विशेष बच्चों में आत्मविश्वास कैसे बढ़ाएं—परिवार और शिक्षक की भूमिका

काउंसलर कंचन मेहता
हर बच्चा अपने भीतर कुछ विशेष क्षमताएं और संभावनाएं लेकर जन्म लेता है। विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के मामले में इन क्षमताओं को पहचानना और उन्हें आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ने का अवसर देना और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। कई बार शारीरिक, बौद्धिक, सीखने या संवाद संबंधी कठिनाइयों के कारण विशेष बच्चे स्वयं को दूसरों से कम समझने लगते हैं। ऐसे में परिवार और शिक्षक की सकारात्मक भूमिका उनके व्यक्तित्व को नई दिशा दे सकती है।
आत्मविश्वास का अर्थ यह नहीं कि बच्चा हर कार्य में सफल हो, बल्कि यह विश्वास विकसित होना है कि वह प्रयास कर सकता है, सीख सकता है और अपनी क्षमताओं के अनुसार आगे बढ़ सकता है। विशेष बच्चों में यह भावना धीरे-धीरे विकसित होती है। इसके लिए सबसे पहला कदम उनकी छोटी-छोटी उपलब्धियों की सराहना करना है। यदि बच्चा स्वयं कपड़े पहनने, अपना सामान व्यवस्थित करने, कोई शब्द सही बोलने, चित्र बनाने या किसी गतिविधि को पूरा करने का प्रयास करता है तो उसकी प्रशंसा की जानी चाहिए। सराहना केवल बड़ी सफलता पर नहीं, उसके प्रयास पर भी होनी चाहिए। इससे बच्चे के मन में यह भावना पैदा होती है कि उसका प्रयास महत्वपूर्ण है।
विशेष बच्चों के आत्मविश्वास को कमजोर करने वाला एक बड़ा कारण दूसरे बच्चों से तुलना है। “देखो, वह तुमसे अच्छा करता है” या “तुम यह क्यों नहीं कर सकते” जैसे वाक्य बच्चे के मन में हीनभावना पैदा कर सकते हैं। प्रत्येक बच्चे के विकास की गति और क्षमता अलग होती है। इसलिए उसकी तुलना दूसरे बच्चे से करने के बजाय उसके आज के प्रदर्शन की तुलना उसके पिछले प्रदर्शन से करनी चाहिए। यदि उसने कल की अपेक्षा आज थोड़ा भी बेहतर किया है तो यह उसके लिए उपलब्धि है।
बच्चों को निर्णय लेने के छोटे-छोटे अवसर देना भी आत्मविश्वास बढ़ाने का प्रभावी तरीका है। जैसे वह कौन-सी किताब पढ़ना चाहता है, कौन-सा खेल खेलना चाहता है, कौन-से कपड़े पहनना चाहता है या खाली समय में कौन-सी गतिविधि करना चाहता है। शुरुआत में दो या तीन सरल विकल्प दिए जा सकते हैं। जब बच्चा स्वयं निर्णय लेता है तो उसमें जिम्मेदारी, स्वतंत्रता और अपने प्रति विश्वास विकसित होता है।
परिवार और शिक्षकों को बच्चे की कमियों पर लगातार ध्यान केंद्रित करने के बजाय उसकी क्षमताओं और रुचियों को पहचानना चाहिए। कोई बच्चा पढ़ाई में कमजोर हो सकता है, लेकिन चित्रकला, संगीत, खेल, हस्तकला, कंप्यूटर, बागवानी या दैनिक जीवन के कार्यों में बेहतर हो सकता है। उसकी रुचि को प्रोत्साहित करके उसे ऐसी गतिविधियों से जोड़ा जाए, जिनमें वह सफलता का अनुभव कर सके। सफलता का यही अनुभव धीरे-धीरे दूसरे क्षेत्रों में भी आत्मविश्वास बढ़ाता है।
विशेष बच्चों को आवश्यकता से अधिक संरक्षण देना भी उचित नहीं है। कई बार माता-पिता प्रेम और चिंता के कारण बच्चे के छोटे से छोटे काम भी स्वयं करने लगते हैं। इससे बच्चा दूसरों पर निर्भर हो सकता है। जहां तक संभव हो, उसे अपनी क्षमता के अनुसार काम स्वयं करने दिया जाए। गलती होने पर डांटने के बजाय उसे दोबारा प्रयास करने के लिए प्रेरित किया जाए। असफलता को सीखने की प्रक्रिया का हिस्सा समझाना जरूरी है।
शिक्षक की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। कक्षा में ऐसा वातावरण होना चाहिए जहां बच्चे को अपनी बात कहने, प्रश्न पूछने और गतिविधियों में भाग लेने में झिझक महसूस न हो। उसकी गलती पर उपहास नहीं, बल्कि सहयोग मिलना चाहिए। शिक्षक उसकी छोटी प्रगति को भी पहचानें और उसे ऐसी जिम्मेदारियां दें जिन्हें वह सफलतापूर्वक निभा सके।
अंततः विशेष बच्चों में आत्मविश्वास किसी एक दिन में पैदा नहीं होता। यह परिवार के विश्वास, शिक्षक के सहयोग, सकारात्मक भाषा, स्वतंत्रता के अवसर और लगातार प्रोत्साहन से विकसित होता है। जब हम बच्चे को उसकी कमियों से नहीं, बल्कि उसकी क्षमताओं और संभावनाओं से पहचानते हैं, तब वह स्वयं भी अपनी ताकत को पहचानना शुरू करता है। यही आत्मविश्वास उसे आत्मनिर्भर, प्रसन्न और सम्मानपूर्ण जीवन की ओर ले जाने की मजबूत नींव बन सकता है।
— काउंसलर कंचन मेहता

