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समाज का मनोविज्ञान : दिव्यांग बच्चों को सहानुभूति नहीं, सम्मान और अपनत्व की आवश्यकता

 
 समाज का मनोविज्ञान : दिव्यांग बच्चों को सहानुभूति नहीं, सम्मान और अपनत्व की आवश्यकता

 समाज की वास्तविक संवेदनशीलता का परिचय उसके दिव्यांग बच्चों के प्रति व्यवहार से मिलता है; उपेक्षा नहीं, समान भागीदारी और भावनात्मक स्वीकार्यता से विकसित होता है आत्मविश्वास

लेखिका : काउंसलर कंचन मेहता
एम.ए. (मनोविज्ञान), काउंसलर, दिशा, सिरसा

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। उसका व्यक्तित्व, व्यवहार, भावनाएं और सोच परिवार तथा समाज के वातावरण में विकसित होती हैं। मनोविज्ञान के अनुसार समाज केवल व्यक्तियों का समूह नहीं, बल्कि विचारों, भावनाओं, संबंधों और व्यवहारों की एक ऐसी व्यवस्था है, जिसका प्रभाव प्रत्येक व्यक्ति के मानसिक विकास पर पड़ता है। लेकिन एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि हमारा समाज दिव्यांग बच्चों को कितनी सहजता से स्वीकार करता है?

हम अपने परिवार और समाज में खुशियां मनाते हैं, जन्मदिन मनाते हैं, विवाह समारोह आयोजित करते हैं और धार्मिक उत्सवों में भाग लेते हैं। इन अवसरों पर सभी को आमंत्रित करने का प्रयास करते हैं, लेकिन कई बार दिव्यांग बच्चों की भागीदारी को अनजाने में ही नजरअंदाज कर देते हैं। यही उपेक्षा उनके मन में अकेलेपन और अलग होने की भावना पैदा कर सकती है।

दिव्यांग बच्चों का भी है अपना भावनात्मक संसार

मनोविज्ञान बताता है कि प्रत्येक बच्चे को प्रेम, सुरक्षा, सम्मान और स्वीकार्यता की आवश्यकता होती है। दिव्यांग बच्चे भी अपने आसपास होने वाली गतिविधियों में अपनी क्षमताओं और समझ के अनुसार भाग लेना चाहते हैं। वे भी चाहते हैं कि परिवार के सदस्य उनसे बातचीत करें, उनकी पसंद पूछें, उन्हें प्रोत्साहित करें और खुशियों में साथ रखें।

दिव्यांगता किसी बच्चे के व्यक्तित्व की संपूर्ण पहचान नहीं है। उसकी अपनी रुचियां, भावनाएं, प्रतिभाएं और विशेष क्षमताएं हो सकती हैं। आवश्यकता केवल उन्हें पहचानने तथा विकसित करने के अवसर प्रदान करने की है।

उपेक्षा का मनोवैज्ञानिक प्रभाव

जब किसी बच्चे को बार-बार पारिवारिक अथवा सामाजिक कार्यक्रमों से अलग रखा जाता है, तो उसके आत्मसम्मान और सामाजिक जुड़ाव पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। कुछ बच्चों में संकोच, असुरक्षा या अकेलेपन की भावना विकसित हो सकती है।

इसके विपरीत जब परिवार और समाज उन्हें अपनत्व देते हैं, उनकी बात सुनते हैं तथा छोटी-छोटी उपलब्धियों की सराहना करते हैं, तो उनके आत्मविश्वास और भावनात्मक सुरक्षा को बल मिलता है।

सहानुभूति से आगे बढ़कर समानता का व्यवहार

हमें दिव्यांग बच्चों के प्रति केवल दया दिखाने की मानसिकता से आगे बढ़ना होगा। उन्हें हर समय सहायता की आवश्यकता वाले व्यक्ति के रूप में देखने के बजाय उनकी स्वतंत्रता, गरिमा और निर्णय लेने की क्षमता का सम्मान करना चाहिए।

यदि किसी परिवार में दिव्यांग बच्चा है, तो उसे परिवार की खुशियों का स्वाभाविक हिस्सा बनाना चाहिए। यदि पड़ोस या रिश्तेदारी में कोई दिव्यांग बच्चा है, तो उससे मिलने, बातचीत करने और उसे कार्यक्रमों में शामिल करने की पहल करनी चाहिए।

समाज की सोच बदलना जरूरी

समावेशी समाज वह है, जहां किसी बच्चे को उसकी शारीरिक, बौद्धिक, संवेदी या विकासात्मक भिन्नता के कारण कमतर नहीं समझा जाता। जहां उसकी जरूरतों के अनुसार सुविधाएं और सहयोग उपलब्ध होते हैं तथा उसे समान सम्मान दिया जाता है।

याद रखिए, दिव्यांग बच्चों को समाज की दया नहीं, समाज में अपना सम्मानजनक स्थान चाहिए।

समाज का वास्तविक मनोविज्ञान तभी सकारात्मक कहलाएगा, जब हम प्रत्येक बच्चे को यह विश्वास दिला सकेंगे कि वह हमारे परिवार, हमारी खुशियों और हमारे समाज का महत्वपूर्ण हिस्सा है।