आज काम है, कल का पता नहीं

अस्थायी कार्य आधारित अर्थव्यवस्था का चमकता और चिंताजनक चेहरा
काम की आज़ादी के साथ भविष्य की सुरक्षा भी जरूरी
लेखिका : हीना भाटिया
वाणिज्य में स्नातकोत्तर (अर्थशास्त्र) | आरंभ कॉमर्स अकादमी, सिरसा
रोजगार की दुनिया तेजी से बदल रही है। कभी नौकरी का अर्थ निश्चित कार्यालय, तय समय और हर महीने मिलने वाला वेतन माना जाता था, लेकिन डिजिटल तकनीक ने इस परिभाषा को बदल दिया है। आज लाखों लोग मोबाइल के माध्यम से काम शुरू करते हैं। सामान पहुंचाने वाले कर्मचारी, टैक्सी चालक, स्वतंत्र रूप से काम करने वाले पेशेवर, ऑनलाइन शिक्षक, चित्र एवं रूपरेखा तैयार करने वाले विशेषज्ञ और सामग्री लेखक इस नई अस्थायी कार्य आधारित अर्थव्यवस्था का हिस्सा हैं।
इस व्यवस्था में व्यक्ति को स्थायी पद के बजाय किसी कार्य, परियोजना, यात्रा, सामान पहुंचाने या अन्य सेवा के आधार पर भुगतान मिलता है। नीति आयोग के आकलन के अनुसार भारत में वर्ष 2020-21 में लगभग 77 लाख अस्थायी कार्यकर्ता थे और वर्ष 2029-30 तक उनकी संख्या लगभग 2 करोड़ 35 लाख तक पहुंचने का अनुमान लगाया गया था। यह बदलाव भारतीय श्रम बाजार में डिजिटल माध्यमों की बढ़ती भूमिका को दर्शाता है।
इस प्रकार के काम का सबसे बड़ा आकर्षण लचीलापन है। कामगार अपनी सुविधा के अनुसार काम कर सकता है और कई मामलों में एक से अधिक माध्यमों से आय अर्जित कर सकता है। व्यवसायों को भी मांग के अनुसार कामगार उपलब्ध होने का लाभ मिलता है, जबकि उपभोक्ताओं को तेज और सुविधाजनक सेवाएं मिलती हैं।
लेकिन इस चमकदार तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। इस व्यवस्था में कमाई हमेशा निश्चित नहीं होती। मान लीजिए किसी सामान पहुंचाने वाले कर्मचारी ने दिनभर में 1,000 रुपये कमाए। पेट्रोल, वाहन के रखरखाव, मोबाइल इंटरनेट और अन्य खर्च निकालने के बाद उसकी वास्तविक आय काफी कम हो सकती है। बीमारी, दुर्घटना अथवा पर्याप्त काम न मिलने की स्थिति में आय रुकने का खतरा भी बना रहता है।
यही इस नई अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा आर्थिक द्वंद्व है—लचीलापन बनाम सुरक्षा। अर्थात काम करने की स्वतंत्रता के साथ कामगार की आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जाए?
सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न सामाजिक सुरक्षा का है। बीमारी, दुर्घटना, मातृत्व और वृद्धावस्था जैसी परिस्थितियों में अस्थायी कामगारों को पर्याप्त सुरक्षा देना आवश्यक है। चुनौती ऐसी व्यवस्था विकसित करने की है, जो कामगार को संरक्षण भी दे और काम के लचीलेपन को भी बनाए रखे।
अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता भी रोजगार की इस नई व्यवस्था को प्रभावित कर रही है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता एक ओर नए डिजिटल रोजगार पैदा कर सकती है, तो दूसरी ओर लेखन, चित्र निर्माण और आंकड़ों से जुड़े कुछ कार्यों को स्वचालित भी कर सकती है। इसलिए भविष्य में केवल रोजगार प्राप्त करना पर्याप्त नहीं होगा। कामगारों को लगातार नई तकनीक और नए कौशल सीखने होंगे। इस प्रकार रोजगार सुरक्षा के साथ कौशल सुरक्षा का महत्व भी बढ़ेगा।
अस्थायी कार्य आधारित अर्थव्यवस्था को केवल “रोजगार का भविष्य” मानकर उत्सव मनाना उचित नहीं है और न ही इसे पूरी तरह शोषण का नया रूप मानकर खारिज किया जाना चाहिए। आवश्यकता ऐसे संतुलित मॉडल की है, जिसमें रोजगार के नए अवसर, तकनीकी नवाचार और काम की स्वतंत्रता बनी रहे, लेकिन कामगार की आय, सम्मान और सामाजिक सुरक्षा भी सुनिश्चित हो।
आखिर असली सवाल यह नहीं है कि “भविष्य में काम कैसा होगा?” बल्कि यह है कि “भविष्य में काम करने वाला व्यक्ति कितना सुरक्षित होगा?” यही भारत की बढ़ती अस्थायी कार्य आधारित अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी आर्थिक चुनौती है।

