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एटीएम में कैश जमा कर रहे हैं तो सावधान! मशीन ने पैसे रख लिए, खाते में न आए तो क्या करें?

 
एटीएम में कैश जमा कर रहे हैं तो सावधान! मशीन ने पैसे रख लिए, खाते में न आए तो क्या करें?

 छुट्टी के दिन 50 हजार रुपए जमा करने पहुंचे खाताधारक के पैसे मशीन में फंसे, करीब 24 घंटे बाद खाते में आए
डिजिटल बैंकिंग के इस दौर में बैंक ग्राहकों को चौबीसों घंटे सुविधाएं उपलब्ध कराने का दावा करते हैं। कैश डिपॉजिट मशीन (सीडीएम) अथवा कैश जमा करने की सुविधा वाले एटीएम भी इसी व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। ग्राहक को उम्मीद रहती है कि मशीन में नकदी डालते ही राशि उसके खाते में जमा हो जाएगी। लेकिन यदि मशीन नकदी स्वीकार कर ले और राशि खाते में न पहुंचे, तो ग्राहक के सामने परेशानी खड़ी हो सकती है। ऐसा ही एक मामला 2 अक्टूबर को सामने आया। एक खाताधारक ने अपने सहयोगी को लगभग दोपहर 1:30 बजे हिसार रोड स्थित एसबीआई शाखा के एटीएम में 50,000 रुपए जमा करवाने के लिए भेजा। मशीन ने 50,000 रुपए की नकदी तो स्वीकार कर ली, लेकिन राशि संबंधित खाते में जमा नहीं हुई। परेशानी तब और बढ़ गई जब लेन-देन पूरा होने की कोई रसीद भी हाथ में नहीं थी। खाते में राशि न पहुंचने पर बैंक कर्मचारियों से संपर्क किया गया। बताया गया कि 2 अक्टूबर को अवकाश होने के कारण अगले दिन सुबह 10 बजे के बाद बैंक में प्रार्थना पत्र लेकर संपर्क किया जाए। यहां एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा होता है। ग्राहक कैश डिपॉजिट मशीन का इस्तेमाल इसलिए करता है कि बैंक बंद होने अथवा अवकाश के दिन भी आवश्यक बैंकिंग कार्य किया जा सके। यदि मशीन नकदी स्वीकार करने के बाद खाते में राशि जमा न करे और ग्राहक को अगले कार्य दिवस बैंक जाकर लिखित शिकायत देनी पड़े, तो 24 घंटे उपलब्ध बैंकिंग सुविधा का उद्देश्य कहीं न कहीं प्रभावित होता है। इस मामले में संबंधित व्यक्ति को आखिरकार बैंक जाना पड़ा और शिकायत की प्रक्रिया पूरी करनी पड़ी। करीब 24 घंटे बाद 50,000 रुपए की राशि खाते में जमा हो गई। पैसे मिल गए, इसलिए आर्थिक नुकसान तो टल गया, लेकिन इस दौरान ग्राहक को जिस चिंता और असुविधा से गुजरना पड़ा, वह कई सवाल छोड़ गई। सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है कि यदि कैश डिपॉजिट मशीन पैसे स्वीकार कर ले, लेकिन लेन-देन सफल न हो और रसीद भी न निकले, तो ग्राहक तत्काल अपने पास क्या प्रमाण रखे? बैंक के पास मशीन के इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड, खाते से संबंधित लेन-देन का विवरण, मशीन में मौजूद नकदी के मिलान और अन्य तकनीकी रिकॉर्ड के माध्यम से जांच की व्यवस्था हो सकती है। लेकिन ग्राहक के दृष्टिकोण से ऐसी स्थिति बेहद तनावपूर्ण है। मशीन में हजारों रुपये डालने के बाद स्क्रीन पर असफल लेन-देन दिखाई दे और हाथ में कोई पुख्ता रसीद न हो, तो स्वाभाविक रूप से चिंता होगी। इसीलिए कैश डिपॉजिट मशीनों में ऐसी व्यवस्था और मजबूत होनी चाहिए कि असफल लेन-देन की स्थिति में भी ग्राहक को तुरंत एक फेल्ड ट्रांजैक्शन रसीद, संदर्भ संख्या अथवा मोबाइल पर डिजिटल प्रमाण अवश्य मिले। इससे शिकायत दर्ज करवाना और बाद में लेन-देन की पहचान करना आसान होगा। इस घटना का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू ग्राहक की आवश्यकता है। कोई व्यक्ति छुट्टी के दिन कैश डिपॉजिट मशीन में बड़ी राशि सामान्यत: तभी जमा करवाता है, जब उसे उस पैसे की तत्काल जरूरत हो। इस मामले में भी 50,000रुपए जमा करवाने का उद्देश्य दिल्ली में सामान की खरीद के लिए भुगतान करना था। राशि खाते में समय पर नहीं पहुंची तो उस दिन आवश्यक भुगतान नहीं हो सका। यानी पैसा सुरक्षित वापस खाते में आ जाने के बावजूद ग्राहक का जरूरी काम प्रभावित हुआ। ऐसे में प्रश्न केवल 50,000 रुपए के खाते में आने का नहीं है, बल्कि उस समय की कीमत का भी है जिसमें ग्राहक को धन की आवश्यकता थी। कैश डिपॉजिट मशीनें ग्राहकों की सुविधा के लिए लगाई गई हैं और अधिकांश लेन-देन सामान्य रूप से सफल भी होते हैं। तकनीकी खराबी किसी भी इलेक्ट्रॉनिक प्रणाली में संभव है। लेकिन ऐसी स्थिति आने पर ग्राहक को असमंजस में छोडऩे के बजाय शिकायत और समाधान की प्रक्रिया अधिक स्पष्ट, त्वरित और प्रमाण-आधारित होनी चाहिए। मशीन में नकदी फंसने पर ग्राहक को तत्काल शिकायत संख्या मिले, एसएमएस के माध्यम से लेन-देन का रिकॉर्ड प्राप्त हो और यह भी बताया जाए कि शिकायत का समाधान अधिकतम कितने समय में किया जाएगा। बैंक की मोबाइल या इंटरनेट बैंकिंग से ही ऐसी शिकायत दर्ज करने की आसान सुविधा भी ग्राहक की परेशानी काफी कम कर सकती है। डिजिटल बैंकिंग तभी सफल मानी जाएगी जब तकनीक सुविधा के साथ भरोसा भी दे। मशीन का कभी-कभार खराब होना तकनीकी समस्या हो सकती है, लेकिन मशीन द्वारा नकदी स्वीकार करने के बाद ग्राहक को यह चिंता होने लगे कि उसके पैसे कब और कैसे मिलेंगे, तो यह व्यवस्था में सुधार की जरूरत की ओर संकेत करता है। 2 अक्टूबर की इस घटना में करीब 24 घंटे बाद 50,000 रुपए खाते में आ गए, लेकिन सवाल कायम है अगर किसी जरूरतमंद व्यक्ति के पैसे कैश डिपॉजिट मशीन में फंस जाएं, तो उसे अपने ही पैसे के लिए बैंक के चक्कर और लिखित प्रार्थना पत्र की प्रक्रिया से क्यों गुजरना पड़े? बैंकों को ऐसी व्यवस्था विकसित करनी चाहिए जिसमें असफल कैश डिपॉजिट की पहचान स्वत: हो, ग्राहक को तत्काल प्रमाण मिले और सत्यापन के बाद राशि यथाशीघ्र खाते में स्वत: क्रेडिट हो। क्योंकि बैंकिंग में तकनीक का असली उद्देश्य केवल मशीनें लगाना नहीं, बल्कि ग्राहक का समय बचाना, उसके धन को सुरक्षित रखना और उसके भरोसे को मजबूत करना है।

-सुरेंद्र भाटिया