विभाजन विभीषिका: 14 अगस्त 1947 के दर्द से आज भी कराह रहा है पंजाब
देश के विभाजन के जख्म आज भी बने हुए है नासूर, कत्ले-आम को याद कर कांपती है रूह
Aug 14, 2025, 13:48 IST

सिरसा, 14 अगस्त। 14 अगस्त 1947 भारत की स्वतंत्रता की पूर्व संध्या, जिसे दुनिया ने एक ऐतिहासिक दिन के रूप में देखा, लेकिन पंजाब की धरती पर यह दिन खुशियों से अधिक चीख़ों और आंसुओं का प्रतीक बन गया था, आज़ादी की रात के साथ आई विभाजन विभीषिका ने लाखों जिंदगियों को मलबे में बदल दिया। खासकर पंजाबी वर्ग जो मेहनतकश, व्यापारिक और खेती से जुड़ा वर्ग था उनके लिए यह दिन बरबादी का पैग़ाम लेकर आया। एक ओर जहां कत्ल पर लाशों के ढ़ेर लगा दिए गए थे, जमकर लूटपाट हुई और मां=बहनों की आबरू लूट पर उनके अंग-भंग किए गए थे, ये वो जख्म है जो आज भी नासूर बनकर रूह से लिपटे हुए है। उन दिनों की यादकर रूह कांपने लगती है तो आंखों से आंसू बहने लगते है। पाकिस्तान से भारत आए हिंदुओं ने मेहनत के बल पर उच्च मुकाम हासिल कर लिया है पर उनके जख्मों को आज तक कोई भी मरहम नहीं भर सका। सरकार कभी कभी सहानुभूति का पेल लगाकर विभाजन विभीषिका पीडि़तों का दर्द क म करने का प्रयास जरूर करती है।
पंजाब केवल एक भूगोल नहीं था, यह संस्कृति, भाईचारे और प्रेम का प्रतीक था। लेकिन 14 अगस्त 1947 को जब सरहद खींची गई, तो यह सरहद दिलों के बीच भी उतर आई। गाँव के गाँव, शहर के शहर दो हिस्सों में बंट गए। लाहौर, मुल्तान, रावलपिंडी, सियालकोट जैसे केंद्र, जहां व्यापार, शिक्षा और संस्कृति फली-फूली थी, एक रात में दूसरे मुल्क का हिस्सा बन गए।
पंजाब के मेहनतकश और व्यापारी वर्ग के लोग किसान, बुनकर, बढ़ई, सुनार, लुहार, दुकानदार सब अपनी मेहनत से घर-बार और कारोबार खड़ा करते थे। विभाजन ने उनसे न सिर्फ़ उनकी ज़मीन और मकान छीने, बल्कि उनकी मेहनत की कमाई, पीढिय़ों का जोड़ा धन और पहचान भी लूट ली। एक किसान जो अपने खेत में गेहूं की फसल काटने को तैयार था, उसे बिना एक बाल्टी पानी पिए गाँव छोडऩा पड़ा। एक सुनार जिसने सोने की दुकान में दशकों की मेहनत का संग्रह रखा था, वह सब लुटेरों के हाथ चला गया। औरतों की अस्मत, बच्चों की मासूमियत सब कुछ इस खूनखराबे में खो गया।
लाखों लोग अपने ही घरों से बेघर हो गए। रेलगाडिय़ां मौत की गाडिय़ों में बदल गईं। सिरसा, फिरोजपुर, अमृतसर, पटियाला जैसे इलाकों में लोगों ने अपने घर छोडक़र उन जगहों की ओर पलायन किया, जहाँ वे कभी नहीं गए थे। कई परिवारों ने तो केवल कपड़ों में लिपटा अपना जीवन बचाया। एक हाथ में बच्चे को पकडऩा और दूसरे में एक गठरी में आटा या अनाज यही उनकी सारी जमा पूंजी रह गई थी। विभाजन के दिनों में पंजाब की गलियां खून से भर गईं। गांवों में कत्लेआम, लूटपाट, आगजनी और बलात्कार की घटनाओं ने मानवता को शर्मसार कर दिया। जो कभी मेलों में एक-दूसरे को गले लगाते थे, वही लोग सरहद के नाम पर दुश्मन बना दिए गए। इस हिंसा ने न केवल जिस्म को जख्मी किया, बल्कि आत्मा तक को घायल कर दिया। पंजाबी वर्र्ग के बुजुर्ग आज भी बताते हैं कि कैसे उन्होंने अपने खेत, बैल, हल, कुएं, मकान और यहां तक कि पुश्तैनी मंदिर-गुरुद्वारे पीछे छोड़ दिए। एक बुजुर्ग की जुबानी- हमारे आंगन में नीम का पेड़ था, जिसकी छांव में मैं खेला करता था। आज भी सपनों में वह नीम दिखाई देता है, पर अब वह पाकिस्तान में है।
विभाजन की सबसे गहरी चोट महिलाओं पर पड़ी। उन्हें अपहरण, बलात्कार, और हत्या जैसी अमानवीय यातनाएं सहनी पड़ीं। बहुत सी महिलाओं ने अपनी इज्जत बचाने के लिए कुओं में छलांग लगा दी। यह दर्द केवल शरीर का नहीं था, यह आत्मा को चीर देने वाला घाव था, जो पीढिय़ों तक महसूस किया गया। विभाजन के बाद जब पंजाबी वर्ग भारत के हिस्से में आए, तो उन्हें नई जिंदगी शुरू करनी पड़ी। न जमीन थी, न घर, न पूंजी। कई परिवारों ने तंबुओं और शरणार्थी शिविरों में महीनों बिताए। सरकार ने पुनर्वास के प्रयास किए, लेकिन जो खोया था, उसकी भरपाई असंभव थी। फिर भी इस मेहनतकश वर्ग ने हार नहीं मानी। उन्होंने दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश जहां भी जगह मिली, मेहनत से अपना घर-बार और कारोबार फिर से खड़ा किया। विभाजन ने पंजाबी वर्क को दोहरी मार दी आर्थिक नुकसान और मानसिक आघात। जिनके पास लाखों का कारोबार था, वे सडक़ों पर रोटियों के लिए तरसने लगे। जिनकी पहचान एक व्यापारी, किसान या कारीगर की थी, वे शरणार्थी कहलाए। और सबसे बड़ी चोट थी अपने गांव-शहर, रिश्तेदार, और बचपन की मिट्टी से जुदा होना।
आज 78 साल बाद भी विभाजन का जख्म पूरी तरह नहीं भरा है। बुजुर्गों की आंखों में पाकिस्तान में छूटे घरों की तस्वीरें हैं, और नई पीढ़ी के कानों में उन दिनों के किस्से गूंजते हैं। पंजाबी वर्क ने मेहनत से खुद को फिर खड़ा किया, लेकिन 14 अगस्त 1947 की रात की वो चीखें इतिहास की किताबों में ही नहीं, उनके दिलों में भी कैद हैं। 14 अगस्त 1947 का दिन भारत के लिए स्वतंत्रता की सौगात लेकर आया, लेकिन पंजाब और खासकर पंजाबी वर्र्ग के लिए यह दिन विभाजन की विभीषिका और असहनीय पीड़ा का प्रतीक बन गया। आज जब हम स्वतंत्रता का जश्न मनाते हैं, तो हमें उन लाखों बेगुनाहों को याद करना चाहिए जिन्होंने अपनी जान, घर, और परिवार इस विभाजन में खो दिए। उनकी कुर्बानियां और पीड़ा हमें हमेशा यह सिखाती हैं कि नफरत की दीवारें सिर्फ बर्बादी लाती हैं, और इंसानियत की राह ही हमें सच्ची आज़ादी दे सकती है।
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हिंदू-मुस्लिम हिंसा की आग में हुई थी 10 लाख लोगों की मौत
विभाजन के बाद के महीनों में दोनों नये देशों के बीच विशाल जन स्थानांतरण हुआ। पाकिस्तान में बहुत से हिन्दुओं और सिखों को बलात् बेघर कर दिया गया। लेकिन भारत में महात्मा गांधी ने कांग्रेस पर दबाव डाला और सुनिश्चित किया कि मुसलमान अगर चाहें तो भारत में रह सकें। सीमा रेखाएं तय होने के बाद लगभग 1.45 करोड़ लोगों ने हिंसा के डर से सीमा पार करके बहुमत संप्रदाय के देश में शरण ली। भारत की जनगणना 1951 के अनुसार विभाजन के एकदम बाद 72,26,000 मुसलमान भारत छोडक़र पाकिस्तान गये और 72,49,000 हिन्दू और सिख पाकिस्तान छोडक़र भारत आए। इसमें से 78 प्रतिशत स्थानांतरण पश्चिम में, मुख्यतया पंजाब में हुआ। अग्रेजों ने भारत को आजादी देते हुए जो घिनौना खेल खेला था, उसकी वजह से पूरा देश हिंदू-मुस्लिम हिंसा की आग में धधक उठा था और कुल 10 लाख लोगों की मौत हुई थी। उस वक्त ब्रिटिश सरकार को यह अंदेशा भी नहीं था कि विभाजन की यह आग इस कदर फैलेगी।
लोगों को हैवानियत की हद तक प्रताडि़त कर मारा गया
डोमनीक लापियर और लैरी कॉलिंस ने अपनी किताब ‘फ्रीडम एड मिडनाइट’ में लिखा है कि जिन लोगों को गोली मारी गई, उनकी खुशकिस्मती थी, अन्यथा अधिकतर लोगों को हैवानियत की हद तक प्रताडि़त कर मारा गया था। किसी को लाठी डंडे से पीटकर मारा गया, तो किसी को पत्थर से कूटकर मारा गया, तलवारों और अन्य हथियारों से मारकाट की गई। लोगों पर नफरत इस कदर हावी थी कि वे पागल हो गए थे और गला दबाकर और नाखूनों से नोंचकर भी लोगों को मारने पर आमदा थे। किताब में यह जिक्र भी है कि लोगों को जिंदा जला दिया गया था और महिलाओं को मारने से पहले उनके स्तन काट दिए जाते थे और बलात्कार किया गया था।
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रावलपिंडी के गांव ‘थोहा खालसा से हुआ था भयंकर नरसंहार शुरू
भारत के विभाजन के बाद जो हिंसा फैली थी उसकी शुरुआत भारत विभाजन से पहले ही हो गई थी. ब्रिटिश भारत के पंजाब प्रांत में एक भयंकर हिंसा हुई थी, जिसके बारे में यह कहा जाता है कि इस हिंसा में 2000 से 7000 हिंदू और सिख मारे गए थे। इन लोगों की हत्या इसलिए की गई थी क्योंकि कुछ हिंदू और सिख संगठनों ने भारत के विभाजन और पाकिस्तान की मांग का विरोध किया था। इनके प्रदर्शनों से मुसलमान नाराज हो गए और इनकी नाराजगी का परिणाम सिखों और हिंदुओं की हत्या के रूप में सामने आया। ‘थोहा खालसा’ रावलपिंडी जिले का एक गांव था जहां भयंकर नरसंहार हुआ। इस गांव में सिख और हिंदू एक गुरुद्वारे में आसरा लेकर बैठे थे। यह गांव सिखों का था, लेकिन आसपास मुसलमानों के गांव थे, जहां से हमलावर आए और गांव वालों पर हमला किया। गांव के लोगों ने पैसे देकर जान बचाने की कोशिश भी की, लेकिन बात नहीं बनी और अंतत: गांव के लगभग 200 लोग मारे गए, महिलाएं जिनकी संख्या सौ के आसपास बताई जाती है, अपने बच्चों के साथ गुरुद्वारा परिसर में स्थित कुएं में कूद गईं। कुछ महिलाओं को उनके घरवालों ने ही तलवार से काट दिया, ताकि वे बलात्कार और अन्य प्रताडऩा का शिकार ना हों.
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रावलपिंडी दंगे का असर पूरे देश पर हुआ
रावलपिंडी में जो नरसंहार हुआ, उसने नफरत की आग पूरे देश में भडक़ा दी थी। हिंदू और सिखों ने मुसलमानों से बदला लेने की ठान ली थी. बदले की भावना तब और खतरनाक हो गई जब देश का विभाजन भारत और पाकिस्तान के रूप में स्वीकार कर लिया गया. जिस इलाके में जिसका दबदबा था उन्होंने अल्पसंख्यकों पर अत्याचार किया. सिर्फ हिंदू और सिख ही इस दंगे में नहीं मारे गए बल्कि मुसलमान भी हजारों की संख्या में मारे गए। जब भारत-पाकिस्तान का विभाजन हुआ तो 10 मिलियन यानी एक करोड़ हिंदुओं को अपना घरबार छोडक़र भारत की धरती पर आना था, वहीं भारत से 05 मिलियन यानी 50 लाख मुसलमानों को पाकिस्तान जाना था। विभाजन विभिषका में पैदल ही कूच करने वाले हजारों लोग भूख से मर गए थे। 10 लाख से अधिक लोग इस विभाजन की त्रासदी का शिकार बने और मारे गए।
पंजाब केवल एक भूगोल नहीं था, यह संस्कृति, भाईचारे और प्रेम का प्रतीक था। लेकिन 14 अगस्त 1947 को जब सरहद खींची गई, तो यह सरहद दिलों के बीच भी उतर आई। गाँव के गाँव, शहर के शहर दो हिस्सों में बंट गए। लाहौर, मुल्तान, रावलपिंडी, सियालकोट जैसे केंद्र, जहां व्यापार, शिक्षा और संस्कृति फली-फूली थी, एक रात में दूसरे मुल्क का हिस्सा बन गए।
पंजाब के मेहनतकश और व्यापारी वर्ग के लोग किसान, बुनकर, बढ़ई, सुनार, लुहार, दुकानदार सब अपनी मेहनत से घर-बार और कारोबार खड़ा करते थे। विभाजन ने उनसे न सिर्फ़ उनकी ज़मीन और मकान छीने, बल्कि उनकी मेहनत की कमाई, पीढिय़ों का जोड़ा धन और पहचान भी लूट ली। एक किसान जो अपने खेत में गेहूं की फसल काटने को तैयार था, उसे बिना एक बाल्टी पानी पिए गाँव छोडऩा पड़ा। एक सुनार जिसने सोने की दुकान में दशकों की मेहनत का संग्रह रखा था, वह सब लुटेरों के हाथ चला गया। औरतों की अस्मत, बच्चों की मासूमियत सब कुछ इस खूनखराबे में खो गया।
लाखों लोग अपने ही घरों से बेघर हो गए। रेलगाडिय़ां मौत की गाडिय़ों में बदल गईं। सिरसा, फिरोजपुर, अमृतसर, पटियाला जैसे इलाकों में लोगों ने अपने घर छोडक़र उन जगहों की ओर पलायन किया, जहाँ वे कभी नहीं गए थे। कई परिवारों ने तो केवल कपड़ों में लिपटा अपना जीवन बचाया। एक हाथ में बच्चे को पकडऩा और दूसरे में एक गठरी में आटा या अनाज यही उनकी सारी जमा पूंजी रह गई थी। विभाजन के दिनों में पंजाब की गलियां खून से भर गईं। गांवों में कत्लेआम, लूटपाट, आगजनी और बलात्कार की घटनाओं ने मानवता को शर्मसार कर दिया। जो कभी मेलों में एक-दूसरे को गले लगाते थे, वही लोग सरहद के नाम पर दुश्मन बना दिए गए। इस हिंसा ने न केवल जिस्म को जख्मी किया, बल्कि आत्मा तक को घायल कर दिया। पंजाबी वर्र्ग के बुजुर्ग आज भी बताते हैं कि कैसे उन्होंने अपने खेत, बैल, हल, कुएं, मकान और यहां तक कि पुश्तैनी मंदिर-गुरुद्वारे पीछे छोड़ दिए। एक बुजुर्ग की जुबानी- हमारे आंगन में नीम का पेड़ था, जिसकी छांव में मैं खेला करता था। आज भी सपनों में वह नीम दिखाई देता है, पर अब वह पाकिस्तान में है।
विभाजन की सबसे गहरी चोट महिलाओं पर पड़ी। उन्हें अपहरण, बलात्कार, और हत्या जैसी अमानवीय यातनाएं सहनी पड़ीं। बहुत सी महिलाओं ने अपनी इज्जत बचाने के लिए कुओं में छलांग लगा दी। यह दर्द केवल शरीर का नहीं था, यह आत्मा को चीर देने वाला घाव था, जो पीढिय़ों तक महसूस किया गया। विभाजन के बाद जब पंजाबी वर्ग भारत के हिस्से में आए, तो उन्हें नई जिंदगी शुरू करनी पड़ी। न जमीन थी, न घर, न पूंजी। कई परिवारों ने तंबुओं और शरणार्थी शिविरों में महीनों बिताए। सरकार ने पुनर्वास के प्रयास किए, लेकिन जो खोया था, उसकी भरपाई असंभव थी। फिर भी इस मेहनतकश वर्ग ने हार नहीं मानी। उन्होंने दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश जहां भी जगह मिली, मेहनत से अपना घर-बार और कारोबार फिर से खड़ा किया। विभाजन ने पंजाबी वर्क को दोहरी मार दी आर्थिक नुकसान और मानसिक आघात। जिनके पास लाखों का कारोबार था, वे सडक़ों पर रोटियों के लिए तरसने लगे। जिनकी पहचान एक व्यापारी, किसान या कारीगर की थी, वे शरणार्थी कहलाए। और सबसे बड़ी चोट थी अपने गांव-शहर, रिश्तेदार, और बचपन की मिट्टी से जुदा होना।
आज 78 साल बाद भी विभाजन का जख्म पूरी तरह नहीं भरा है। बुजुर्गों की आंखों में पाकिस्तान में छूटे घरों की तस्वीरें हैं, और नई पीढ़ी के कानों में उन दिनों के किस्से गूंजते हैं। पंजाबी वर्क ने मेहनत से खुद को फिर खड़ा किया, लेकिन 14 अगस्त 1947 की रात की वो चीखें इतिहास की किताबों में ही नहीं, उनके दिलों में भी कैद हैं। 14 अगस्त 1947 का दिन भारत के लिए स्वतंत्रता की सौगात लेकर आया, लेकिन पंजाब और खासकर पंजाबी वर्र्ग के लिए यह दिन विभाजन की विभीषिका और असहनीय पीड़ा का प्रतीक बन गया। आज जब हम स्वतंत्रता का जश्न मनाते हैं, तो हमें उन लाखों बेगुनाहों को याद करना चाहिए जिन्होंने अपनी जान, घर, और परिवार इस विभाजन में खो दिए। उनकी कुर्बानियां और पीड़ा हमें हमेशा यह सिखाती हैं कि नफरत की दीवारें सिर्फ बर्बादी लाती हैं, और इंसानियत की राह ही हमें सच्ची आज़ादी दे सकती है।
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हिंदू-मुस्लिम हिंसा की आग में हुई थी 10 लाख लोगों की मौत
विभाजन के बाद के महीनों में दोनों नये देशों के बीच विशाल जन स्थानांतरण हुआ। पाकिस्तान में बहुत से हिन्दुओं और सिखों को बलात् बेघर कर दिया गया। लेकिन भारत में महात्मा गांधी ने कांग्रेस पर दबाव डाला और सुनिश्चित किया कि मुसलमान अगर चाहें तो भारत में रह सकें। सीमा रेखाएं तय होने के बाद लगभग 1.45 करोड़ लोगों ने हिंसा के डर से सीमा पार करके बहुमत संप्रदाय के देश में शरण ली। भारत की जनगणना 1951 के अनुसार विभाजन के एकदम बाद 72,26,000 मुसलमान भारत छोडक़र पाकिस्तान गये और 72,49,000 हिन्दू और सिख पाकिस्तान छोडक़र भारत आए। इसमें से 78 प्रतिशत स्थानांतरण पश्चिम में, मुख्यतया पंजाब में हुआ। अग्रेजों ने भारत को आजादी देते हुए जो घिनौना खेल खेला था, उसकी वजह से पूरा देश हिंदू-मुस्लिम हिंसा की आग में धधक उठा था और कुल 10 लाख लोगों की मौत हुई थी। उस वक्त ब्रिटिश सरकार को यह अंदेशा भी नहीं था कि विभाजन की यह आग इस कदर फैलेगी।
लोगों को हैवानियत की हद तक प्रताडि़त कर मारा गया
डोमनीक लापियर और लैरी कॉलिंस ने अपनी किताब ‘फ्रीडम एड मिडनाइट’ में लिखा है कि जिन लोगों को गोली मारी गई, उनकी खुशकिस्मती थी, अन्यथा अधिकतर लोगों को हैवानियत की हद तक प्रताडि़त कर मारा गया था। किसी को लाठी डंडे से पीटकर मारा गया, तो किसी को पत्थर से कूटकर मारा गया, तलवारों और अन्य हथियारों से मारकाट की गई। लोगों पर नफरत इस कदर हावी थी कि वे पागल हो गए थे और गला दबाकर और नाखूनों से नोंचकर भी लोगों को मारने पर आमदा थे। किताब में यह जिक्र भी है कि लोगों को जिंदा जला दिया गया था और महिलाओं को मारने से पहले उनके स्तन काट दिए जाते थे और बलात्कार किया गया था।
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रावलपिंडी के गांव ‘थोहा खालसा से हुआ था भयंकर नरसंहार शुरू
भारत के विभाजन के बाद जो हिंसा फैली थी उसकी शुरुआत भारत विभाजन से पहले ही हो गई थी. ब्रिटिश भारत के पंजाब प्रांत में एक भयंकर हिंसा हुई थी, जिसके बारे में यह कहा जाता है कि इस हिंसा में 2000 से 7000 हिंदू और सिख मारे गए थे। इन लोगों की हत्या इसलिए की गई थी क्योंकि कुछ हिंदू और सिख संगठनों ने भारत के विभाजन और पाकिस्तान की मांग का विरोध किया था। इनके प्रदर्शनों से मुसलमान नाराज हो गए और इनकी नाराजगी का परिणाम सिखों और हिंदुओं की हत्या के रूप में सामने आया। ‘थोहा खालसा’ रावलपिंडी जिले का एक गांव था जहां भयंकर नरसंहार हुआ। इस गांव में सिख और हिंदू एक गुरुद्वारे में आसरा लेकर बैठे थे। यह गांव सिखों का था, लेकिन आसपास मुसलमानों के गांव थे, जहां से हमलावर आए और गांव वालों पर हमला किया। गांव के लोगों ने पैसे देकर जान बचाने की कोशिश भी की, लेकिन बात नहीं बनी और अंतत: गांव के लगभग 200 लोग मारे गए, महिलाएं जिनकी संख्या सौ के आसपास बताई जाती है, अपने बच्चों के साथ गुरुद्वारा परिसर में स्थित कुएं में कूद गईं। कुछ महिलाओं को उनके घरवालों ने ही तलवार से काट दिया, ताकि वे बलात्कार और अन्य प्रताडऩा का शिकार ना हों.
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रावलपिंडी दंगे का असर पूरे देश पर हुआ
रावलपिंडी में जो नरसंहार हुआ, उसने नफरत की आग पूरे देश में भडक़ा दी थी। हिंदू और सिखों ने मुसलमानों से बदला लेने की ठान ली थी. बदले की भावना तब और खतरनाक हो गई जब देश का विभाजन भारत और पाकिस्तान के रूप में स्वीकार कर लिया गया. जिस इलाके में जिसका दबदबा था उन्होंने अल्पसंख्यकों पर अत्याचार किया. सिर्फ हिंदू और सिख ही इस दंगे में नहीं मारे गए बल्कि मुसलमान भी हजारों की संख्या में मारे गए। जब भारत-पाकिस्तान का विभाजन हुआ तो 10 मिलियन यानी एक करोड़ हिंदुओं को अपना घरबार छोडक़र भारत की धरती पर आना था, वहीं भारत से 05 मिलियन यानी 50 लाख मुसलमानों को पाकिस्तान जाना था। विभाजन विभिषका में पैदल ही कूच करने वाले हजारों लोग भूख से मर गए थे। 10 लाख से अधिक लोग इस विभाजन की त्रासदी का शिकार बने और मारे गए।

