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मजबूत नेता बन सकती हैं कुमारी सैलजा, चौधरी बीरेंद्र सिंह की मांग ने छेड़ी नई बहस

 राजनीतिक अनुभव, बेदाग छवि और 36 बिरादरी में स्वीकार्यता सैलजा की सबसे बड़ी ताकत
 
 मजबूत नेता बन सकती हैं कुमारी सैलजा, चौधरी बीरेंद्र सिंह की मांग ने छेड़ी नई बहस

 हरियाणा कांग्रेस की राजनीति में नेतृत्व को लेकर एक बार फिर नई बहस शुरू हो गई है। पूर्व केंद्रीय मंत्री चौधरी बीरेंद्र सिंह ने कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी संजय दत्त, प्रदेशाध्यक्ष राव नरेंद्र सिंह, अमेठी के सांसद किशोरी लाल शर्मा और अन्य वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी में सिरसा की सांसद कुमारी सैलजा को प्रदेश कांग्रेस की कमान सौंपने की मांग उठाई है। बीरेंद्र सिंह का यह बयान केवल किसी एक नेता के समर्थन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे हरियाणा में कांग्रेस के भविष्य, उसके सामाजिक समीकरण और संगठन की मौजूदा स्थिति से जुड़े कई महत्वपूर्ण संकेत छिपे हुए हैं।
सिरसा की सांसद, पूर्व केंद्रीय मंत्री, कांग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव एवं सीडब्ल्यूसी सदस्य कुमारी सैलजा आज हरियाणा कांग्रेस के सबसे अनुभवी और वरिष्ठ नेताओं में शामिल हैं। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के बाद प्रदेश कांग्रेस में शायद ही कोई दूसरा ऐसा नेता हो, जिसके पास सैलजा जैसा लंबा संसदीय, प्रशासनिक और संगठनात्मक अनुभव हो। वे दो अलग-अलग संसदीय क्षेत्रों सिरसा और अंबाला से पांच बार लोकसभा सदस्य चुनी जा चुकी हैं। इसके अतिरिक्त वे एक बार राज्यसभा की सदस्य भी रही हैं। यह उपलब्धि बताती है कि उनका राजनीतिक प्रभाव किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहा।
कुमारी सैलजा करीब साढ़े तीन दशक से कांग्रेस की राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय हैं। नब्बे के दशक में कांग्रेस की राष्ट्रीय सचिव बनने के बाद उन्होंने पार्टी संगठन में अनेक महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालीं। वे कई राज्यों की प्रभारी रही हैं और लंबे समय से कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के साथ काम करती आई हैं। केंद्र सरकार में लगभग 14 वर्षों तक अलग-अलग मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभालने का अनुभव भी उन्हें हरियाणा के दूसरे नेताओं से अलग पहचान देता है।
कुमारी सैलजा की  राजनीति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे विवादों और व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप से काफी हद तक दूर रही हैं। सार्वजनिक जीवन में उनकी ईमानदार, गंभीर और शालीन नेता की छवि बनी हुई है। पार्टी के प्रति उनकी निष्ठा पर भी कभी गंभीर सवाल नहीं उठे। कांग्रेस के अच्छे और बुरे—दोनों दौर में वे पार्टी के साथ खड़ी रहीं। अनेक राजनीतिक उतार-चढ़ाव और संगठनात्मक मतभेदों के बावजूद उन्होंने कभी अपनी भाषा और राजनीतिक मर्यादा को नहीं छोड़ा।
हरियाणा की राजनीति लंबे समय से जातीय और क्षेत्रीय समीकरणों के प्रभाव में रही है। भारतीय जनता पार्टी ने पहले मनोहर लाल फिर नायब सिंह सैनी को मुख्यमंत्री बनाकर गैर-जाट नेतृत्व पर अपना भरोसा जताया। इसके माध्यम से भाजपा ने प्रदेश में एक अलग सामाजिक गठजोड़ तैयार करने का प्रयास किया। ऐसे में कांग्रेस के भीतर भी यह चर्चा स्वाभाविक है कि क्या पार्टी को भविष्य में ऐसा चेहरा आगे करना चाहिए, जो किसी एक जाति या क्षेत्र तक सीमित न होकर व्यापक सामाजिक स्वीकार्यता रखता हो।
इस कसौटी पर कुमारी सैलजा कांग्रेस के लिए एक मजबूत विकल्प दिखाई देती हैं। वे अनुसूचित जाति समाज से आती हैं, जिसकी हरियाणा की आबादी और चुनावी राजनीति में महत्वपूर्ण हिस्सेदारी है। प्रदेश की अनेक विधानसभा सीटों पर यह वर्ग निर्णायक भूमिका निभाता है। लेकिन सैलजा की राजनीतिक ताकत केवल उनके सामाजिक आधार तक सीमित नहीं है। दलित समाज के साथ-साथ पिछड़ा वर्ग, पंजाबी समुदाय, शहरी मतदाता, महिलाएं, कर्मचारी और कांग्रेस के परंपरागत समर्थक वर्गों में भी उनकी स्वीकार्यता देखी जाती है। यही व्यापक छवि उन्हें दूसरे नेताओं से अलग बनाती है।
सैलजा का शांत स्वभाव, साफ-सुथरी छवि और टकराव के बजाय संवाद की राजनीति उन्हें 36 बिरादरी को साथ लेकर चलने वाला चेहरा बना सकती है। हरियाणा कांग्रेस को इस समय ऐसे नेतृत्व की जरूरत है, जो पार्टी के विभिन्न गुटों के बीच संतुलन स्थापित कर सके, कार्यकर्ताओं में भरोसा पैदा करे और सडक़ों पर उतरकर जनता के मुद्दों को मजबूती से उठा सके। चौधरी बीरेंद्र सिंह ने भी इसी बात पर जोर दिया है कि सैलजा को उत्तराखंड की जिम्मेदारी पूरी करने के बाद हरियाणा की सडक़ों पर उतरकर कांग्रेस को मजबूत करना चाहिए। पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा हरियाणा कांग्रेस के सबसे प्रभावशाली नेताओं में हैं और प्रदेश की राजनीति में उनके योगदान तथा जनाधार को नकारा नहीं जा सकता। उनके पास लंबा प्रशासनिक अनुभव और मजबूत राजनीतिक नेटवर्क है। लेकिन बढ़ती आयु के साथ कांग्रेस को भविष्य के नेतृत्व और नई राजनीतिक संरचना पर भी विचार करना होगा। यह प्रक्रिया किसी वरिष्ठ नेता को कमजोर करने के बजाय अनुभव और नई ऊर्जा के संतुलन के रूप में आगे बढ़ाई जानी चाहिए।

कुमारी सैलजा के सामने चुनौतियां भी कम नहीं हैं। उनके पास राष्ट्रीय स्तर का लंबा अनुभव है, लेकिन हरियाणा में संगठन को बूथ स्तर तक सक्रिय करने, लगातार जनसंपर्क बढ़ाने और अलग-अलग गुटों को साथ लाने के लिए उन्हें अधिक समय प्रदेश की राजनीति को देना होगा। नेतृत्व केवल वरिष्ठता के आधार पर नहीं मिलता; उसके लिए संगठनात्मक क्षमता, कार्यकर्ताओं से निरंतर संवाद और चुनावी रणनीति को धरातल पर लागू करना भी जरूरी होता है।
फिर भी, मौजूदा  परिस्थितियों में कुमारी सैलजा कांग्रेस के उन चुनिंदा चेहरों में हैं जो अनुभव, सामाजिक संतुलन, राष्ट्रीय पहचान और बेदाग छवि इन चारों कसौटियों पर खरी उतरती हैं। चौधरी बीरेंद्र सिंह जैसे वरिष्ठ नेता की ओर से सार्वजनिक मंच पर उनके नेतृत्व की मांग उठाया जाना इस बात का संकेत है कि कांग्रेस के भीतर उनकी भूमिका को लेकर गंभीर विमर्श शुरू हो चुका है।

हरियाणा में कांग्रेस को यदि भाजपा के मजबूत संगठन और उसके सामाजिक समीकरणों का मुकाबला करना है तो उसे गुटबाजी से ऊपर उठकर सर्वमान्य नेतृत्व विकसित करना होगा। पार्टी को ऐसा चेहरा चाहिए जो पुराने नेताओं का सम्मान बनाए रखे, नई पीढ़ी को अवसर दे और सभी वर्गों में विश्वास पैदा करे। कुमारी सैलजा में ये संभावनाएं स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं। अंतत: नेतृत्व का निर्णय कांग्रेस हाईकमान और पार्टी के निर्वाचित प्रतिनिधियों को करना है, लेकिन राजनीतिक अनुभव, वरिष्ठता, सामाजिक स्वीकार्यता और विश्वसनीयता को आधार बनाया जाए तो कुमारी सैलजा हरियाणा कांग्रेस के भविष्य की स्वाभाविक और मजबूत दावेदार बनकर सामने आती हैं। आने वाला समय बताएगा कि कांग्रेस उनके अनुभव का उपयोग केवल राष्ट्रीय संगठन में करती है या उन्हें हरियाणा में पार्टी का नेतृत्व सौंपकर एक नए राजनीतिक अध्याय की शुरुआत करती है।

जातीय समीकरण भी लग रहे है सैलजा के पक्ष में
अगर हम हरियाणा के जातीय समीकरण पर नजर डाले तो दलित वोट कही न कही सरकार के गठन में अहम भूमिका निभाता आया है जिस  ओर दलित वोट गया सरकार भी उसकी ही बनी है। पिछले विधानसभा चुनाव में हर किसी की जुबान पर एक ही बात थी कि कांगे्रस की सरकार बनेगी। पर चुनाव नतीजे ने चौका दिया क्योंकि कुमारी सैलजा के साथ जो खेला हुआ था उससे दलित वोटर नाराज होकर भाजपा के पास चला गया और भाजपा की तीसरी बार सरकार बन गई। कांगे्रस का हर छोटा-बड़ा नेता हार का कारण जानता था पर बोला कोई नहीं।  हरयिाणा में 08 प्रतिशत पंजाबी, 7.5 प्रतिशत ब्राहमण, 5.14 प्रतिशत अहीर, 5.00 प्रतिशत वैश्य, 3.35 प्रतिशत गुर्जर, 4.00 जट सिख, 3.4 प्रतिशत राजपूत, 3.5 प्रतिशत, 3.8 प्रतिशत मेव/मुस्लिम,0.7 प्रतिशत बिश्रोई, 21 प्रतिशत एससी, 22 प्रतिशत जाट और 15.9 प्रतिशत अन्य वर्ग के लोग है। अगर इन आंकडों पर नजर डाले तो सैलजा का पलडा भारी दिखाई देता है, सैलजा के प्रधान बनने से दलित वोटरर्स की वापसी तो ही ही सकती है बल्कि अन्य जातियों का उन्हें पूरा समर्थन मिल सकता है क्योंकि क्षेत्रीय दलों की स्थिति पहले ही पतली है।  सैलजा की हर जाति वर्ग में अच्छी छवि है और वे कांगे्रस को मजबूती प्रधान कर सकती है।

सैलजा के प्रधान बनने पर  कांग्रेस से गए अनेक नेताओं की हो सकती है वापसी 
हरियाणा मेंं कांगे्रस आपस में उलझकर कमजोर होती  रही है, हाईकमान भी गुटबाजी को खत्म नहीं कर पाया और एक ही व्यक्ति को फ्री हैंड दे दिया, जिसकी मनमानी के चलते कांगे्रस हाशिये पर चली गई।  कांग्रेस से गए अनेक नेताओं की वापसी हो सकती है अगर  शैलजा को नेता बनाया जाता है।  वरिष्ठ नेत्री और पूर्व मंत्री किरण चौधरी ने अपनी पुत्री श्रुति चौधरी के साथ जून 2024 में कांग्रेस छोडक़र भाजपा की सदस्यता ग्रहण की।  आदमपुर के पूर्व विधायक और भजन लाल के पुत्र कुलदीप बिश्नोई ने अगस्त 2022 में कांग्रेस से इस्तीफा देकर भाजपा में चले गए। हिसार से पूर्व सांसद और पूर्व प्रशासनिक अधिकारी बृजेंद्र सिंह ने मार्च 2024 में भाजपा छोडक़र कांग्रेस का हाथ थामा था, हालांकि उनके पिता चौधरी बीरेंद्र सिंह भी पहले कांग्रेस छोडक़र भाजपा में गए थे और बाद में वापस कांग्रेस में लौट आए। ऐसे अनेक बड़े नाम है जो कांगे्रस को छोडक़र दूसरे दलों में चले गए अगर कुमारी सैलजा को प्रदेश कांगे्रस की कमान सौंपी जाती है तो इसमें कोई दो राय नही कि सैलजा अनेक नेताआओं की घर वापसी करा सकती है क्योंकि दूसरे दलों में गए नेता पिता-पुत्र के प्रभावशाली रहते कांगे्रस में वापस नहीं आ सकते जबकि अनेक नेता कांगे्रस में वापसी के लिए तैयार बैठे है। सैलजा ही मौजूदा समय में कांगे्रस को मजबूती प्रदान कर  सकती है।