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ड्रेपिंग का अर्थ, इतिहास और उपयोगिता कपड़े को सीधे ड्रेस फॉर्म पर आकार देकर डिजाइन को साकार करने की रचनात्मक कला

 
  ड्रेपिंग का अर्थ, इतिहास और उपयोगिता  कपड़े को सीधे ड्रेस फॉर्म पर आकार देकर डिजाइन को साकार करने की रचनात्मक कला

 लेखमाला भाग–9

फैशन डिजाइनिंग केवल कागज पर सुंदर स्केच बनाने या पैटर्न तैयार करने तक सीमित नहीं है। एक डिजाइनर के लिए यह समझना भी जरूरी है कि कपड़ा शरीर पर किस प्रकार गिरेगा, कहां फिट होगा और किस स्थान पर उसमें सुंदर फॉल, प्लीट या गेदर दिया जा सकता है। इसी उद्देश्य से फैशन डिजाइनिंग में ड्रेपिंग (Draping) तकनीक का प्रयोग किया जाता है। यह ऐसी रचनात्मक विधि है जिसमें कपड़े को सीधे ड्रेस फॉर्म या मानव आकृति पर व्यवस्थित करके परिधान का स्वरूप विकसित किया जाता है।

ड्रेपिंग क्या है?

ड्रेस फॉर्म पर कपड़े को पिन की सहायता से लगाकर, मोड़कर और आकार देकर परिधान का डिजाइन तैयार करने की प्रक्रिया को ड्रेपिंग कहा जाता है। इसमें डिजाइनर कपड़े को सीधे थ्री-डायमेंशनल रूप में देख सकता है। इस कारण उसे डिजाइन की फिटिंग, फॉल और आकार का वास्तविक अनुमान तुरंत मिल जाता है।

ड्रेपिंग करते समय ग्रेन लाइन, सेंटर फ्रंट, सेंटर बैक, बस्ट लाइन, कमर और हिप लाइन का विशेष ध्यान रखा जाता है। शुरुआत में सामान्यतः मसलिन जैसे कपड़े का प्रयोग किया जाता है, क्योंकि उस पर निशान लगाना और आवश्यक परिवर्तन करना आसान होता है।

ड्रेपिंग का इतिहास

ड्रेपिंग की अवधारणा बहुत पुरानी है। प्राचीन सभ्यताओं में सिलाई और आधुनिक पैटर्न मेकिंग विकसित होने से पहले वस्त्रों को शरीर के चारों ओर लपेटकर ही विभिन्न प्रकार के परिधान बनाए जाते थे। प्राचीन यूनान और रोम के परिधानों में कपड़े की स्वाभाविक फॉल और प्लीट का सुंदर प्रयोग देखने को मिलता था।

भारत में भी साड़ी, धोती और विभिन्न पारंपरिक वस्त्र ड्रेपिंग की समृद्ध परंपरा के उदाहरण हैं। समय के साथ फैशन उद्योग विकसित हुआ और ड्रेपिंग को व्यवस्थित तकनीक के रूप में फैशन डिजाइनिंग की शिक्षा में शामिल किया गया। आज इसका उपयोग साधारण परिधान से लेकर हाई फैशन और विशेष डिजाइनर कलेक्शन तक किया जाता है।

ड्रेपिंग की प्रक्रिया

ड्रेपिंग शुरू करने से पहले ड्रेस फॉर्म पर आवश्यक संदर्भ रेखाओं को स्पष्ट किया जाता है। कपड़े की ग्रेन लाइन को सही रखते हुए उसे सेंटर फ्रंट या सेंटर बैक से पिन किया जाता है। इसके बाद कपड़े को शरीर के आकार के अनुरूप व्यवस्थित करते हुए अतिरिक्त कपड़े को डार्ट, प्लीट, गेदर अथवा फोल्ड के रूप में नियंत्रित किया जाता है।

जब मनचाहा डिजाइन और फिटिंग प्राप्त हो जाती है तो सीम लाइन, नेकलाइन, आर्महोल, कमर तथा अन्य आवश्यक स्थानों पर निशान लगाए जाते हैं। इसके बाद कपड़े को ड्रेस फॉर्म से हटाकर इन निशानों के आधार पर अंतिम पैटर्न विकसित किया जा सकता है।

फैशन डिजाइनिंग में ड्रेपिंग की उपयोगिता

ड्रेपिंग का सबसे बड़ा लाभ यह है कि डिजाइनर अपनी कल्पना को सीधे कपड़े पर प्रयोग करके देख सकता है। कागज पर बनाए गए डिजाइन में कपड़े की वास्तविक फॉल का अनुमान लगाना कई बार कठिन होता है, जबकि ड्रेपिंग में परिणाम सामने दिखाई देता है।

इस तकनीक से काउल नेकलाइन, प्लीट, गेदर, असममित डिजाइन, स्कर्ट, गाउन और रचनात्मक सिल्हूट विकसित किए जा सकते हैं। डिजाइनर कपड़े की प्रकृति के अनुसार डिजाइन में तुरंत बदलाव भी कर सकता है।

रचनात्मकता और कौशल का संगम

ड्रेपिंग तकनीक विद्यार्थियों में कपड़े की समझ, फिटिंग की पहचान और रचनात्मक सोच विकसित करती है। नियमित अभ्यास से विद्यार्थी यह समझने लगते हैं कि अलग-अलग प्रकार के फैब्रिक शरीर पर किस प्रकार व्यवहार करते हैं।

एक सफल फैशन डिजाइनर के लिए ड्रेपिंग केवल परिधान बनाने की तकनीक नहीं, बल्कि अपनी कल्पना को सीधे कपड़े पर आकार देने की कला है। पैटर्न मेकिंग के साथ ड्रेपिंग का ज्ञान विद्यार्थी को अधिक प्रयोगशील और कुशल डिजाइनर बनने की दिशा में आगे बढ़ाता है।

कंचन मेहता
एम.ए. फैशन डिजाइनिंग
इंस्ट्रक्टर, चौधरी देवीलाल विश्वविद्यालय, सिरसा