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समाज और परिवार "मैं" से नहीं, "हम" से बनते हैं

 
  समाज और परिवार "मैं" से नहीं, "हम" से बनते हैं

कंचन मेहता
काउंसलर एवं लेखिका

मनोविज्ञान के अनुसार मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। उसका व्यक्तित्व केवल उसकी व्यक्तिगत उपलब्धियों से नहीं, बल्कि उसके संबंधों, व्यवहार और सामाजिक जुड़ाव से भी निर्मित होता है। जीवन में अपनी आवश्यकताओं, इच्छाओं और लक्ष्यों की पूर्ति करना स्वाभाविक है, लेकिन जब व्यक्ति का व्यवहार केवल अपने लाभ, सुविधा और स्वार्थ तक सीमित हो जाता है, तब यह एक व्यवहारिक और सामाजिक समस्या का रूप लेने लगता है।
आज परिवारों में बढ़ती दूरियों और रिश्तों में आती खटास के पीछे अनेक कारण हो सकते हैं, लेकिन उनमें से एक महत्वपूर्ण कारण स्व-केंद्रित सोच भी है। पहले परिवारों में सामूहिकता की भावना अधिक दिखाई देती थी। घर का कोई एक सदस्य कठिनाई में होता था तो पूरा परिवार उसके साथ खड़ा रहता था। त्याग, सहयोग, धैर्य और परस्पर सम्मान परिवार की नींव माने जाते थे। आज परिस्थितियां बदल रही हैं। कई बार परिवार के सदस्य एक-दूसरे की भावनाओं को समझने के बजाय केवल अपनी अपेक्षाओं और अधिकारों पर अधिक ध्यान देने लगे हैं।
माता-पिता, पति-पत्नी, भाई-बहन अथवा अन्य पारिवारिक रिश्तों में जब संवाद कम और अपेक्षाएं अधिक हो जाती हैं, तब तनाव उत्पन्न होने लगता है। कई बार विवाद संसाधनों की कमी से नहीं, बल्कि इस सोच से जन्म लेते हैं कि "मेरी आवश्यकता पहले पूरी होनी चाहिए।" जब परिवार में "हम" की भावना कमजोर पड़ती है और "मैं" की भावना मजबूत हो जाती है, तब भावनात्मक दूरी बढ़ने लगती है।
मनोविज्ञान में इस प्रवृत्ति को स्व-केंद्रित व्यवहार (Self-Centered Behavior) कहा जाता है। कुछ परिस्थितियों में यह शोषणकारी व्यवहार (Exploitative Behavior) का रूप भी ले सकती है, जिसमें व्यक्ति दूसरों की भावनाओं, संघर्षों और परिस्थितियों को समझने के बजाय केवल अपने हितों को प्राथमिकता देता है। ऐसे लोग कभी-कभी दूसरों की मजबूरियों का लाभ भी उठा लेते हैं और इसे सामान्य व्यवहार मानते हैं।
परिवार समाज की सबसे छोटी इकाई है। जब परिवारों में सहयोग, विश्वास और संवेदनशीलता कम होती है, तो उसका प्रभाव पूरे समाज पर दिखाई देता है। यही कारण है कि आज सामाजिक संबंधों में भी औपचारिकता बढ़ती जा रही है। मित्रता, पड़ोस, सामाजिक संगठन और कार्यस्थल के संबंधों में भी कई बार लाभ-हानि का दृष्टिकोण प्रमुख हो जाता है। व्यक्ति यह सोचने लगता है कि सामने वाला उसके लिए कितना उपयोगी है, न कि वह स्वयं समाज के लिए कितना उपयोगी है।
मनोवैज्ञानिक दृष्टि से अत्यधिक स्वार्थी व्यवहार के पीछे असुरक्षा की भावना, भविष्य का भय, प्रतिस्पर्धा का दबाव, बचपन के अनुभव और भौतिक सफलता को जीवन का अंतिम लक्ष्य मान लेने जैसी मानसिकताएं कार्य कर सकती हैं। धीरे-धीरे व्यक्ति यह मान बैठता है कि केवल स्वयं के बारे में सोचना ही सफलता का मार्ग है। यही सोच उसे संवेदनशीलता और मानवीय मूल्यों से दूर ले जाती है।
वास्तविकता यह है कि कोई भी परिवार केवल आर्थिक संसाधनों से मजबूत नहीं बनता और कोई भी समाज केवल कानूनों के सहारे नहीं चलता। परिवार और समाज दोनों का आधार विश्वास, सहयोग, सहानुभूति, कृतज्ञता और पारस्परिक सम्मान हैं। जब लेने की अपेक्षा देने की भावना विकसित होती है, तब संबंध मजबूत होते हैं और सामाजिक वातावरण सकारात्मक बनता है।
आज आवश्यकता है कि बच्चों और युवाओं को केवल प्रतिस्पर्धा और सफलता ही नहीं, बल्कि संबंधों का महत्व भी सिखाया जाए। उन्हें यह समझाया जाए कि जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि केवल धन, पद या प्रतिष्ठा नहीं, बल्कि ऐसे रिश्ते हैं जो कठिन समय में भी साथ खड़े रहें।
मनोविज्ञान का स्पष्ट संदेश है कि स्वार्थ व्यक्ति को अस्थायी लाभ दे सकता है, लेकिन सम्मान, विश्वास और अपनापन केवल संवेदनशील व्यवहार से ही प्राप्त होते हैं। जो व्यक्ति दूसरों की भावनाओं और आवश्यकताओं को समझते हुए आगे बढ़ता है, वही वास्तव में सफल और संतुलित जीवन जी पाता है।
याद रखिए, मजबूत परिवारों से ही मजबूत समाज बनता है, और परिवार तथा समाज दोनों "मैं" से नहीं, "हम" से बनते हैं।