राज्यपाल विधेयकों को अनिश्चित काल तक रोकते हैं ताे विधानमंडल मृतप्रायः हो जाएंगे : सुप्रीम कोर्ट
Aug 21, 2025, 19:41 IST

नई दिल्ली, 21 अगस्त उच्चतम न्यायालय
की पांच सदस्यीय संविधान बेंच ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की ओर से राष्ट्रपति और राज्यपालों के समक्ष विधेयकों को प्रस्तुत करने पर संविधान के अनुच्छेद 200 के तहत संवैधानिक विकल्पों पर भेजे गए रेफरेंस पर तीसरे दिन की सुनवाई पूरी कर ली। गुरुवार काे सुनवाई के दौरान न्यायालय
ने कहा कि अगर राज्यपाल अनिश्चित काल तक विधेयक को लंबित रखते हैं तो विधायिका मृतप्रायः हो जाएगी। संविधान बेंच इस मामले पर अगली सुनवाई अब 26 अगस्त (मंगलवार) को करेगा।
कोर्ट ने सुनवाई के दौरान पूछा कि राज्यपालों द्वारा विधेयक लंबित रखने की स्थिति में भी क्या न्यायालय शक्तिहीन है। इस पर केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि न्यायपालिका किसी विकट स्थिति को देखते हुए राष्ट्रपति और राज्यपाल को ऐसा दिशा-निर्देश जारी नहीं कर सकता जिसका नजीर के रुप में इस्तेमाल हो। मेहता ने कहा कि इसका राजनीतिक समाधान है। ऐसी परिस्थितियों में लोकतांत्रिक राजनीतिक प्रक्रिया ही समाधान है। मेहता ने कहा कि ऐसा समझना गलत है कि सभी संवैधानिक संस्थाएं असफल हो जाएं और केवल न्यायालय ही बचा हो। मेहता ने कहा कि न्यायालय संविधान का अभिरक्षक है लेकिन कई ऐसी समस्याएं हैं जिनका समाधान न्यायालय नहीं कर सकती है।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि राज्यपाल जनता के प्रति जवाबदेह नहीं होते हैं। राज्यपाल का पद काफी संवेदनशील होता है। राज्यपाल को किसी भी कारण से हटाया जा सकता है। इसका प्रशासनिक स्तर से हल निकाला जाता है। चीफ जस्टिस ने कहा कि संविधान ने बहुमत या सर्वसम्मत तरीके से कोई विधेयक पारित किया और राज्यपाल उस विधेयक पर कोई फैसला नहीं कर रहे हैं, तब को विधायिका मृतप्रायः हो जाएगी। आखिर जो लोग चुनकर आए हैं उनकी सुरक्षा कौन करेगा।
उल्लेखनीय है कि, 20 अगस्त को सुनवाई के दौरान उच्चतम न्यायालय ने पूछा था कि क्या देश संविधान निर्माताओं की इस अपेक्षा पर खरा उतरा है कि मुख्यमंत्री और राज्यपाल के बीच आपसी समन्वय रहेगा। क्या राज्यपाल और मुख्यमंत्री विभिन्न मसलों को आपसी सामंजस्य के जरिये सुलझाते रहे हैं। उच्चतम न्यायालय ने ये सवाल तब किया जब सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अपनी दलीलों के समर्थन में राज्यपाल की भूमिका को लेकर संविधान सभा की बैठक में हुई चर्चा का हवाला दिया। मेहता ने कहा था कि राज्यपाल का पद कोई राजनीति से रिटायर्ड हो चुके लोगों को शरण देने के लिए बना कोई पद नहीं है बल्कि इसकी एक अपनी अहमियत है।संविधान ने राज्यपाल को कुछ विशेष शक्तियां और जिम्मेदारी दी है।
उच्चतम न्यायालयने 19 सितंबर को अटार्नी जनरल से पूछा था कि अगर राज्यपाल लंबे समय तक विधेयक को लंबित रखते हैं तो उस पर क्या होना चाहिए। राष्ट्रपति द्वारा मांगे गए रेफरेंस पर संविधान बेंच ने 22 जुलाई को केंद्र सरकार और सभी राज्य सरकारों को नोटिस जारी किया था। संविधान बेंच में चीफ जस्टिस के अलावा जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस एएस चंदुरकर और जस्टिस पीएस नरसिम्हा शामिल हैं। बता दें कि, राष्ट्रपति ने संविधान के अनुच्छेद 143 (1) के तहत उच्चतम न्यायालयसे इस मसले पर 14 संवैधानिक प्रश्नों पर राय मांगी है। राष्ट्रपति को किसी भी कानूनी या संवैधानिक मसले पर उच्चतम न्यायालय की सलाह लेने का अधिकार है।
की पांच सदस्यीय संविधान बेंच ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की ओर से राष्ट्रपति और राज्यपालों के समक्ष विधेयकों को प्रस्तुत करने पर संविधान के अनुच्छेद 200 के तहत संवैधानिक विकल्पों पर भेजे गए रेफरेंस पर तीसरे दिन की सुनवाई पूरी कर ली। गुरुवार काे सुनवाई के दौरान न्यायालय
ने कहा कि अगर राज्यपाल अनिश्चित काल तक विधेयक को लंबित रखते हैं तो विधायिका मृतप्रायः हो जाएगी। संविधान बेंच इस मामले पर अगली सुनवाई अब 26 अगस्त (मंगलवार) को करेगा।
कोर्ट ने सुनवाई के दौरान पूछा कि राज्यपालों द्वारा विधेयक लंबित रखने की स्थिति में भी क्या न्यायालय शक्तिहीन है। इस पर केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि न्यायपालिका किसी विकट स्थिति को देखते हुए राष्ट्रपति और राज्यपाल को ऐसा दिशा-निर्देश जारी नहीं कर सकता जिसका नजीर के रुप में इस्तेमाल हो। मेहता ने कहा कि इसका राजनीतिक समाधान है। ऐसी परिस्थितियों में लोकतांत्रिक राजनीतिक प्रक्रिया ही समाधान है। मेहता ने कहा कि ऐसा समझना गलत है कि सभी संवैधानिक संस्थाएं असफल हो जाएं और केवल न्यायालय ही बचा हो। मेहता ने कहा कि न्यायालय संविधान का अभिरक्षक है लेकिन कई ऐसी समस्याएं हैं जिनका समाधान न्यायालय नहीं कर सकती है।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि राज्यपाल जनता के प्रति जवाबदेह नहीं होते हैं। राज्यपाल का पद काफी संवेदनशील होता है। राज्यपाल को किसी भी कारण से हटाया जा सकता है। इसका प्रशासनिक स्तर से हल निकाला जाता है। चीफ जस्टिस ने कहा कि संविधान ने बहुमत या सर्वसम्मत तरीके से कोई विधेयक पारित किया और राज्यपाल उस विधेयक पर कोई फैसला नहीं कर रहे हैं, तब को विधायिका मृतप्रायः हो जाएगी। आखिर जो लोग चुनकर आए हैं उनकी सुरक्षा कौन करेगा।
उल्लेखनीय है कि, 20 अगस्त को सुनवाई के दौरान उच्चतम न्यायालय ने पूछा था कि क्या देश संविधान निर्माताओं की इस अपेक्षा पर खरा उतरा है कि मुख्यमंत्री और राज्यपाल के बीच आपसी समन्वय रहेगा। क्या राज्यपाल और मुख्यमंत्री विभिन्न मसलों को आपसी सामंजस्य के जरिये सुलझाते रहे हैं। उच्चतम न्यायालय ने ये सवाल तब किया जब सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अपनी दलीलों के समर्थन में राज्यपाल की भूमिका को लेकर संविधान सभा की बैठक में हुई चर्चा का हवाला दिया। मेहता ने कहा था कि राज्यपाल का पद कोई राजनीति से रिटायर्ड हो चुके लोगों को शरण देने के लिए बना कोई पद नहीं है बल्कि इसकी एक अपनी अहमियत है।संविधान ने राज्यपाल को कुछ विशेष शक्तियां और जिम्मेदारी दी है।
उच्चतम न्यायालयने 19 सितंबर को अटार्नी जनरल से पूछा था कि अगर राज्यपाल लंबे समय तक विधेयक को लंबित रखते हैं तो उस पर क्या होना चाहिए। राष्ट्रपति द्वारा मांगे गए रेफरेंस पर संविधान बेंच ने 22 जुलाई को केंद्र सरकार और सभी राज्य सरकारों को नोटिस जारी किया था। संविधान बेंच में चीफ जस्टिस के अलावा जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस एएस चंदुरकर और जस्टिस पीएस नरसिम्हा शामिल हैं। बता दें कि, राष्ट्रपति ने संविधान के अनुच्छेद 143 (1) के तहत उच्चतम न्यायालयसे इस मसले पर 14 संवैधानिक प्रश्नों पर राय मांगी है। राष्ट्रपति को किसी भी कानूनी या संवैधानिक मसले पर उच्चतम न्यायालय की सलाह लेने का अधिकार है।

