# विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के साथ त्योहार मनाएं, खुशियां बांटें और मानसिक सुकून पाएं

*लेखिका : काउंसलर कंचन मेहता*
*एम.ए. मनोविज्ञान*
त्योहार केवल रोशनी, मिठाइयों, नए वस्त्रों और उत्सवों का नाम नहीं हैं, बल्कि प्रेम, संवेदनशीलता, सामाजिक एकता और खुशियां बांटने का अवसर भी हैं। हमारे समाज में विशेष आवश्यकता वाले बच्चे और दिव्यांग व्यक्ति भी समान सम्मान, प्रेम और खुशियों के अधिकारी हैं। आवश्यकता इस बात की है कि हम त्योहारों के अवसर पर उन्हें याद करें, उनके साथ समय बिताएं और उन्हें यह एहसास कराएं कि वे हमारे समाज का अभिन्न हिस्सा हैं।
### मनोविज्ञान की दृष्टि से खुशियां बांटने का महत्व
सकारात्मक मनोविज्ञान के अनुसार दूसरों की सहायता करना, उनके साथ भावनात्मक संबंध बनाना और खुशियां साझा करना व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव डाल सकता है। जब कोई व्यक्ति विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के साथ त्योहार मनाता है, उनसे बातचीत करता है, उनके साथ खेलता है या उन्हें स्नेह देता है, तो बच्चों में अपनापन और सुरक्षा की भावना विकसित होती है। वहीं ऐसा करने वाले व्यक्ति को भी आत्मसंतुष्टि, प्रसन्नता और जीवन में सार्थकता का अनुभव हो सकता है।
### विशेष बच्चों को दया नहीं, सम्मान और अपनापन चाहिए
विशेष आवश्यकता वाले बच्चों को केवल सहानुभूति या उपहारों की आवश्यकता नहीं होती। उन्हें समाज में समान भागीदारी, सम्मान, मित्रता और भावनात्मक स्वीकार्यता चाहिए। जब सामान्य विकास वाले बच्चे उनके साथ बैठकर मिठाई खाते हैं, चित्र बनाते हैं, गीत गाते हैं या खेलते हैं, तो सामाजिक दूरी कम होती है। इससे दिव्यांग बच्चों का आत्मविश्वास बढ़ सकता है और दूसरे बच्चों में संवेदनशीलता तथा सहयोग की भावना विकसित होती है।
### खुशियां देने वाला भी होता है खुश
मनोविज्ञान में परोपकारी व्यवहार को मानसिक प्रसन्नता से जोड़ा जाता है। दूसरों की खुशी में भागीदार बनने से व्यक्ति को भावनात्मक संतोष मिलता है। विशेष बच्चों के चेहरे पर मुस्कान देखकर मन में सकारात्मक भावनाएं उत्पन्न हो सकती हैं। ऐसे अनुभव अकेलेपन और तनाव को कम करने तथा सामाजिक जुड़ाव बढ़ाने में सहायक हो सकते हैं। वास्तव में खुशियां बांटने से खुशी केवल प्राप्त करने वाले तक सीमित नहीं रहती, बल्कि देने वाला भी उसका आनंद अनुभव करता है।
त्योहारों को बनाएं समावेशी और संवेदनशील
दीपावली, होली, दशहरा और अन्य त्योहारों पर विशेष विद्यालयों तथा दिव्यांग बच्चों के परिवारों के साथ समय बिताने की परंपरा विकसित करनी चाहिए। आयोजन करते समय बच्चों की व्यक्तिगत आवश्यकताओं, सुविधाओं और इच्छाओं का सम्मान जरूरी है। तेज आवाज, भीड़ और अत्यधिक रोशनी कुछ बच्चों के लिए असुविधाजनक हो सकती है।
*त्योहार की सबसे सुंदर रोशनी वह है, जो किसी उपेक्षित चेहरे पर मुस्कान बनकर चमके। आइए, इस त्योहार पर केवल अपने घर नहीं, बल्कि विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के जीवन को भी प्रेम, सम्मान और अपनत्व से रोशन करें।*

