सुख को बांटने से ही संतोष मिलता है, यही 'सर्वे भवन्तु सुखिन:' है: साध्वी ऋतंभरा

पद्मभूषण साध्वी ऋतंभरा रहीं। उन्होंने अपने भावपूर्ण, ओजपूर्ण संबोधन में सेमिनार की मुख्य थीम 'सर्वे भवन्तु सुखिन:' पर इतने धाराप्रवाह से अपनी बात रखी कि उपस्थित सभी गणमान्य अतिथि व दर्शक भावनाओं के सागर में गोते लगाते नजर आए। उन्होंने कहा कि सुख को बांटने से ही संतोष मिलता है, यही तो 'सर्वे भवन्तु सुखिन:' है। अकेले कभी सुख का अहसास नहीं होता। मंदिर का प्रसाद नारी शक्ति किस प्रकार ग्रहण करती है। वह अपने पल्लू में उसे बांध लेती है, फिर घर आकर प्रसाद का एक-एक दाना परिवार के सभी सदस्यों को वितरित करती है। यह दृश्य और अहसास कितना आनन्ददायक है, यही 'सर्वे भवन्तु सुखिन:'है।
साध्वी ऋतंभरा ने एक अन्य उदाहरण देते हुए कहा कि किसी को सुखी, तृप्त, तनाव रहित देखकर ऐसा भाव आता है जो आंखों से पानी के रूप में छलक उठता है। परहित के लिए ऐसी भावना रखने वाले को प्रभु भक्ति के लिए अर्घ्य देने की आवश्यकता नहीं होती, वह अर्घ्य तो आंखों से प्रवाहित हो चुका।
साध्वी ऋतंभरा ने संत नामदेव का उदाहरण देते हुए विनम्रता धारण करने का संदेश दिया। पड़ोस में दुख है, संकट है, व्याकुलता है तो अपने घर में व्यंजन नहीं बनता, यही 'वसुधैव कुटुंबकम्' है। परिवार, समाज, राज्य, राष्ट्र सभी को अपना मानना है।
मानव का हृदय कूप या कुएं जैसा होना चाहिए, वो कुआं जिसका जल अनंत जलस्रोत से जुड़ा होता है, कभी खाली नहीं होता, कभी खत्म नहीं होता।
साध्वी ऋतंभरा ने कहा कि सनातनियों को जड़ में भी चेतन का अहसास हो जाता है। यही वसुधैव कुटुंबकम् की प्रबल भावना है।
अपनों के अवगुणों की मिट्टी हटा कर गुणों को ढूंढ़िये। जैसे मनों (मापन) मिट्टी में केवल एक या दो सोने के कण मिलते हैं, उसी प्रकार मानव के एक-एक गुण को ढूंढ़ना, उसका शुद्धिकरण करना, उसे तराशना भी 'सर्वे भवन्तु सुखिन:' संदेश का हिस्सा है। "अहम में वयम्, मैं में हम, व्यष्टि में सृष्टि" ही सनातन का मूल आधार है।
"हर पनघट मेरा पनघट है
हर गागर मेरी गागर है"
साध्वी ऋतंभरा ने रोचक अंदाज में एक बहू का भी जिक्र किया जिसने एक अवसर पर दूरगामी संदेश वाली बात कही लेकिन उसके ससुर ने उसका उल्टा अर्थ समझ लिया। बाद में ससुर व पूरे परिवार ने बहू के महत्व को माना। पिछले जन्म के पुण्यों का लाभ इस जन्म में ले रहे हैं तो वह बासी है। इसी जन्म के कर्मों का ताजा पुण्य लाभ लेने की आदत डालनी होगी। हर व्यक्ति अपने आप में एक संस्था है। साध्वी ऋतंभरा ने अपने संबोधन के दौरान संस्था 'चेतना' और इसके अध्यक्ष राजेश चेतन की बार-बार मुक्तकंठ से प्रशंसा की।
*'वात्सल्य ग्राम' पर
विशेष डॉक्यूमेंट्री*
इस अवसर पर 52 एकड़ में निर्मित 'वात्सल्य ग्राम' पर विशेष डाक्यूमेंट्री दिखाई गई। इस ग्राम की थीम है 'पालने से पालकी तक'। निराश्रित, असहाय, बालिकाओं को शिक्षित, संस्कारित करके समाज को नई दिशा देने वाली मातृशक्ति में परिवर्तित करना 'वात्सल्य ग्राम' का लक्ष्य है। साध्वी ऋतंभरा इसकी संस्थापक हैं।
'सर्व मंगला पीठम'
सेमिनार के दौरान यह जानकारी भी दी गई कि साध्वी ऋतंभरा ऐसे मंदिर का निर्माण भी करवा रही हैं जिसमें आस्था, श्रद्धा को वैज्ञानिक और तार्किक आधार सूत्र से जोड़ा जाएगा। 'सर्व मंगला पीठम' मंदिर पर 135 करोड़ का खर्च आएगा। सेमिनार के दौरान श्रद्धालुओं ने मंदिर के लिए दिल खोलकर दान दिया।
'चेतना' के अध्यक्ष एवं अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कवि राजेश चेतन ने
बेहद प्रभावशाली मंच संचालन से गणमान्य अतिथियों व सभी उपस्थित जनों को प्रभावित किया।
गोल्डन मसाले के निर्माता
अनिल सिंघल ने सेमिनार के प्रायोजक व स्वागताध्यक्ष का दायित्व संभाला। सुबह साढ़े नौ बजे शुरू हुए सेमिनार की अध्यक्षता एकल संस्थान की चेयरपर्सन मंजू श्रीवास्तव ने संभाली। उन्होंने कहा कि भारत आज एक उगता सूरज है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के पीछे एक समर्थ भारत खड़ा है। विकास को आगे बढ़ाया जा रहा है, हर गांव को शक्ति केंद्र बनाया जा रहा है।
उन्होंने एक लाख स्कूलों के रूप में एकल अभियान, संघ की वनवासी कल्याण यात्रा, संस्कार यात्रा, ग्राम स्वराज आदि अनेक पहलुओं पर प्रकाश डाला।
इस्कान, रोहिणी के अध्यक्ष केशव मुरारी दास ने विशिष्ट अतिथि के रूप में सेमिनार में भाग लिया।
उन्होंने कहा कि भारत को दस साल में फिर विश्व गुरु बनाया जा सकता है, जरूरत है समान विचारधारा वाले लोगों (लाइक माइंडेड पर्सन्स) को इकट्ठा करने की। धर्म को सही से समझिए, कोई आपको डिगा नहीं सकता, कन्वर्जन (धर्म परिवर्तन), लव जिहाद को आसानी से रोका जा सकता है। स्कूल में धर्म की शिक्षा शुरू की जाए।
रोहिणी के पूर्व विधायक जयभगवान अग्रवाल ने भी कार्यक्रम में कई महत्वपूर्ण दायित्व संभाले।

