विशेष बच्चों की उम्र बढ़ने के साथ बदलती जरूरतें: बचपन से किशोरावस्था और वयस्कता की तैयारी

कंचन मेहता
काउंसलर एवं मनोविज्ञान विशेषज्ञ
विशेष आवश्यकता वाले बच्चों की देखभाल को अक्सर बचपन की जरूरतों तक सीमित करके देखा जाता है, जबकि वास्तविकता यह है कि उम्र बढ़ने के साथ उनकी शारीरिक, भावनात्मक, सामाजिक और व्यावहारिक जरूरतें भी लगातार बदलती रहती हैं। जो सहायता पांच या सात वर्ष की उम्र में जरूरी होती है, वही सहायता पंद्रह या बीस वर्ष की उम्र में पर्याप्त नहीं होती। इसलिए माता-पिता, शिक्षकों और विशेष शिक्षकों के लिए यह समझना आवश्यक है कि बच्चे को केवल वर्तमान परिस्थितियों के अनुसार नहीं, बल्कि आने वाली किशोरावस्था और वयस्क जीवन के लिए भी धीरे-धीरे तैयार किया जाए।
बचपन में मजबूत हो बुनियाद
बचपन विशेष बच्चे के विकास की नींव रखने का समय है। इस अवस्था में संवाद, दैनिक दिनचर्या, स्वयं भोजन करना, कपड़े पहनना, साफ-सफाई रखना, अपनी जरूरत बताना और सामान्य सामाजिक व्यवहार जैसे कौशलों पर विशेष ध्यान देना चाहिए। कई बार परिवार अत्यधिक प्यार या सुरक्षा के कारण बच्चे का हर छोटा काम स्वयं करने लगता है। इससे तत्काल सुविधा तो होती है, लेकिन लंबे समय में बच्चे की आत्मनिर्भरता प्रभावित हो सकती है।
बच्चा जितना कार्य स्वयं कर सकता है, उसे उतना अवसर अवश्य दिया जाना चाहिए। कार्य पूरा करने में उसे सामान्य से अधिक समय लगे तो भी धैर्य रखना जरूरी है। छोटी-छोटी सफलताओं की प्रशंसा उसके आत्मविश्वास को बढ़ाती है।
किशोरावस्था में भावनात्मक बदलाव को समझें
किशोरावस्था विशेष बच्चों के लिए अत्यंत संवेदनशील दौर हो सकती है। इस समय शरीर में होने वाले प्राकृतिक बदलावों के साथ भावनाएं, पसंद-नापसंद, आकर्षण, गुस्सा, झिझक और स्वतंत्रता की इच्छा भी बढ़ सकती है। विशेष बच्चा इन बदलावों को महसूस तो करता है, लेकिन हर बार उन्हें समझ या व्यक्त नहीं कर पाता।
ऐसे समय में उसके व्यवहार में अचानक परिवर्तन को केवल जिद या अनुशासनहीनता मान लेना उचित नहीं है। माता-पिता और शिक्षकों को उसकी भावनाओं के पीछे छिपे कारणों को समझने का प्रयास करना चाहिए। व्यक्तिगत स्वच्छता, शरीर की निजता, अच्छे और बुरे स्पर्श की समझ तथा सार्वजनिक और निजी व्यवहार के अंतर को उम्र और समझ के अनुसार सरल तरीके से सिखाना आवश्यक है।
आत्मनिर्भरता की शुरुआत घर से
जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है, उसके प्रशिक्षण का उद्देश्य केवल शैक्षणिक उपलब्धि नहीं रहना चाहिए। उसे दैनिक जीवन में अधिक से अधिक आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में काम करना जरूरी है। अपने कपड़े व्यवस्थित करना, सामान पहचानना, पैसे की सामान्य समझ, खरीदारी के छोटे कार्य, समय की पहचान, घर के सामान्य काम और सुरक्षित तरीके से आसपास के वातावरण में व्यवहार करना जैसे कौशल भविष्य में बहुत उपयोगी होते हैं।
हर विशेष बच्चे की क्षमता अलग होती है। इसलिए आत्मनिर्भरता का अर्थ यह नहीं कि प्रत्येक बच्चा सभी कार्य पूरी तरह अकेले करे। उद्देश्य यह होना चाहिए कि वह अपनी क्षमता के अनुसार अधिकतम स्वतंत्र जीवन जी सके।
वयस्कता के लिए समय रहते बनाएं योजना
विशेष बच्चे के वयस्क होने की तैयारी 18 वर्ष की उम्र के बाद अचानक शुरू नहीं की जानी चाहिए। किशोरावस्था से ही उसकी रुचि, क्षमता और व्यवहार को देखकर भविष्य की दिशा तय करनी चाहिए। कुछ बच्चे व्यावसायिक प्रशिक्षण लेकर रोजगार कर सकते हैं, कुछ संरक्षित वातावरण में काम कर सकते हैं, जबकि कुछ को जीवनभर सहयोग की आवश्यकता हो सकती है।
कंप्यूटर, सिलाई, पैकिंग, बागवानी, हस्तशिल्प, रसोई से जुड़े सरल कार्य या अन्य कौशल बच्चे की रुचि और क्षमता के अनुसार सिखाए जा सकते हैं। उद्देश्य केवल आय अर्जित करना नहीं, बल्कि उसे जिम्मेदारी, उपयोगिता और आत्मसम्मान का अनुभव कराना भी है।
माता-पिता भविष्य के सवाल से न बचें
विशेष बच्चों के माता-पिता के मन में एक स्वाभाविक चिंता रहती है—“हमारे बाद हमारे बच्चे का क्या होगा?” इस प्रश्न को डर के कारण टालने के बजाय समय रहते भविष्य की योजना में बदलना अधिक उपयोगी है। बच्चे की आत्मनिर्भरता, सामाजिक सुरक्षा, परिवार के अन्य सदस्यों की भूमिका, आर्थिक व्यवस्था, आवश्यक दस्तावेज और दीर्घकालीन देखभाल जैसे विषयों पर पहले से विचार किया जाना चाहिए।
विशेष बच्चे की उम्र केवल कैलेंडर में नहीं बढ़ती, उसकी जरूरतें भी बदलती हैं। इसलिए देखभाल का लक्ष्य केवल उसे सुरक्षित रखना नहीं, बल्कि उसकी क्षमताओं को पहचानकर उसे यथासंभव स्वतंत्र, सम्मानजनक और सार्थक जीवन के लिए तैयार करना होना चाहिए। आज सिखाया गया एक छोटा-सा आत्मनिर्भरता का कौशल, कल उसके जीवन की बड़ी ताकत बन सकता है

