थॉमस हॉब्स: 17वीं सदी के वह विचारक जिन्होंने रखी मानव मनोविज्ञान की नींव

विशेष आलेख | डेस्क
थॉमस हॉब्स (1588 - 1679) एक ऐसे प्रसिद्ध समाज मनोbवैज्ञानिक थे, जिनके विचारों ने मानव स्वभाव और मस्तिष्क की कार्यप्रणाली को समझने के लिए एक नया दृष्टिकोण प्रदान किया। 1588 ई. में ब्रिटेन में जन्मे हॉब्स का दौर इंग्लैंड में भारी राजनीतिक उथल-पुथल और सत्ता पर आक्रमणों का गवाह रहा। इसी
के बीच, 1651 ई. में उन्होंने अपनी बहुचर्चित पुस्तक 'लेवियाथन' (Leviathan) का प्रकाशन करवाया। इस पुस्तक में उनके विचारों की स्पष्ट झलक मिलती है, जहाँ वे एक ऐसे विचारक के रूप में सामने आते हैं जो सत्ता और तटस्थता, दोनों का पक्ष लेते थे।
मानव स्वभाव: जन्मजात बनाम अर्जित
हॉब्स ने मनुष्य के मौलिक स्वभाव (Basic nature) और अनुभव की उपज के बीच एक स्पष्ट अंतर रेखांकित किया। उनका मानना था कि हालांकि कुछ मानव-व्यवहार जन्मजात होते हैं, लेकिन अधिकतर व्यवहारों को बाहरी परिवेश से अर्जित किया जा सकता है। उन्होंने भूख (Hunger), प्यास (Thirst) और काम (Sex) को प्रमुख जन्मजात व्यवहारों की श्रेणी में रखा।
सामाजिक व्यवहार की व्याख्या करते हुए हॉब्स ने अभिप्रेरणा के नियमों (Principles of Motivation) पर अत्यधिक बल दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि मानव अभिप्रेरक मुख्य रूप से सुख और दुःख की प्रत्याशाओं (Expectations) पर आधारित होते हैं। इसके साथ ही, उन्होंने 'भय' (Fear) पर विशेष बल दिया और इसे ही मानव आचरण का मुख्य निर्धारक माना।
मस्तिष्क की तीन मूल कार्यवाहियां और 'गति' का सिद्धांत
हॉब्स ने केवल बाहरी व्यवहार ही नहीं, बल्कि मन की कार्यप्रणाली का भी गहराई से विश्लेषण किया। उनके सिद्धांत के अनुसार, मन की तीन मूल कार्यवाहियां होती हैं:
संवेदना (Sensation)
पुनः स्मरण (Recall)
साहचर्य (Association)
हॉब्स ने इन तीनों मनोवैज्ञानिक क्रियाओं को 'गति' (Motion) का नाम दिया। उनका वैज्ञानिक तर्क था कि किसी बाहरी उद्दीपक (External stimulus) के संपर्क में आने से हमारी ज्ञानेन्द्रियों में एक प्रकार की गति उत्पन्न होती है, जिससे अंततः मस्तिष्क में संवेदना जन्म लेती है। जब यह बाहरी उद्दीपक हट जाता है, तब भी यह गति मस्तिष्क में चलती रहती है, जिससे स्मरण या प्रतिबिम्ब का निर्माण होता है। यही प्रतिबिम्ब और स्मरण हमारे विचारों के क्रम को निर्धारित करते हैं।
विचारों का क्रम और साहचर्य के प्रकार
हॉब्स का मानना था कि मानव मस्तिष्क में विचारों का क्रम कुछ भी हो सकता है, क्योंकि पूरे जीवनकाल में प्रत्येक घटना का संवेदी अनुभव एक-दूसरे से भिन्न होता है। किसी विशिष्ट घटना से मस्तिष्क में कौन सा स्मरण ताज़ा होगा, यह पहले से तय नहीं किया जा सकता। हालांकि, कई बार ऐसा भी होता है कि किसी निश्चित घटना से एक निश्चित स्मरण ही जुड़ता है। इसी महत्वपूर्ण अवलोकन के आधार पर हॉब्स ने साहचर्य (Association) को दो श्रेणियों में बांटा:
मुक्त साहचर्य (Free association)
नियंत्रित साहचर्य (Controlled association)
निष्कर्ष
17वीं शताब्दी में अनुभव आधारित मनोविज्ञान (Empirical Psychology) की स्पष्ट रूपरेखा का निर्धारण करने का श्रेय थॉमस हॉब्स को ही जाता है। उन्होंने मानव संवेदना को ही सभी विचारों का मूल स्रोत माना। 1679 ई. में इस महान मनोवैज्ञानिक और विचारक का निधन हो गया, परंतु उनके द्वारा प्रतिपादित सिद्धांत आज भी आधुनिक मनोविज्ञान के अध्ययन में मील का पत्थर माने जाते हैं।
: प्रोफेसर दलजीत सिंह कालड़ा

