न्यू दिल्ली से पत्रकार ऊषा माहना की कलम से
हंसो और हंसना सिखाओ — शोर नहीं, जीवन की एक मधुर ध्वनि
प्रमोद कुमार अग्रवाल

न्यू दिल्ली 04 अप्रैल
हंसी केवल एक भाव नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक सशक्त कला है। “हंसो और हंसना सिखाओ” — यह केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि एक संदेश है, जो जीवन को सहज और सुंदर बनाने की दिशा दिखाता है।
हंसी किसी योजना का परिणाम नहीं होती, यह तो एक स्वाभाविक अनुभूति है — जैसे गहरी और सुकून भरी सांस। दिन में यदि एक-दो बार खुलकर हंस लिया जाए और किसी और के चेहरे पर मुस्कान ला दी जाए, तो यह मन और मस्तिष्क दोनों को ताजगी से भर देती है।
हंसी में अद्भुत शक्ति होती है। यह न केवल दिमाग को ‘रीसेट’ कर देती है, बल्कि हमारे आपसी रिश्तों में भी मधुरता घोल देती है। जहां तनाव होता है, वहां हंसी एक पुल का काम करती है, जो दिलों को जोड़ देती है।
यह जीवन को थकने नहीं देती, बल्कि उसमें नई ऊर्जा का संचार करती है — जैसे सूखे पौधे को पानी मिलते ही वह फिर से हरा-भरा हो उठता है। हंसी कोई शोर नहीं, बल्कि भीतर जलती हुई एक शांत और उज्ज्वल लौ है, जो अंधकार को दूर करती है।
जब जीवन की राह में थकान महसूस होती है, तब यही हंसी हमें थाम लेती है और आगे बढ़ने का साहस देती है।
आज के इस भागदौड़ भरे जीवन में संदेश स्पष्ट है — हंसते रहिए, और दूसरों को भी हंसाइए। क्योंकि यही छोटी-सी आदत जीवन को सरल, सुंदर और आनंदमय बना सकती है।
अंततः, हंसी केवल एक क्रिया नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक सच्ची कला है।

