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उत्सवों का मनोविज्ञान : खुशियों की रोशनी दिव्यांग बच्चों के जीवन तक भी पहुंचाएं

 
 उत्सवों का मनोविज्ञान : खुशियों की रोशनी दिव्यांग बच्चों के जीवन तक भी पहुंचाएं

 दीपावली हो, जन्मदिन या परिवार का कोई शुभ समारोह, दिव्यांग बच्चों को खुशियों में सहभागी बनाना ही संवेदनशील समाज की पहचान; कुछ पल का अपनत्व बन सकता है जीवनभर की सुंदर स्मृति

लेखिका : काउंसलर कंचन मेहता
एम.ए. (मनोविज्ञान), काउंसलर, दिशा, सिरसा

दीपावली केवल दीप जलाने, घर सजाने और मिठाइयां बांटने का त्योहार नहीं है। यह अंधकार से प्रकाश, दूरी से निकटता और उपेक्षा से अपनत्व की ओर बढ़ने का संदेश भी देता है। लेकिन जब हम अपने घरों में खुशियों के दीप जलाते हैं, तब क्या कभी यह सोचते हैं कि हमारे परिवार, रिश्तेदारी या आसपास रहने वाले दिव्यांग बच्चे भी इन खुशियों में बराबर के सहभागी बन पा रहे हैं या नहीं?

यही प्रश्न उत्सवों के सामाजिक और मनोवैज्ञानिक महत्व को समझने का आधार है।

खुशियों में भागीदारी क्यों आवश्यक है?

मनोविज्ञान के अनुसार अपनत्व और सामाजिक जुड़ाव मनुष्य की महत्वपूर्ण भावनात्मक आवश्यकताएं हैं। बच्चों के लिए पारिवारिक समारोह केवल मनोरंजन का अवसर नहीं होते, बल्कि वे इनके माध्यम से संबंधों, सामाजिक व्यवहार और अपनी पहचान को भी समझते हैं।

जब किसी दिव्यांग बच्चे को दीपावली की पूजा, घर की सजावट, मिठाई वितरण या किसी पारिवारिक आयोजन में उसकी इच्छा और क्षमता के अनुसार शामिल किया जाता है, तो उसे यह अनुभव होता है कि वह भी परिवार का उतना ही महत्वपूर्ण सदस्य है जितने दूसरे लोग।

कुछ समय देना भी है अनमोल उपहार

हम त्योहारों पर महंगे उपहार खरीदते हैं, नए कपड़े पहनते हैं और अनेक लोगों से मिलते हैं। लेकिन कभी-कभी किसी दिव्यांग बच्चे के साथ बिताए गए कुछ आत्मीय क्षण किसी महंगे उपहार से अधिक मूल्यवान हो सकते हैं।

उसके पास बैठकर बातचीत करना, उसकी पसंद का खेल खेलना, उसके साथ तस्वीर खिंचवाना, उसकी बनाई वस्तु की सराहना करना अथवा उसकी इच्छा के अनुसार उसे उत्सव में कोई छोटी जिम्मेदारी देना उसके लिए सुखद अनुभव बन सकता है।

हमें बच्चे को यह एहसास नहीं कराना चाहिए कि हम उस पर कोई उपकार कर रहे हैं। हमारा व्यवहार इतना सहज होना चाहिए कि उसे लगे, यह उत्सव मेरा भी है और ये खुशियां मेरी भी हैं।

परिवार की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण

कई बार परिवार दिव्यांग बच्चों की सुरक्षा या सुविधा को ध्यान में रखते हुए उन्हें सामाजिक समारोहों से दूर रखता है। हालांकि सुरक्षा आवश्यक है, लेकिन अनावश्यक अलगाव उचित नहीं है।

परिवार को चाहिए कि बच्चे की जरूरतों को समझकर उसकी भागीदारी के अवसर तैयार करे। कोई बच्चा रंगोली बनाने में सहयोग कर सकता है, कोई फूल सजाने में, कोई दीपक सजाने में और कोई अपनी पसंद के गीत या गतिविधि के माध्यम से उत्सव का आनंद ले सकता है।

यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि तेज आवाज, अत्यधिक रोशनी, भीड़ या पटाखों से कुछ बच्चों को परेशानी हो सकती है। ऐसे में शांत वातावरण, सुरक्षित व्यवस्था और बच्चे की सहमति को प्राथमिकता देनी चाहिए।

उत्सवों से विकसित होती है भावनात्मक सुरक्षा

जब दिव्यांग बच्चे बार-बार परिवार और समाज से सकारात्मक अनुभव प्राप्त करते हैं, तो उनमें आत्मविश्वास, सामाजिक जुड़ाव और भावनात्मक सुरक्षा की भावना मजबूत हो सकती है।

इसके विपरीत उन्हें अलग बैठाना, उनकी क्षमताओं की तुलना दूसरे बच्चों से करना या उनके सामने उनकी सीमाओं पर अनावश्यक चर्चा करना उनके आत्मसम्मान को ठेस पहुंचा सकता है।

इस दीपावली एक नया संकल्प लें

आइए, हम संकल्प लें कि अपने घर या समाज में आयोजित किसी भी उत्सव में दिव्यांग बच्चों को अनदेखा नहीं करेंगे। उनसे पूछेंगे कि वे किस प्रकार शामिल होना चाहते हैं। उनकी पसंद का सम्मान करेंगे और उन्हें अपनी खुशियों में बराबर का स्थान देंगे।

यदि संभव हो तो किसी विशेष शिक्षा केंद्र अथवा दिव्यांग बच्चों के संस्थान में जाकर उनके साथ समय बिताएं। केवल मिठाइयां या उपहार देकर लौट आने के बजाय उनसे बातचीत करें, उनकी प्रतिभाओं को जानें और उनके प्रयासों की सराहना करें।

दीपावली का सबसे सुंदर दीप वह है, जो किसी उपेक्षित मन में अपनत्व, आत्मसम्मान और खुशी की रोशनी जला दे।

जिस दिन हमारे घरों और समाज के प्रत्येक बच्चे को यह महसूस होगा कि वह हमारी खुशियों का अभिन्न हिस्सा है, उसी दिन उत्सव का वास्तविक उद्देश्य सार्थक होगा।