कैंसर दवाओं पर 10 गुना मुनाफे पर सुप्रीम कोर्ट नाराज, कहा- यह ‘नरसंहार’

नई दिल्ली, 29 सितंबर उच्चतम न्यायालय ने जीवन रक्षक दवाओं की अत्यधिक कीमत (ओवर प्राइसिंग) वसूलने पर चिंता जताते हुए इसकी कड़े शब्दों में निंदा की है। न्यायालय ने कैंसर की दवाओं पर 10 गुना तक मुनाफा कमाने को 'नरसंहार' करार दिया है। न्यायालय ने कहा कि क्यों न दवाओं पर 16 फीसदी मार्जिन फिक्स कर दी जाए? अगली सुनवाई 12 अक्टूबर को होगी।
सुनवाई के दौरान जस्टिस विक्रम नाथ की बेंच ने इस बात पर गहरा दुख जताया कि कैसे कॉर्पोरेट अस्पताल आम नागरिकों और करदाताओं की कीमत पर दवाओं के दाम बढ़ा रहे हैं। न्यायालय ने यह भी कहा है कि फार्मा कंपनियों को मरीजों की कोई चिंता नहीं है। कैंसर दवा का ग्राहकों से लिया जाने वाला अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) 22,437 रुपये होता है। रिटेलर के लिए इसकी कीमत सिर्फ 3,520 रुपये होती है। यह सीधे-सीधे नरसंहार है। कॉरपोरेट अस्पताल उद्योग की तरह काम कर रहे हैं।
न्यायालय ने पूछा कि दवाओं की कीमत तय करने की व्यवस्था में ऐसा अंतर क्यों है? न्यायालय ने कहा कि आखिर ऐसी जरूरी दवाओं को मूल्य नियंत्रण से बाहर कैसे रखा जा सकता है। न्यायालय ने कहा कि 27 हजार रुपये एमआरपी वाली कैंसर की एक दवा का प्राइस टू रिटेलर करीब 3,000 रुपये है, जो अत्यधिक अंतर है। न्यायालय ने पूछा कि ड्रग्स प्राइस कंट्रोल ऑर्डर यानि डीपीसीओ में आवश्यक और गैर आवश्यक दवाओं के बीच अंतर क्यों किया गया है?
उच्चतम न्यायालय ने कहा कि कॉरपोरेट अस्पताल मरीजों को अक्सर अपनी इन-हाउस फार्मेसी से ही दवा खरीदने के लिए कहते हैं। न्यायालय ने सरकारी अस्पतालों में इलाज को लेकर भी सवाल किया और पूछा कि अगर मरीज का इलाज किसी सरकारी योजना के तहत हो रहा है, तो इन दवाओं की महंगी कीमत का भुगतान कौन करता है? न्यायालय ने यह भी सवाल उठाया कि 16 फीसदी का एक समान मानदंड क्यों नहीं हो सकता और इसके ऊपर कुछ भी क्यों हो?

