सरकार ही कर रही है शोषण? — सुरेंद्र भाटिया, संपादक, पल-पल
Jun 14, 2026, 14:18 IST

देश में जब भी श्रमिकों के शोषण की बात होती है तो उंगली प्रायः निजी क्षेत्र की ओर उठाई जाती है। न्यूनतम वेतन, सम्मानजनक पारिश्रमिक और श्रम के उचित मूल्य की बातें सरकारें स्वयं करती हैं। लेकिन प्रश्न तब खड़ा होता है जब सरकारी संस्थान या विश्वविद्यालय ऐसे मानदेय निर्धारित करें जो वर्तमान समय की महंगाई और जिम्मेदारियों के मुकाबले बेहद कम प्रतीत हों।
हाल ही में परीक्षा कार्यों से संबंधित कुछ मानदेय दरों पर नजर डालें तो पर्यवेक्षक (Invigilator) को ₹400 प्रति सत्र, सहायक (Assistant) को ₹350 प्रति सत्र तथा चौकीदार, सफाई कर्मचारी (House Keeping Staff) और पानी उपलब्ध कराने वाले कर्मचारी (Water Attendant) को ₹200 प्रति सत्र का मानदेय निर्धारित किया गया है। पहली नजर में यह राशि पहले की तुलना में अधिक दिखाई देती है, लेकिन जब वर्तमान आर्थिक परिस्थितियों और कार्य की जिम्मेदारी को ध्यान में रखा जाए तो यह प्रश्न फिर भी बना रहता है कि क्या यह वास्तव में पर्याप्त है?
विशेष रूप से इग्नू (IGNOU) जैसी संस्थाओं की स्थिति अलग है। इग्नू के अधिकांश अध्ययन केंद्रों और परीक्षा केंद्रों पर अपना स्थायी स्टाफ नहीं होता। परीक्षा संचालन के लिए स्थानीय विद्यालयों, महाविद्यालयों तथा निजी शिक्षण संस्थानों के कर्मचारियों और शिक्षकों की सेवाएं ली जाती हैं। ऐसे में परीक्षा की गुणवत्ता काफी हद तक इन बाहरी कर्मियों की उपलब्धता और सहयोग पर निर्भर करती है।
समस्या यह है कि अत्यंत सीमित मानदेय के कारण सरकारी स्कूलों के शिक्षक, व्याख्याता और अनुभवी प्राध्यापक परीक्षा ड्यूटी करने में रुचि नहीं लेते। कई बार उन्हें केंद्र तक आने-जाने, समय देने और जिम्मेदारी निभाने की तुलना में मिलने वाला पारिश्रमिक बहुत कम लगता है। परिणामस्वरूप परीक्षा केंद्रों को योग्य एवं अनुभवी मानव संसाधन जुटाने में कठिनाई आती है और अंततः गुणवत्ता के साथ समझौता करने की स्थिति पैदा हो जाती है।
परीक्षा केवल कक्ष में बैठकर निगरानी करने का कार्य नहीं है। इसमें गोपनीयता, अनुशासन, निष्पक्षता, समयपालन तथा उत्तरदायित्व जैसी अनेक महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां शामिल होती हैं। यदि जिम्मेदारी बड़ी है तो उसके अनुरूप सम्मान और पारिश्रमिक भी होना चाहिए। अन्यथा यह संदेश जाता है कि व्यवस्था स्वयं श्रम और विशेषज्ञता का उचित मूल्यांकन नहीं कर रही।
वास्तविकता यह है कि देश में न्यूनतम मजदूरी, श्रमिक अधिकार और सम्मानजनक रोजगार की बातें करने वाली व्यवस्थाओं को पहले अपने घर में झांकना होगा। यदि परीक्षा जैसे महत्वपूर्ण कार्यों के लिए निर्धारित मानदेय समय-समय पर वास्तविक परिस्थितियों के अनुसार संशोधित नहीं किए जाएंगे, तो योग्य और अनुभवी लोगों को इस कार्य से जोड़कर रखना कठिन होता जाएगा।
सरकारों, विश्वविद्यालयों और विशेष रूप से दूरस्थ शिक्षा संस्थानों को चाहिए कि परीक्षा कार्य से जुड़े सभी कर्मचारियों और शिक्षकों के मानदेय की व्यापक समीक्षा करें। महंगाई सूचकांक, वर्तमान मजदूरी दरों, यात्रा व्यय तथा कार्य की जिम्मेदारी को ध्यान में रखते हुए नई और व्यावहारिक दरें निर्धारित की जाएं।
श्रम का सम्मान केवल भाषणों से नहीं, बल्कि उसके उचित मूल्य से होता है। यदि शिक्षा व्यवस्था में गुणवत्ता बनाए रखनी है तो परीक्षा कार्य से जुड़े प्रत्येक कर्मचारी और शिक्षक को ऐसा पारिश्रमिक मिलना चाहिए जो उसके श्रम, समय और जिम्मेदारी के अनुरूप हो। तभी परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता और गुणवत्ता दोनों को मजबूत किया जा सकेगा।
— सुरेंद्र भाटिया
संपादक, पल-पल
हाल ही में परीक्षा कार्यों से संबंधित कुछ मानदेय दरों पर नजर डालें तो पर्यवेक्षक (Invigilator) को ₹400 प्रति सत्र, सहायक (Assistant) को ₹350 प्रति सत्र तथा चौकीदार, सफाई कर्मचारी (House Keeping Staff) और पानी उपलब्ध कराने वाले कर्मचारी (Water Attendant) को ₹200 प्रति सत्र का मानदेय निर्धारित किया गया है। पहली नजर में यह राशि पहले की तुलना में अधिक दिखाई देती है, लेकिन जब वर्तमान आर्थिक परिस्थितियों और कार्य की जिम्मेदारी को ध्यान में रखा जाए तो यह प्रश्न फिर भी बना रहता है कि क्या यह वास्तव में पर्याप्त है?
विशेष रूप से इग्नू (IGNOU) जैसी संस्थाओं की स्थिति अलग है। इग्नू के अधिकांश अध्ययन केंद्रों और परीक्षा केंद्रों पर अपना स्थायी स्टाफ नहीं होता। परीक्षा संचालन के लिए स्थानीय विद्यालयों, महाविद्यालयों तथा निजी शिक्षण संस्थानों के कर्मचारियों और शिक्षकों की सेवाएं ली जाती हैं। ऐसे में परीक्षा की गुणवत्ता काफी हद तक इन बाहरी कर्मियों की उपलब्धता और सहयोग पर निर्भर करती है।
समस्या यह है कि अत्यंत सीमित मानदेय के कारण सरकारी स्कूलों के शिक्षक, व्याख्याता और अनुभवी प्राध्यापक परीक्षा ड्यूटी करने में रुचि नहीं लेते। कई बार उन्हें केंद्र तक आने-जाने, समय देने और जिम्मेदारी निभाने की तुलना में मिलने वाला पारिश्रमिक बहुत कम लगता है। परिणामस्वरूप परीक्षा केंद्रों को योग्य एवं अनुभवी मानव संसाधन जुटाने में कठिनाई आती है और अंततः गुणवत्ता के साथ समझौता करने की स्थिति पैदा हो जाती है।
परीक्षा केवल कक्ष में बैठकर निगरानी करने का कार्य नहीं है। इसमें गोपनीयता, अनुशासन, निष्पक्षता, समयपालन तथा उत्तरदायित्व जैसी अनेक महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां शामिल होती हैं। यदि जिम्मेदारी बड़ी है तो उसके अनुरूप सम्मान और पारिश्रमिक भी होना चाहिए। अन्यथा यह संदेश जाता है कि व्यवस्था स्वयं श्रम और विशेषज्ञता का उचित मूल्यांकन नहीं कर रही।
वास्तविकता यह है कि देश में न्यूनतम मजदूरी, श्रमिक अधिकार और सम्मानजनक रोजगार की बातें करने वाली व्यवस्थाओं को पहले अपने घर में झांकना होगा। यदि परीक्षा जैसे महत्वपूर्ण कार्यों के लिए निर्धारित मानदेय समय-समय पर वास्तविक परिस्थितियों के अनुसार संशोधित नहीं किए जाएंगे, तो योग्य और अनुभवी लोगों को इस कार्य से जोड़कर रखना कठिन होता जाएगा।
सरकारों, विश्वविद्यालयों और विशेष रूप से दूरस्थ शिक्षा संस्थानों को चाहिए कि परीक्षा कार्य से जुड़े सभी कर्मचारियों और शिक्षकों के मानदेय की व्यापक समीक्षा करें। महंगाई सूचकांक, वर्तमान मजदूरी दरों, यात्रा व्यय तथा कार्य की जिम्मेदारी को ध्यान में रखते हुए नई और व्यावहारिक दरें निर्धारित की जाएं।
श्रम का सम्मान केवल भाषणों से नहीं, बल्कि उसके उचित मूल्य से होता है। यदि शिक्षा व्यवस्था में गुणवत्ता बनाए रखनी है तो परीक्षा कार्य से जुड़े प्रत्येक कर्मचारी और शिक्षक को ऐसा पारिश्रमिक मिलना चाहिए जो उसके श्रम, समय और जिम्मेदारी के अनुरूप हो। तभी परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता और गुणवत्ता दोनों को मजबूत किया जा सकेगा।
— सुरेंद्र भाटिया
संपादक, पल-पल

