह संसार कितना सुंदर बनता है। यह संसार आपके शरीर से शुरू होकर परिवार, समाज, राष्ट्र और अंत में पूरे विश्व तक फैला हुआ है। यदि आपके विचार और कर्म इस संसार को बेहतर बनाते हैं, तो वही आपकी सच्ची सफलता है।
पूरे कार्यक्रम के दौरान आश्रम परिसर भक्ति, शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा से ओत-प्रोत रहा। श्रद्धालुओं ने गुरुदेव के वचनों को जीवन में अपनाने का संकल्प लिया और अष्ट लक्ष्मी महायज्ञ को आत्मिक शांति और प्रेरणा का स्रोत बताया।