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सरकार ही कर रही है शोषण (भाग-2) एक मीटर रीडर की कहानी, लाखों युवाओं की व्यथा

 
 सरकार ही कर रही है शोषण (भाग-2) एक मीटर रीडर की कहानी, लाखों युवाओं की व्यथा
 — सुरेंद्र भाटिया
प्रधान संपादक, पल-पल

आज सुबह मैं अभी पूरी तरह उठा भी नहीं था कि घर के बाहर कुछ आहट सुनाई दी। बाहर निकलकर देखा तो एक व्यक्ति मेरे गेट पर बिजली का बिल टांग रहा था। मैंने सहज भाव से पूछा, "क्या है भाई?" उसने विनम्रता से उत्तर दिया, "सर, बिजली का बिल है।"
मैंने मुस्कुराकर पूछा, "घंटी क्यों नहीं बजाई?" वह बोला, "सर, बजाने ही वाला था, फिर लगा शायद आप सो रहे होंगे।"
बातों-बातों में मैंने उसे पानी के लिए पूछा। उसने पानी पिया या नहीं, यह अब याद नहीं, लेकिन उसके बाद जो बातचीत हुई, उसने मन को भीतर तक झकझोर दिया। मैंने उससे पूछा, "कहां के रहने वाले हो?" उसने सिरसा के एक गांव का नाम बताया। फिर जैसे उसके भीतर वर्षों से दबा दर्द बाहर निकल आया।
उसने कहा, "सर, 17 साल से बिजली बोर्ड में मीटर रीडिंग का काम कर रहा हूं।"
मैंने पूछा, "वेतन कितना मिलता है?"
उसने कहा, "सर, करीब 16 हजार रुपये हो जाते हैं।"
मैंने फिर पूछा, "हो जाते हैं, इसका क्या मतलब?"
उसका उत्तर था, "सर, हम किसी सरकारी कर्मचारी की तरह मासिक वेतन पर नहीं हैं। एक मीटर की रीडिंग के पांच रुपये मिलते हैं। दिन में लगभग सौ मीटर पढ़ लेते हैं। महीने में 15 से 16 हजार रुपये बन जाते हैं।"
उसकी बात सुनकर मैं कुछ क्षण के लिए मौन हो गया। सत्रह वर्ष... एक-दो नहीं, पूरे सत्रह वर्ष। देश में जब कोई व्यक्ति सत्रह वर्ष तक एक ही विभाग में काम करता है तो सामान्यतः वह वरिष्ठ कर्मचारी माना जाता है। उसके अनुभव का सम्मान होता है। लेकिन यहां सत्रह वर्ष बाद भी वह व्यक्ति प्रति मीटर के हिसाब से भुगतान पाने वाला अस्थायी श्रमिक है।
विडंबना यह है कि घर-परिवार और समाज में उसे अक्सर "सरकारी कर्मचारी" कहा जाता है। लोग समझते हैं कि वह सुरक्षित भविष्य वाला व्यक्ति है। लेकिन वास्तविकता यह है कि उसका भविष्य आज भी उतना ही असुरक्षित है जितना नौकरी के पहले दिन था।
यह कहानी केवल एक मीटर रीडर की नहीं है। हरियाणा में ऐसे लाखों युवक-युवतियां हैं जिन्होंने अपनी जवानी इस आशा में बिता दी कि कभी न कभी उनकी नौकरी नियमित हो जाएगी। किसी ने गेस्ट टीचर बनकर वर्षों गुजार दिए, किसी ने कौशल विकास निगम के माध्यम से काम किया, किसी ने बिजली बोर्ड, नगर परिषद, पंचायत, स्वास्थ्य, शिक्षा या अन्य विभागों में ठेके पर सेवाएं दीं।
हर सुबह वे सरकारी कार्यालयों में प्रवेश करते हैं, सरकारी काम करते हैं, सरकारी आदेश मानते हैं, सरकारी अधिकारियों के अधीन काम करते हैं, लेकिन जब अधिकारों की बात आती है तो उन्हें प्राइवेट कंपनी का कर्मचारी बता दिया जाता है।
सबसे दुखद स्थिति यह है कि अनेक युवाओं की पूरी सेवा अवधि उम्मीद में ही बीत जाती है। कुछ भाग्यशाली लोग 20-22 वर्षों बाद अदालतों के माध्यम से न्याय प्राप्त कर पाते हैं और उन्हें नियमित करने के आदेश मिलते हैं। लेकिन तब तक उनकी उम्र का सबसे सुनहरा समय गुजर चुका होता है।
2024 के विधानसभा चुनावों के दौरान लगभग 1.20 लाख कौशल विकास निगम के कर्मचारियों को नियमित करने के वादे किए गए थे। हजारों परिवारों ने इस घोषणा को आशा की किरण के रूप में देखा था। लेकिन आज तक किसी एक कर्मचारी के नियमित होने की खबर नहीं आई। सवाल यह है कि यदि सरकार स्वयं अपने वादों को पूरा नहीं करेगी तो युवाओं का विश्वास किस पर टिकेगा?
आज सरकारी विभागों में स्थायी कर्मचारियों की जगह धीरे-धीरे ठेकेदार, आउटसोर्सिंग एजेंसियां और निजी कंपनियां लेती जा रही हैं। सरकारें वेतन, पेंशन और अन्य दायित्वों से बचने के लिए सेवाओं का निजीकरण कर रही हैं। परिणाम यह है कि कर्मचारी सरकारी काम करता है, लेकिन उसे सरकारी कर्मचारी का सम्मान, सुरक्षा और अधिकार नहीं मिलते।
एक समय था जब सरकारी नौकरी स्थिरता, सम्मान और सामाजिक सुरक्षा का प्रतीक मानी जाती थी। आज अनेक युवाओं के लिए यह केवल एक भ्रम बनकर रह गई है। वे वर्षों तक इसी उम्मीद में काम करते रहते हैं कि कभी न कभी उनका भविष्य सुरक्षित होगा। लेकिन अक्सर यह उम्मीद ही उनकी सबसे बड़ी पूंजी और सबसे बड़ी त्रासदी बन जाती है।
सरकारें जब निजी उद्योगों में श्रमिकों के शोषण की बात करती हैं तो अच्छा लगता है। लेकिन उससे पहले उन्हें अपने ही विभागों, निगमों, बोर्डों और योजनाओं में काम कर रहे लाखों अनुबंधित और आउटसोर्स कर्मचारियों की स्थिति पर भी ईमानदारी से नजर डालनी चाहिए।
क्योंकि जब शोषण करने वाला कोई निजी उद्योगपति नहीं, बल्कि स्वयं व्यवस्था बन जाए, तब पीड़ा और भी अधिक बढ़ जाती है।
आज उस मीटर रीडर की आंखों में मैंने केवल एक व्यक्ति का दर्द नहीं देखा। मैंने उसमें हरियाणा के उन लाखों युवाओं की अधूरी उम्मीदें देखीं, जिन्होंने अपनी उम्र का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा "शायद अगले वर्ष नौकरी पक्की हो जाएगी" के इंतजार में गुजार दिया।
प्रश्न केवल रोजगार का नहीं है। प्रश्न सम्मान, सुरक्षा और उस विश्वास का है जिसके सहारे कोई युवा अपना जीवन बनाता है।
यदि सरकार वास्तव में युवा शक्ति का सम्मान करना चाहती है, तो उसे सबसे पहले अपने ही घर के भीतर झांकना होगा।
क्या सरकार सेवा लेती रहेगी और जिम्मेदारी से बचती रहेगी, या फिर उन लाखों कर्मचारियों को न्याय देगी जिनके कंधों पर सरकारी व्यवस्था का बड़ा हिस्सा आज भी टिका हुआ है?
यही प्रश्न आज भी उत्तर की प्रतीक्षा कर रहा है।
सुरेंद्र भाटिया
प्रधान संपादक, पल-पल
15 जून 2026, सोमवार