नई पीढ़ी और पुरानी पीढ़ी का टकराव: मनोविज्ञान क्या कहता है? काउंसलर कंचन मेहता
Updated: Jun 16, 2026, 13:51 IST

आज लगभग हर परिवार में एक
सुनने को मिलती है। बुजुर्ग कहते हैं कि "आजकल के बच्चे हमारी बात नहीं मानते", जबकि युवा पीढ़ी का कहना होता है कि "हमें हर बात पर टोका जाता है, हमारी स्वतंत्रता का सम्मान नहीं किया जाता।" यही स्थिति धीरे-धीरे पीढ़ियों के बीच टकराव का कारण बन जाती है।
मनोविज्ञान के अनुसार यह संघर्ष किसी एक पक्ष की गलती नहीं है, बल्कि दो अलग-अलग सामाजिक और मानसिक परिवेश में पली-बढ़ी पीढ़ियों के विचारों का अंतर है। पुरानी पीढ़ी ने जीवन के अनुभवों, संघर्षों और सीमित संसाधनों के बीच जीवन जिया है। उनके लिए अनुभव सबसे बड़ा शिक्षक है। इसलिए वे अपने अनुभवों के आधार पर सलाह देते हैं और मानते हैं कि जो उन्होंने देखा-समझा है, वही सही रास्ता है।
दूसरी ओर नई पीढ़ी सूचना और तकनीक के युग में बड़ी हुई है। इंटरनेट, मोबाइल फोन और सोशल मीडिया ने उन्हें कम उम्र में ही दुनिया भर की जानकारी उपलब्ध करा दी है। इसलिए वे हर बात को तर्क, शोध और व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर परखना चाहते हैं। वे केवल इसलिए किसी बात को स्वीकार नहीं करते क्योंकि कोई बड़ा व्यक्ति उसे कह रहा है।
यहीं से संघर्ष शुरू होता है। बुजुर्गों को लगता है कि उनकी बातों का सम्मान नहीं किया जा रहा, जबकि युवाओं को महसूस होता है कि उन पर अनावश्यक नियंत्रण किया जा रहा है। कई बार युवा बुजुर्गों का प्रत्यक्ष अपमान नहीं करते, लेकिन उनकी सलाहों को अनदेखा कर देते हैं। यह व्यवहार बुजुर्गों को आहत करता है और संबंधों में दूरी पैदा होने लगती है।
मनोविज्ञान बताता है कि युवावस्था की सबसे बड़ी आवश्यकता "स्वतंत्र पहचान" (Identity) बनाना होती है। युवा चाहते हैं कि उनके निर्णयों का सम्मान किया जाए। दूसरी ओर वृद्धावस्था में व्यक्ति चाहता है कि उसके अनुभवों और जीवनभर अर्जित ज्ञान को महत्व मिले। जब इन दोनों आवश्यकताओं के बीच संतुलन नहीं बन पाता, तब टकराव बढ़ने लगता है।
आज की नई पीढ़ी मोबाइल, इंटरनेट और डिजिटल तकनीक के साथ बड़ी हुई है। ऐसे में एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है कि क्या नई पीढ़ी को मोबाइल अपने माता-पिता से अधिक प्रिय है? मनोविज्ञान का उत्तर है—नहीं। अधिकांश युवा अपने माता-पिता से प्रेम करते हैं, लेकिन मोबाइल उन्हें तत्काल मनोरंजन, जानकारी, मित्रों से संपर्क और मानसिक संतुष्टि प्रदान करता है। मोबाइल उनकी दिनचर्या और सामाजिक पहचान का हिस्सा बन चुका है। समस्या तब पैदा होती है जब परिवार के साथ संवाद कम होने लगता है और स्क्रीन टाइम वास्तविक रिश्तों की जगह लेने लगता है।
कई शोध बताते हैं कि अत्यधिक मोबाइल उपयोग से परिवार के सदस्यों के बीच बातचीत का समय कम हुआ है। पहले परिवार के लोग एक साथ बैठकर चर्चा करते थे, जबकि अब एक ही कमरे में बैठे लोग भी अलग-अलग स्क्रीन में व्यस्त रहते हैं। इससे भावनात्मक दूरी बढ़ने लगती है। इसलिए समस्या मोबाइल से अधिक उसके असंतुलित उपयोग की है।
पीढ़ियों के बीच बढ़ते द्वंद्व के कुछ प्रमुख कारण हैं—तकनीकी अंतर, जीवन मूल्यों में बदलाव, स्वतंत्रता की बढ़ती इच्छा, संवाद की कमी, सामाजिक संरचना में परिवर्तन तथा अपेक्षाओं का टकराव। पुरानी पीढ़ी अनुशासन और सामूहिक निर्णयों को महत्व देती है, जबकि नई पीढ़ी व्यक्तिगत स्वतंत्रता और आत्मनिर्णय को प्राथमिकता देती है।
इस समस्या का समाधान भी मनोविज्ञान ही बताता है। बुजुर्गों को यह स्वीकार करना होगा कि समय बदल चुका है और हर नई सोच गलत नहीं होती। वहीं युवाओं को यह समझना होगा कि अनुभव का कोई विकल्प नहीं होता। जिस रास्ते पर वे आज चल रहे हैं, उस पर उनके माता-पिता और दादा-दादी पहले चल चुके हैं।
परिवार में संवाद का वातावरण बनाना, एक-दूसरे की बात धैर्यपूर्वक सुनना, निर्णयों में सहभागिता बढ़ाना तथा तकनीक और पारिवारिक संबंधों के बीच संतुलन बनाना आवश्यक है। जब बुजुर्ग आदेश देने के बजाय मार्गदर्शन देंगे और युवा विरोध करने के बजाय संवाद करेंगे, तब दोनों पीढ़ियों के बीच की दूरी स्वतः कम होने लगेगी।
अंततः यह समझना आवश्यक है कि नई और पुरानी पीढ़ी एक-दूसरे की प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि एक-दूसरे की पूरक हैं। अनुभव और नवाचार का मेल ही परिवार और समाज को आगे बढ़ाता है। जहां बुजुर्गों का अनुभव दिशा देता है, वहीं युवाओं की ऊर्जा और नई सोच भविष्य का निर्माण करती है। दोनों के बीच संतुलन ही स्वस्थ परिवार और स्वस्थ समाज की पहचान है।
— काउंसलर कंचन मेहता
मनोवैज्ञानिक एवं पारिवारिक परामर्शदाता
सुनने को मिलती है। बुजुर्ग कहते हैं कि "आजकल के बच्चे हमारी बात नहीं मानते", जबकि युवा पीढ़ी का कहना होता है कि "हमें हर बात पर टोका जाता है, हमारी स्वतंत्रता का सम्मान नहीं किया जाता।" यही स्थिति धीरे-धीरे पीढ़ियों के बीच टकराव का कारण बन जाती है।मनोविज्ञान के अनुसार यह संघर्ष किसी एक पक्ष की गलती नहीं है, बल्कि दो अलग-अलग सामाजिक और मानसिक परिवेश में पली-बढ़ी पीढ़ियों के विचारों का अंतर है। पुरानी पीढ़ी ने जीवन के अनुभवों, संघर्षों और सीमित संसाधनों के बीच जीवन जिया है। उनके लिए अनुभव सबसे बड़ा शिक्षक है। इसलिए वे अपने अनुभवों के आधार पर सलाह देते हैं और मानते हैं कि जो उन्होंने देखा-समझा है, वही सही रास्ता है।
दूसरी ओर नई पीढ़ी सूचना और तकनीक के युग में बड़ी हुई है। इंटरनेट, मोबाइल फोन और सोशल मीडिया ने उन्हें कम उम्र में ही दुनिया भर की जानकारी उपलब्ध करा दी है। इसलिए वे हर बात को तर्क, शोध और व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर परखना चाहते हैं। वे केवल इसलिए किसी बात को स्वीकार नहीं करते क्योंकि कोई बड़ा व्यक्ति उसे कह रहा है।
यहीं से संघर्ष शुरू होता है। बुजुर्गों को लगता है कि उनकी बातों का सम्मान नहीं किया जा रहा, जबकि युवाओं को महसूस होता है कि उन पर अनावश्यक नियंत्रण किया जा रहा है। कई बार युवा बुजुर्गों का प्रत्यक्ष अपमान नहीं करते, लेकिन उनकी सलाहों को अनदेखा कर देते हैं। यह व्यवहार बुजुर्गों को आहत करता है और संबंधों में दूरी पैदा होने लगती है।
मनोविज्ञान बताता है कि युवावस्था की सबसे बड़ी आवश्यकता "स्वतंत्र पहचान" (Identity) बनाना होती है। युवा चाहते हैं कि उनके निर्णयों का सम्मान किया जाए। दूसरी ओर वृद्धावस्था में व्यक्ति चाहता है कि उसके अनुभवों और जीवनभर अर्जित ज्ञान को महत्व मिले। जब इन दोनों आवश्यकताओं के बीच संतुलन नहीं बन पाता, तब टकराव बढ़ने लगता है।
आज की नई पीढ़ी मोबाइल, इंटरनेट और डिजिटल तकनीक के साथ बड़ी हुई है। ऐसे में एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है कि क्या नई पीढ़ी को मोबाइल अपने माता-पिता से अधिक प्रिय है? मनोविज्ञान का उत्तर है—नहीं। अधिकांश युवा अपने माता-पिता से प्रेम करते हैं, लेकिन मोबाइल उन्हें तत्काल मनोरंजन, जानकारी, मित्रों से संपर्क और मानसिक संतुष्टि प्रदान करता है। मोबाइल उनकी दिनचर्या और सामाजिक पहचान का हिस्सा बन चुका है। समस्या तब पैदा होती है जब परिवार के साथ संवाद कम होने लगता है और स्क्रीन टाइम वास्तविक रिश्तों की जगह लेने लगता है।
कई शोध बताते हैं कि अत्यधिक मोबाइल उपयोग से परिवार के सदस्यों के बीच बातचीत का समय कम हुआ है। पहले परिवार के लोग एक साथ बैठकर चर्चा करते थे, जबकि अब एक ही कमरे में बैठे लोग भी अलग-अलग स्क्रीन में व्यस्त रहते हैं। इससे भावनात्मक दूरी बढ़ने लगती है। इसलिए समस्या मोबाइल से अधिक उसके असंतुलित उपयोग की है।
पीढ़ियों के बीच बढ़ते द्वंद्व के कुछ प्रमुख कारण हैं—तकनीकी अंतर, जीवन मूल्यों में बदलाव, स्वतंत्रता की बढ़ती इच्छा, संवाद की कमी, सामाजिक संरचना में परिवर्तन तथा अपेक्षाओं का टकराव। पुरानी पीढ़ी अनुशासन और सामूहिक निर्णयों को महत्व देती है, जबकि नई पीढ़ी व्यक्तिगत स्वतंत्रता और आत्मनिर्णय को प्राथमिकता देती है।
इस समस्या का समाधान भी मनोविज्ञान ही बताता है। बुजुर्गों को यह स्वीकार करना होगा कि समय बदल चुका है और हर नई सोच गलत नहीं होती। वहीं युवाओं को यह समझना होगा कि अनुभव का कोई विकल्प नहीं होता। जिस रास्ते पर वे आज चल रहे हैं, उस पर उनके माता-पिता और दादा-दादी पहले चल चुके हैं।
परिवार में संवाद का वातावरण बनाना, एक-दूसरे की बात धैर्यपूर्वक सुनना, निर्णयों में सहभागिता बढ़ाना तथा तकनीक और पारिवारिक संबंधों के बीच संतुलन बनाना आवश्यक है। जब बुजुर्ग आदेश देने के बजाय मार्गदर्शन देंगे और युवा विरोध करने के बजाय संवाद करेंगे, तब दोनों पीढ़ियों के बीच की दूरी स्वतः कम होने लगेगी।
अंततः यह समझना आवश्यक है कि नई और पुरानी पीढ़ी एक-दूसरे की प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि एक-दूसरे की पूरक हैं। अनुभव और नवाचार का मेल ही परिवार और समाज को आगे बढ़ाता है। जहां बुजुर्गों का अनुभव दिशा देता है, वहीं युवाओं की ऊर्जा और नई सोच भविष्य का निर्माण करती है। दोनों के बीच संतुलन ही स्वस्थ परिवार और स्वस्थ समाज की पहचान है।
— काउंसलर कंचन मेहता
मनोवैज्ञानिक एवं पारिवारिक परामर्शदाता

