संपादकीय

पश्चिम एशिया में बढ़ते युद्ध और उससे उत्पन्न वैश्विक तेल संकट के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा देशवासियों से ईंधन की बचत, अनावश्यक विदेशी यात्राओं से परहेज, सोने की खरीद कम करने तथा ‘वर्क फ्र ाम होम’ जैसी व्यवस्थाओं को अपनाने की अपील ने एक नई बहस को जन्म दे दिया है। प्रधानमंत्री का तर्क है कि ऐसे छोटे-छोटे कदम देश को विदेशी मुद्रा बचाने, आयात निर्भरता कम करने और आर्थिक स्थिरता बनाए रखने में मदद कर सकते हैं।
दूसरी ओर, लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने इसे सरकार की आर्थिक नीतियों की विफलता का संकेत बताते हुए कहा कि जनता से लगातार त्याग मांगना इस बात का प्रमाण है कि सरकार हालात संभालने में सफल नहीं रही। स्वाभाविक रूप से यह मुद्दा राजनीतिक बहस का विषय बन गया है। किंतु इस पूरे विवाद को केवल सत्ता और विपक्ष की दृष्टि से देखने के बजाय व्यापक राष्ट्रीय हित और व्यावहारिकता के आधार पर समझने की आवश्यकता है। यह सत्य है कि भारत आज भी अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा आयातित तेल पर निर्भर होकर पूरा करता है। पश्चिम एशिया में युद्ध या तनाव बढ़ते ही कच्चे तेल की कीमतें बढ़ जाती हैं, जिसका सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था, महंगाई और विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ता है। ऐसे समय में ईंधन की बचत, सार्वजनिक परिवहन का अधिक उपयोग, कारपूलिंग और अनावश्यक खर्चों में कटौती जैसी बातें केवल राजनीतिक नारे नहीं बल्कि आर्थिक विवेक का हिस्सा भी मानी जा सकती हैं। दुनिया के अनेक देशों में संकट के समय सरकारें नागरिकों से इसी प्रकार की अपील करती रही हैं।
लेकिन दूसरी ओर यह भी उतना ही महत्वपूर्ण प्रश्न है कि क्या केवल जनता से संयम की अपेक्षा पर्याप्त है? किसी भी लोकतंत्र में त्याग और अनुशासन की शुरुआत नेतृत्व से होनी चाहिए। यदि जनता से कहा जाए कि वे पेट्रोल-डीजल बचाएं, तो राजनीतिक दलों को भी अपने विशाल काफिलों, शक्ति प्रदर्शन वाली रैलियों और संसाधनों की अत्यधिक खपत पर नियंत्रण का उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए। यदि विदेशी यात्राओं को सीमित करने की सलाह दी जाती है, तो यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि सरकारी प्रतिनिधिमंडलों और नेताओं की अनावश्यक विदेश यात्राओं पर भी गंभीर समीक्षा हो। देश में अक्सर ऐसे आयोजन देखने को मिलते हैं जिनमें करोड़ों रुपये केवल भीड़ जुटाने, मंच सजावट, विज्ञापन और प्रचार पर खर्च हो जाते हैं। यह केवल किसी एक दल की बात नहीं है; लगभग सभी राजनीतिक दल समय-समय पर ऐसे प्रदर्शन करते रहे हैं। यदि वास्तव में राष्ट्रीय आर्थिक अनुशासन की आवश्यकता है, तो यह संदेश ऊपर से नीचे तक समान रूप से लागू होना चाहिए। जनता तभी प्रेरित होती है जब उसे नेतृत्व में ईमानदार उदाहरण दिखाई देता है।
सोने की खरीद कम करने की अपील भी आर्थिक दृष्टि से पूरी तरह निरर्थक नहीं कही जा सकती, क्योंकि भारत विश्व में सोने का सबसे बड़ा आयातक देशों में से एक है। भारी मात्रा में सोने का आयात विदेशी मुद्रा पर दबाव डालता है। लेकिन भारत जैसे समाज में सोना केवल विलासिता नहीं बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक परंपरा और मध्यम वर्ग की सुरक्षा भावना से भी जुड़ा हुआ है। इसलिए ऐसी अपीलों को आदेश या नैतिक दबाव के रूप में नहीं बल्कि जागरूकता और विवेक के रूप में प्रस्तुत करना अधिक उचित होगा। असल प्रश्न यह नहीं है कि प्रधानमंत्री सही हैं या विपक्ष। असली प्रश्न यह है कि क्या भारत आने वाले वैश्विक आर्थिक संकटों के लिए स्वयं को तैयार कर पा रहा है? क्या हम ऊर्जा आत्मनिर्भरता, वैकल्पिक ईंधन, सार्वजनिक परिवहन, स्थानीय उत्पादन और सादगीपूर्ण जीवनशैली की दिशा में गंभीरता से बढ़ रहे हैं? यदि नहीं, तो केवल राजनीतिक बयानबाजी से समस्या का समाधान नहीं होगा।
आज आवश्यकता संतुलित दृष्टिकोण की है। सरकार को केवल अपीलों तक सीमित न रहकर ऐसी नीतियां बनानी होंगी जो ऊर्जा बचत को व्यवहारिक और सुविधाजनक बनाएं। वहीं विपक्ष को भी हर मुद्दे को केवल तंज और राजनीतिक अवसर के रूप में देखने के बजाय रचनात्मक सुझाव देने चाहिए। देश आर्थिक रूप से मजबूत तभी बनेगा जब संयम केवल जनता के लिए उपदेश न होकर शासन, राजनीति और समाज-सभी के आचरण का हिस्सा बने। लोकतंत्र में सबसे प्रभावी संदेश भाषणों से नहीं बल्कि उदाहरणों से जाता है।
सुरेंद्र भाटिया

