अतिक्रमण हटाने से पहले अपनी जिम्मेदारी भी निभाए सरकार

सुरेंद्र भाटिया
प्रधान संपादक, पल-पल
हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण (एचएसवीपी) द्वारा प्रदेश के विभिन्न सेक्टरों में ग्रीन बेल्ट पर किए गए अतिक्रमण हटाने और सुरक्षा गेटों को तोड़ने की कार्रवाई इन दिनों चर्चा का विषय बनी हुई है। कानून की दृष्टि से देखें तो यह कार्रवाई उचित भी है, क्योंकि सार्वजनिक भूमि पर स्थायी कब्जे या अवरोध की अनुमति नहीं दी जा सकती। न्यायालय के आदेशों का पालन होना ही चाहिए और कानून सबके लिए समान होना चाहिए।
लेकिन इस पूरे घटनाक्रम का दूसरा पक्ष भी है, जिस पर चर्चा होना उतना ही आवश्यक है।
प्रदेश के अनेक सेक्टरों में रहने वाले लोगों ने ग्रीन बेल्टों में पौधे इसलिए नहीं लगाए कि वे सरकारी भूमि पर कब्जा करना चाहते थे, बल्कि इसलिए लगाए क्योंकि वर्षों तक इन क्षेत्रों की उचित देखभाल नहीं हुई। पौधों को आवारा पशुओं से बचाने के लिए लोगों ने अपने स्तर पर जालियां लगाईं, सुरक्षा के इंतजाम किए और कई स्थानों पर ग्रीन बेल्ट को विकसित करने के लिए स्वयं धन खर्च किया।
इसी प्रकार अनेक सेक्टरों में लगाए गए सुरक्षा गेट भी किसी व्यक्ति विशेष के निजी स्वार्थ का परिणाम नहीं थे। जब सेक्टरों में चोरी, असामाजिक गतिविधियों और आवारा पशुओं की समस्या बढ़ी तथा सरकारी सुरक्षा व्यवस्था पर्याप्त नहीं दिखाई दी, तब लोगों ने अपने स्तर पर सुरक्षा गार्ड नियुक्त किए। सिरसा सहित कई शहरों में निवासी वर्षों तक प्रतिमाह हजारों रुपये का योगदान देकर सुरक्षा व्यवस्था चलाते रहे। कहीं-कहीं तो परिवारों ने प्रति माह लगभग ₹5000 तक का सहयोग देकर गार्ड, गेट और अन्य सुरक्षा व्यवस्थाओं का खर्च उठाया।
आज यदि इन गेटों को हटाया जा रहा है तो यह पूछा जाना भी स्वाभाविक है कि जिन मूलभूत सुविधाओं का वादा करके लोगों को लाखों रुपये के प्लॉट बेचे गए थे, वे सुविधाएं आखिर पूरी क्यों नहीं हुईं?
कई सेक्टरों में आज भी ड्रेनेज सिस्टम अधूरा है। बरसात के समय जलभराव आम बात है। पार्कों की देखभाल संतोषजनक नहीं है। ग्रीन बेल्टों की सुरक्षा दीवारें वर्षों से टूटी पड़ी हैं। जगह-जगह से पशु सेक्टरों में प्रवेश कर जाते हैं। पानी और सीवर के भारी-भरकम बिल समय पर वसूले जाते हैं, लेकिन सुविधाओं का स्तर अक्सर अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरता।
सवाल केवल अतिक्रमण का नहीं, बल्कि जवाबदेही का भी है। यदि नागरिकों द्वारा किया गया हर अतिक्रमण गलत है तो यह भी जांच होनी चाहिए कि जिन सुविधाओं और रखरखाव के लिए बजट जारी हुए, वे जमीन पर क्यों दिखाई नहीं देते। ग्रीन बेल्टों और सुरक्षा दीवारों की मरम्मत के नाम पर खर्च किए गए धन का सामाजिक ऑडिट भी होना चाहिए।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कार्रवाई निष्पक्ष होनी चाहिए। यदि किसी सेक्टर में तीन फुट की जाली या सुरक्षा गेट हटाया जाता है, तो फिर बड़े और प्रभावशाली अतिक्रमणों पर भी समान कार्रवाई दिखाई देनी चाहिए। कानून की विश्वसनीयता तभी बनी रहती है जब वह सब पर समान रूप से लागू हो।
विशेष प्रश्न : क्या केवल सेक्टरों की ग्रीन बेल्ट ही दिखाई देती है?
सरकार द्वारा हुड्डा सेक्टरों में तीन से छह फुट तक की ग्रीन बेल्ट पर किए गए अतिक्रमण हटाए जा रहे हैं। यह स्वागतयोग्य कदम है। लेकिन शहर के लोग यह भी पूछ रहे हैं कि क्या प्रशासन को केवल सेक्टरों की ग्रीन बेल्ट ही दिखाई देती है?
सिरसा की नई मंडी क्षेत्र में धर्म के नाम पर ग्रीन बेल्टों पर बने स्थायी ढांचे, सिविल अस्पताल के आसपास ग्रीन बेल्ट की भूमि पर वर्षों से किए गए कब्जे तथा दर्जनों एकड़ क्षेत्र को डंपिंग जोन में बदल देने की स्थिति क्या प्रशासन की नजर में नहीं है? यदि ग्रीन बेल्ट वास्तव में सार्वजनिक संपत्ति है तो फिर पूरे शहर में एक समान नीति लागू होनी चाहिए।
शहरवासियों का सवाल है कि जिस प्रकार सेक्टरों में कार्रवाई की जा रही है, उसी प्रकार नई मंडी क्षेत्र और सिविल अस्पताल के आसपास की ग्रीन बेल्टों को अतिक्रमण और अवैध उपयोग से मुक्त करवाने की कार्रवाई कब होगी?
न्यायालय के आदेशों का पालन आवश्यक है। अतिक्रमण हटना भी चाहिए। लेकिन सरकार को यह नहीं भूलना चाहिए कि कानून के साथ-साथ उसकी अपनी जिम्मेदारियां भी हैं। नागरिकों से नियमों का पालन कराने से पहले यह सुनिश्चित करना भी उतना ही जरूरी है कि जिन सुविधाओं का वादा किया गया था, वे वास्तव में उपलब्ध हों।
कानून का राज तभी प्रभावी माना जाएगा जब कार्रवाई के साथ जवाबदेही, पारदर्शिता और समानता भी दिखाई दे।
अन्यथा लोगों के मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक रहेगा कि कहीं कार्रवाई केवल आसान लक्ष्यों तक सीमित तो नहीं है।

