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दुर्लभ वृक्षों की पहचान और संरक्षण जरूरी, नर्सरियों में बढ़े प्रजातियों की विविधता

 
 दुर्लभ वृक्षों की पहचान और संरक्षण जरूरी, नर्सरियों में बढ़े प्रजातियों की विविधता

 विशेष लेख | भाग–2 | रविवार, 25 अक्टूबर 2026

विलुप्त होती प्रजातियों को बचाना, नर्सरियों की भूमिका और वैज्ञानिक जानकारी जरूरी

आम जनता तक पहुंचे हर प्रकार के वृक्षों की जानकारी, तभी साकार होगा ब्यूटीफुल इंडिया–कलरफुल इंडिया का सपना

लेखक : गुरविंदर सिंह घुम्मन चिंतक, लेखक एवं समाजसेवी, सिरसा

भारत में अनेक प्रकार के वृक्ष प्राकृतिक रूप से पाए जाते हैं। हमारी प्राचीन पुस्तकों, आयुर्वेदिक ग्रंथों और आधुनिक शोधों में हजारों वृक्ष प्रजातियों का उल्लेख है। परंतु वर्तमान में इन प्रजातियों में से बड़ी संख्या या तो विलुप्त होने के कगार पर है अथवा बहुत कम मात्रा में बची है। पिछले 50 वर्षों में तेज शहरीकरण, अंधाधुंध कटाई, बदलती जलवायु और बढ़ती आबादी ने अनेक स्थानीय प्रजातियों को संकट में डाल दिया है। इन प्रजातियों की पहचान, संरक्षण और पुनः रोपण आज समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

 पुराने समय में कितना था वृक्ष वैभव?

विशेषज्ञों के अनुसार भारत में पहले स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप बहुत अधिक वृक्ष प्रजातियां पाई जाती थीं। गांवों, खेतों, तालाबों, नदियों के किनारे और शहरों में भी विविध प्रकार के वृक्ष दिखाई देते थे। आज इनमें से अनेक प्रजातियां हमारे आसपास दिखाई नहीं देतीं। यह जानने और दर्ज करने की जरूरत है कि कौन-कौन सी प्रजातियां अब दुर्लभ हो गई हैं।

अशोक का पौधा नहीं मिला, चिंता का विषय

लुधियाना कृषि विश्वविद्यालय की विकास विंग की एक महिला ने बताया कि वह अशोक का वृक्ष लगाना चाहती थीं, लेकिन लुधियाना की कई नर्सरियों में उन्हें यह पौधा नहीं मिला। यह स्थिति दिखाती है कि मांग के बावजूद भी कई महत्वपूर्ण प्रजातियां नर्सरियों में उपलब्ध नहीं हैं। वास्तविक अशोक (Saraca asoca) जैसे वृक्षों की पहचान और उपलब्धता पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।

 कीकर की प्रजातियां और शहद की गुणवत्ता

कीकर के भी कई प्रकार होते हैं। इनमें से कुछ प्रजातियों के फूलों से मधुमक्खियों को उत्कृष्ट मकरंद मिलता है, जिससे उच्च गुणवत्ता का शहद प्राप्त होता है। प्रत्येक वृक्ष की औषधीय, पर्यावरणीय और आर्थिक उपयोगिता की जानकारी आम जनता तक पहुंचनी चाहिए। वृक्ष केवल छाया या लकड़ी देने का साधन नहीं, बल्कि जैव विविधता और आजीविका का भी महत्वपूर्ण आधार हैं।

 नर्सरियों में पौधे हैं, लेने कोई नहीं आता

अनेक नर्सरी संचालकों ने बताया कि वे समय-समय पर नई प्रजातियों के पौधे तैयार करते हैं, लेकिन उन्हें खरीदने के लिए दो-तीन साल तक कोई नहीं आता। पौधे नर्सरी में ही पड़े रहते हैं। समस्या केवल पौधों की उपलब्धता की नहीं, बल्कि जनता में जानकारी और रुचि की कमी की भी है। यदि लोगों को इन वृक्षों के महत्व के बारे में बताया जाए तो मांग अवश्य बढ़ेगी।

 कृषि विश्वविद्यालय के विशेषज्ञ भी हुए हैरान

एक कृषि विश्वविद्यालय के विशेषज्ञ की जब मैंने विभिन्न प्रकार के वृक्षों की तस्वीरें दिखाईं तो उन्होंने कहा, "आप तो हिंदुस्तान के टॉप वृक्षों की सूची लेकर घूम रहे हैं।" मेरा प्रश्न था—अगर ये वृक्ष इतने महत्वपूर्ण हैं तो आम जनता को दिखाई क्यों नहीं देते और ये कहां उपलब्ध हैं?

यह सवाल केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे समाज और पर्यावरण संरक्षण से जुड़ा हुआ है।

 कितनी प्रजातियां कहां लगाएं?

आज हमारे पास जो प्रजातियां उपलब्ध हैं, उनमें से कुछ जंगलों के लिए उपयुक्त हैं, कुछ शहरों और गांवों की सड़कों पर लगाने योग्य हैं और अनेक प्रजातियां घरों में 100 प्रतिशत लगाई जा सकती हैं। क्षेत्र, मिट्टी, जलवायु और उपलब्ध जगह के अनुसार सही प्रजाति चुनना आवश्यक है। इसके लिए वैज्ञानिक मार्गदर्शन, सूची और सांकेतिक जागरूकता अभियान चलाया जाए।

 बीजों से पौधे तैयार करना संभव

देशभर में अनेक प्रकार के वृक्षों के बीज उपलब्ध हैं। उचित विधि से अंकुरित कर कम लागत पर पौधे तैयार किए जा सकते हैं। नर्सरियां, वन विभाग और सामाजिक संस्थाएं मिलकर बीज संग्रह, अंकुरण और पौध तैयारी पर प्रशिक्षण केंद्र चलाएं। इससे लोग स्वयं भी वृक्षारोपण में सक्रिय भागीदारी कर सकते हैं।

### ब्यूटीफुल इंडिया–कलरफुल इंडिया

हम सबका संकल्प होना चाहिए—हर जगह वृक्ष, हर मौसम में हरियाली। केवल कुछ प्रचलित प्रजातियों तक सीमित रहने के बजाय विविध रंगों, फूलों, पत्तियों और पर्यावरणीय गुणों वाले वृक्षों को बढ़ावा देना होगा। दुर्लभ प्रजातियों की पहचान, उनका संरक्षण और नर्सरियों में उपलब्धता सुनिश्चित करके ही ब्यूटीफुल इंडिया–कलरफुल इंडिया का सपना साकार किया जा सकता है।

क्रमशः... भाग–3 में