वृक्षों की विविधता, संरक्षण और जनभागीदारी पर प्रेरणादायक अनुभव

विशेष लेख | भाग-1
ब्यूटीफुल इंडिया-कलरफुल इंडिया : सिरसा से पूरे भारत को हरा-भरा बनाने का सपना
विभिन्न संस्थाओं, सरकार और नागरिकों के सहयोग से देश को सुंदर बनाने की दिशा में जरूरी है व्यापक जनआंदोलन
लेखक : गुरविंदर सिंह घुम्मन
चिंतक, लेखक एवं समाजसेवी, सिरसा
भारत को हरा-भरा, सुंदर और स्वच्छ बनाने के लिए सहयोगी संस्थाएं, सामाजिक संस्थाएं, सहकारी संस्थाएं, वन विभाग, पर्यावरण प्रेमी, विशेषज्ञ, कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) पहल, जागरूक नागरिक और केंद्र व राज्य सरकारें लगातार प्रयास कर रही हैं। हालांकि सभी नागरिक इस अभियान में शामिल नहीं हैं, लेकिन समाज का एक बड़ा वर्ग वृक्षारोपण और पर्यावरण संरक्षण में सक्रिय सहयोग दे रहा है।
कितने वृक्ष थे, कितने बचे हैं?
हमारी पुस्तकों में सृष्टि के असंख्य प्रकार के वृक्षों का उल्लेख है। लेकिन आज हमारे पास वास्तव में कितनी प्रजातियां मौजूद हैं? हम और विभिन्न संस्थाएं आज कितने प्रकार के वृक्ष लगा रहे हैं? पुराने समय में हमारे पास कितनी विविधता थी और पिछले 50 वर्षों में हम कितनी प्रजातियां गंवा चुके हैं? इस विषय पर वैज्ञानिक अध्ययन और लोगों के बीच व्यापक जागरूकता की आवश्यकता है।
कहां लगें कौन-से वृक्ष?
आज जो प्रजातियां हमारे पास हैं, उनमें से कितने जंगलों में लगाने के लिए उपयुक्त हैं, कितने शहरों और गांवों की सड़कों पर लगाए जा सकते हैं और विशेषकर देश के हर घर में 100 प्रतिशत कौन-कौन से वृक्ष लगाए जा सकते हैं। इसके लिए क्षेत्रवार सूची और मार्गदर्शन तैयार करके जनता को जागरूक करना अत्यंत आवश्यक है।
सरकारी जगह पर पौधे लग गए, अब जनता की भागीदारी जरूरी
एक वन विभाग के अधिकारी ने बताया कि शहरों और गांवों में जहां भी सरकारी जगह थी, वहां बड़ी संख्या में पौधे लगाए जा चुके हैं। लेकिन गांवों, शहरों, घरों और निजी परिसरों में वृक्षारोपण को बढ़ाने के लिए जनता का सहयोग सबसे बड़ा प्रश्नचिह्न है।
एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी के विशेषज्ञ भी हैरान
एक कृषि विश्वविद्यालय के विशेषज्ञ को जब मैंने अलग-अलग प्रकार के वृक्षों की तस्वीरें दिखाई तो उन्होंने कहा—“आप तो हिंदुस्तान के टॉप वृक्षों की सूची लेकर घूम रहे हैं।”
मेरा प्रश्न था—“अगर इतने महत्वपूर्ण वृक्ष हैं तो ये सार्वजनिक रूप से दिखते क्यों नहीं और कहां उपलब्ध हैं?”
लुधियाना में अशोक का पौधा न मिलना
लुधियाना कृषि विश्वविद्यालय के किसान विंग से जुड़ी एक महिला ने बताया कि वह अशोक का वृक्ष लगाना चाहती हैं, पर पूरे लुधियाना की नर्सरियों में इसे कहीं नहीं मिला। यह स्थिति चिंताजनक है। यदि अशोक जैसा परिचित वृक्ष नहीं मिल रहा तो अन्य दुर्लभ प्रजातियों की हालत क्या होगी? नर्सरी और वितरण व्यवस्था को मजबूत करने की जरूरत है।
कीकर की प्रजातियां और शहद की गुणवत्ता
एक विशेषज्ञ ने बताया कि कीकर के कई प्रकार होते हैं। इनमें से एक प्रजाति के फूलों से दुनिया में उच्च गुणवत्ता का मधुमक्खी का शहद प्राप्त होता है। इसी तरह प्रत्येक वृक्ष की औषधीय, पर्यावरणीय, आर्थिक और सामाजिक उपयोगिता की जानकारी आम जनता तक पहुंचनी चाहिए।
पुराने समय में हमारे बुजुर्ग आपस में यह ज्ञान साझा करते थे, जो आज किताबों तक सीमित होकर रह गया है।
शेष भाग-2 में...

