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आरबीआई ने चालू वित्त वर्ष के लिए जीडीपी वृद्धि दर अनुमान घटाकर 6.6 फीसदी किया

 
  आरबीआई ने चालू वित्त वर्ष के लिए जीडीपी वृद्धि दर अनुमान घटाकर 6.6 फीसदी किया
मुंबई, 05 जून  रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) ने चालू वित्त वर्ष 2026-27 के लिए सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वृद्धि दर का अनुमान घटाकर 6.6 फीसदी कर दिया है। केंद्रीय बैंक ने अप्रैल में जीडीपी की वृद्धि दर 6.9 फीसदी रहने का अनुमान जताया था।
आरबीआई के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने शुक्रवार को यहां चालू वित्त वर्ष की दूसरी द्विमासिक मौद्रिक नीति समीति (एमपीसी) की तीन दिवसीय समीक्षा बैठक के फैसले की घोषणा करते हुए कहा कि कई उच्च-आवृत्ति संकेतकों से पता चलता है कि संकट शुरू होने के बाद से घरेलू आर्थिक गतिविधियां काफी हद तक स्थिर बनी हुई हैं। उन्होंने कहा कि भारत के विनिर्माण और सेवा क्षेत्र के पीएमआई से पता चलता है कि दोनों क्षेत्र मजबूत बने हुए हैं एवं व्यावसायिक अपेक्षाएं अब भी सकारात्मक हैं।
आरबीआई गवर्नर ने बताया कि मांग पक्ष पर निजी खपत अब तक मजबूत बनी हुई है। बढ़ती लागत के दबाव के बावजूद स्थिर निवेश ने भी अपनी गति बनाए रखी है। माल निर्यात में अप्रैल में ढुलाई और बीमा लागत के अधिक होने के बावजूद मजबूत वृद्धि दर्ज की। संजय मल्होत्रा ने कहा कि इन सभी कारकों को ध्यान में रखते हुए चालू वित्त वर्ष 2026-27 के लिए वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर 6.6 फीसदी रहने का अनुमान है। इसमें पहली तिमाही में इसके 6.6 फीसदी, दूसरी तिमाही में 6.3 फीसदी, तीसरी तिमाही में 6.5 फीसदी और चौथी तिमाही में 6.8 फीसदी रहने का अनुमान है।
मल्होत्रा ने कहा कि कुल मिलाकर आर्थिक स्थिति व्यापक रूप से मजबूत बनी हुई है। उन्होंने कहा कि आगे चलकर ऊर्जा और अन्य कच्चे माल की कीमतों में वृद्धि तथा आपूर्ति व्यवधान आर्थिक गतिविधियों पर दबाव डाल सकते हैं। प्रभावित वस्तुओं में आयात विविधीकरण से आपूर्ति में सुधार हो सकता है, लेकिन इसकी लागत अधिक होगी। आरबीआई गवर्नर ने कहा कि कुल प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि पश्चिम एश्यिा संकट कितने समय तक चलता है, आपूर्ति श्रृंखलाओं के सामान्य होने में कितना समय लगता है और विभिन्न हितधारकों के बीच भार का बंटवारा कैसे होता है।
इसके साथ ही उन्होंने कहा कि कमजोर वैश्विक मांग और ऊंची लॉजिस्टिक लागत वस्तु निर्यात के लिए चुनौती हैं, जबकि सेवा निर्यात अपनी गति बनाए रखेगा, क्योंकि भारतीय सेवाओं की मांग मजबूत बनी हुई है। सेवा निर्यात भी बेहतर बना हुआ है, जो कृत्रिम मेधा (एआई) को लेकर चिंताओं के बावजूद निरंतर मांग को दर्शाता है।