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विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के जीवन में कानूनी अभिभावक का महत्व कानूनी सुरक्षा के साथ मनोवैज्ञानिक समझ भी है उतनी ही आवश्यक

 
 विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के जीवन में कानूनी अभिभावक का महत्व कानूनी सुरक्षा के साथ मनोवैज्ञानिक समझ भी है उतनी ही आवश्यक

 — काउंसलर कंचन मेहता

विशेष आवश्यकता (Special Needs) वाले बच्चों के माता-पिता के मन में सबसे बड़ी चिंता यही रहती है कि "हमारे बाद हमारे बच्चे का क्या होगा?" यह चिंता विशेष रूप से उन परिवारों में अधिक होती है, जिनके बच्चे बौद्धिक दिव्यांगता (Intellectual Disability), ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (Autism Spectrum Disorder), सेरेब्रल पाल्सी (Cerebral Palsy) अथवा बहु-दिव्यांगता (Multiple Disabilities) से प्रभावित होते हैं। ऐसे बच्चों को जीवनभर किसी न किसी स्तर पर देखभाल, संरक्षण, मार्गदर्शन और भावनात्मक सहयोग की आवश्यकता होती है। इसी उद्देश्य से भारत में कानूनी अभिभावक (Legal Guardian) की व्यवस्था की गई है, ताकि विशेष आवश्यकता वाले व्यक्तियों का वर्तमान और भविष्य सुरक्षित रह सके।
यह समझना आवश्यक है कि कानूनी अभिभावक केवल माता-पिता ही नहीं होते। सामान्यतः 18 वर्ष की आयु तक माता-पिता बच्चे के प्राकृतिक अभिभावक (Natural Guardian) होते हैं। किंतु यदि बच्चा वयस्क होने के बाद भी अपने कानूनी, वित्तीय अथवा व्यक्तिगत निर्णय स्वयं लेने में सक्षम नहीं है, तो उसके लिए कानूनी अभिभावक नियुक्त किया जा सकता है। यह अभिभावक माता-पिता, भाई-बहन, निकट संबंधी अथवा कोई अन्य विश्वसनीय व्यक्ति हो सकता है, जो दिव्यांग व्यक्ति के हितों की रक्षा करने में सक्षम हो। आवश्यक परिस्थितियों में नियमानुसार किसी पंजीकृत संस्था के प्रतिनिधि को भी यह जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है।
भारत में कानूनी अभिभावक की व्यवस्था राष्ट्रीय न्यास अधिनियम, 1999 (The National Trust Act, 1999) की धारा 14 के अंतर्गत की गई है। इस अधिनियम के अनुसार ऑटिज्म, सेरेब्रल पाल्सी, बौद्धिक दिव्यांगता तथा बहु-दिव्यांगता से प्रभावित व्यक्तियों के लिए जिला स्तर पर गठित लोकल लेवल कमेटी (Local Level Committee) कानूनी अभिभावक नियुक्त करती है। वहीं दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 (Rights of Persons with Disabilities Act, 2016) में Limited Guardianship अर्थात सीमित अभिभावक का प्रावधान भी किया गया है, जिसमें दिव्यांग व्यक्ति की इच्छा, सहभागिता और गरिमा को प्राथमिकता दी जाती है।
हालांकि केवल कानूनी अधिकार प्राप्त कर लेना पर्याप्त नहीं है। एक प्रभावी कानूनी अभिभावक बनने के लिए मनोवैज्ञानिक समझ भी उतनी ही आवश्यक है। विशेष आवश्यकता वाले बच्चों को केवल देखभाल नहीं, बल्कि सम्मान, अपनापन, धैर्य, भावनात्मक सुरक्षा और सकारात्मक वातावरण की आवश्यकता होती है। यदि अभिभावक बच्चे की मानसिक स्थिति, उसकी सीखने की गति, उसकी भावनाओं और व्यवहार संबंधी आवश्यकताओं को नहीं समझता, तो वह अपनी भूमिका का प्रभावी ढंग से निर्वहन नहीं कर पाएगा।
मनोविज्ञान बताता है कि प्रत्येक विशेष बच्चा अपनी क्षमताओं, सीमाओं, रुचियों और व्यवहार के स्तर पर अलग होता है। इसलिए अभिभावक को यह समझना चाहिए कि बच्चे से किस प्रकार संवाद किया जाए, उसके व्यवहार में सकारात्मक परिवर्तन कैसे लाया जाए, तनाव या आक्रोश की स्थिति में किस प्रकार प्रतिक्रिया दी जाए तथा उसे आत्मनिर्भर बनने के लिए कैसे प्रेरित किया जाए। यही संवेदनशील दृष्टिकोण बच्चे के व्यक्तित्व विकास और जीवन की गुणवत्ता को बेहतर बनाता है।
अक्सर यह देखा जाता है कि कुछ अभिभावक अपनी जिम्मेदारी को केवल बैंक, अस्पताल, पेंशन, संपत्ति अथवा सरकारी योजनाओं से जुड़े कार्यों तक सीमित समझ लेते हैं, जबकि उनकी वास्तविक भूमिका इससे कहीं अधिक व्यापक होती है। एक आदर्श कानूनी अभिभावक वही है जो बच्चे की भावनाओं को समझे, उसकी पसंद-नापसंद का सम्मान करे, उसके आत्मविश्वास को बढ़ाए और उसे समाज में सम्मानपूर्वक एवं आत्मनिर्भर जीवन जीने के अवसर उपलब्ध कराए।
इसी कारण विशेषज्ञ समय-समय पर कानूनी अभिभावकों को मनोवैज्ञानिक परामर्श, व्यवहार प्रबंधन, सकारात्मक पालन-पोषण तथा जीवन-कौशल से संबंधित प्रशिक्षण लेने की सलाह देते हैं। ऐसा प्रशिक्षण अभिभावकों को अधिक संवेदनशील, वैज्ञानिक और प्रभावी ढंग से अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करने में सहायता करता है।
वास्तव में कानूनी अभिभावक बनना केवल अधिकार प्राप्त करना नहीं, बल्कि जीवनभर की नैतिक, सामाजिक और मानवीय जिम्मेदारी स्वीकार करना है। उसका दायित्व है कि वह दिव्यांग व्यक्ति के स्वास्थ्य, शिक्षा, पुनर्वास, वित्तीय सुरक्षा, सामाजिक समावेशन तथा सम्मानजनक जीवन की रक्षा सुनिश्चित करे। जब कानूनी संरक्षण और मनोवैज्ञानिक समझ साथ-साथ चलती है, तभी विशेष आवश्यकता वाले बच्चों का समग्र विकास संभव हो पाता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि माता-पिता, परिवार, विशेष शिक्षक, काउंसलर, पुनर्वास विशेषज्ञ और सामाजिक संस्थाएँ मिलकर कानूनी अभिभावक की अवधारणा के प्रति समाज में व्यापक जागरूकता उत्पन्न करें। यदि कानूनी सुरक्षा के साथ संवेदनशील और वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी विकसित किया जाए, तो विशेष आवश्यकता वाले बच्चों का भविष्य अधिक सुरक्षित, आत्मनिर्भर, सम्मानजनक और खुशहाल बनाया जा सकता है।
विशेष आवश्यकता वाले बच्चे समाज पर बोझ नहीं, बल्कि हमारी संवेदनशीलता, जिम्मेदारी और मानवीय मूल्यों की सबसे बड़ी कसौटी हैं। उन्हें केवल एक कानूनी अभिभावक नहीं, बल्कि ऐसा संरक्षक चाहिए जो उनके मन को समझे, उनके अधिकारों की रक्षा करे और उन्हें गरिमा के साथ जीवन जीने का अवसर प्रदान करे।
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