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क्या हम नींव मजबूत कर रहे हैं या बचपन पर बोझ डाल रहे हैं?

 
 क्या हम नींव मजबूत कर रहे हैं या बचपन पर बोझ डाल रहे हैं?

  डॉ. नितेश सिंह 
सहायक प्रोफेसर, एचओडी डिवीजन ऑफ 
प्लांट प्रोटेक्शन, फैकल्टी ऑफ एग्रीकल्चर साइंसेज,
एसजीटी विश्वविद्यालय,
 गुरुग्राम।

एक समय था जब स्कूल से घर लौटने के बाद बच्चे होमवर्क के साथ खेलते, दोस्तों और परिवार के साथ समय बिताते, किताबें पढ़ते और अपनी पसंद की गतिविधियों में शामिल होते थे। आज कई बच्चों के लिए स्कूल की घंटी दिन का अंत नहीं, बल्कि पढ़ाई के दूसरे दौर की शुरुआत है। स्कूल → होमवर्क → फाउंडेशन कोर्स → टेस्ट → कोचिंग → रिवीजन। बढ़ती प्रतिस्पर्धा और बच्चों के भविष्य की चिंता ने स्कूली स्तर पर फाउंडेशन कोर्स और प्रतियोगी परीक्षाओं की प्रारंभिक तैयारी को बढ़ावा दिया है। लेकिन सवाल है—क्या हम बच्चों की नींव मजबूत कर रहे हैं या कम उम्र में ही उन पर प्रतियोगिता का बोझ डाल रहे हैं?
फाउंडेशन कोर्स गलत नहीं, लेकिन दबाव क्यों?
फाउंडेशन कोर्स गणित और विज्ञान की अवधारणाओं को मजबूत करने, सीखने की कमियों को दूर करने और समस्या-समाधान क्षमता विकसित करने में मदद कर सकते हैं। कुछ विद्यार्थियों के लिए अतिरिक्त शैक्षणिक सहायता उपयोगी भी है। समस्या तब शुरू होती है जब कोचिंग आवश्यकता से बढ़कर सामाजिक अपेक्षा बन जाती है। सुबह स्कूल, उसके बाद दो-तीन घंटे कोचिंग और फिर घर पर होमवर्क व रिवीजन। सप्ताहांत भी टेस्ट में निकल जाए तो बच्चे के पास खेलने, पढ़ने, परिवार के साथ समय बिताने, संगीत-कला सीखने या प्रकृति को समझने का समय कितना बचता है? बचपन कोई अतिरिक्त गतिविधि नहीं है; यह व्यक्तित्व निर्माण का महत्वपूर्ण समय है।
पढ़ाई जब तुलना बन जाए "कितने नंबर आए?", "किस कोचिंग में जा रहे हो?", "तुम्हारे दोस्त ने तो तैयारी शुरू कर दी है"—लगातार ऐसे सवाल बच्चों को यह महसूस करा सकते हैं कि उनकी पहचान केवल अंकों और रैंक से तय होती है। प्रतिस्पर्धा मेहनत के लिए प्रेरित कर सकती है, लेकिन शिक्षा को स्थायी दौड़ बनाना उचित नहीं है। बच्चे अपनी रुचियां और क्षमताएं समय के साथ पहचानते हैं। आज विज्ञान में रुचि रखने वाला विद्यार्थी कल साहित्य, कृषि, डिजाइन, खेल, उद्यमिता या सामाजिक विज्ञान की ओर भी जा सकता है। खुद को खोजने में लगाया गया समय कभी व्यर्थ नहीं होता।

 नींव की शुरुआत स्कूल से हो 

यदि फाउंडेशन का उद्देश्य बुनियादी समझ मजबूत करना है, तो इसकी पहली जिम्मेदारी स्कूलों की भी है। कक्षा में केवल पाठ्यक्रम पूरा करने के बजाय अवधारणात्मक समझ, प्रयोगशाला कार्य, प्रोजेक्ट, चर्चा, पठन, समस्या-समाधान, खेल, कला और अनुभवात्मक शिक्षा पर जोर होना चाहिए। जिन विद्यार्थियों को अतिरिक्त सहायता चाहिए, उन्हें वह मिले। लेकिन हर बच्चे को भविष्य का आईआईटी या मेडिकल अभ्यर्थी मान लेना आवश्यक नहीं है।
कोचिंग सहयोगी व्यवस्था होनी चाहिए, दूसरा स्कूल नहीं।
कक्षा XII से पहले मजबूत बुनियादी ज्ञान और अच्छी अध्ययन आदतें जरूरी हैं, लेकिन बुनियाद मजबूत करना और गहन प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी शुरू करना एक ही बात नहीं है। आगे चलकर विद्यार्थी अपनी रुचि और करियर लक्ष्य के अनुसार विशेषज्ञ तैयारी का विकल्प चुन सकते हैं।

 दबाव कॉलेज तक भी पहुंचता है 

स्कूल के बाद दबाव समाप्त नहीं होता। स्नातक स्तर पर अच्छे अंक, असाइनमेंट, प्रोजेक्ट, इंटर्नशिप, प्रमाणपत्र, तकनीकी और संचार कौशल तथा प्लेसमेंट की अपेक्षाएं जुड़ जाती हैं। फिर सवाल आता है—"ग्रेजुएशन के बाद क्या करोगे?" स्कूल में तुलना अंकों की होती है, कॉलेज में इंटर्नशिप, पैकेज और उपलब्धियों की। सोशल मीडिया इस तुलना को और बढ़ा सकता है, क्योंकि वहां सफलता दिखाई देती है, संघर्ष और असफलताएं नहीं। शिक्षा की यात्रा कई बार ऐसी बन जाती है— स्कूल → फाउंडेशन → प्रतियोगी तैयारी → स्नातक → प्रमाणपत्र → परीक्षा → प्लेसमेंट। महत्वाकांक्षा और तैयारी गलत नहीं हैं। सवाल यह है कि क्या विद्यार्थियों को यह समझने का समय मिल रहा है कि वे वास्तव में क्या करना चाहते हैं?


 माता-पिता और समाज की भूमिका 

माता-पिता "कितने नंबर आए?" के साथ यह भी पूछें—"आज क्या सीखा?", "क्या अच्छा लगा?", "क्या कठिन लगा?" दूसरों की देखा-देखी बच्चे को कोचिंग भेजना जरूरी नहीं है।
डर को शिक्षा की रणनीति नहीं  बनना चाहिए।
समाज को भी सफलता की परिभाषा व्यापक करनी होगी। डॉक्टर और इंजीनियर के साथ शिक्षक, वैज्ञानिक, शोधकर्ता, किसान, कलाकार, डिजाइनर, उद्यमी और कुशल पेशेवर भी समाज के लिए महत्वपूर्ण हैं। सफलता के अनेक रास्ते हैं।

 असली फाउंडेशन क्या है? 

असली नींव केवल सूत्र, तथ्य और परीक्षा तकनीक नहीं है। उसमें जिज्ञासा, आत्मविश्वास, रचनात्मकता, संवाद, अनुशासन, धैर्य, शारीरिक स्वास्थ्य, भावनात्मक परिपक्वता और स्वतंत्र सोच भी शामिल हैं। यदि बच्चा सैकड़ों प्रश्न हल कर सकता है, लेकिन सवाल पूछने से डरता है, तो क्या उसकी नींव वास्तव में मजबूत है? हमें बच्चों को आईआईटी और मेडिकल कॉलेजों के लिए तैयार करना चाहिए, लेकिन आईआईटी और मेडिकल कॉलेजों को उनके बचपन का केंद्र नहीं बनाना चाहिए। बच्चों को खेलने, पढ़ने, सवाल पूछने, असफल होने और स्वयं को खोजने का अवसर दें। मजबूत नींव बच्चे के दिन का हर घंटा भर देने से नहीं बनती। वह ज्ञान, अवसर, मार्गदर्शन और स्वयं विकसित होने के लिए मिले पर्याप्त समय से बनती है।