हरियाणा की राजनीति में अनिल विज की अनोखी मिसाल छह दशक के इतिहास में पहले कैबिनेट मंत्री, जिन्होंने नहीं ली सरकारी कोठी
साढ़े 11 वर्षों से बिना सरकारी आवास निभा रहे मंत्री पद की जिम्मेदारी, रोज अंबाला से चंडीगढ़ का सफर

चंडीगढ़।
हरियाणा के गठन के बाद पिछले लगभग छह दशकों में प्रदेश की राजनीति में मंत्री बनते ही सरकारी कोठी लेना लगभग परंपरा बन चुकी है। सत्ता के गलियारों में मंत्री बनने के साथ ही चंडीगढ़ के सेक्टर-5, सेक्टर-7 और सेक्टर-16 स्थित सरकारी आवासों की चर्चा शुरू हो जाती है। मुख्यमंत्री आवास के आसपास स्थित ये कोठियां लंबे समय से सत्ता, वरिष्ठता और प्रभाव का प्रतीक मानी जाती रही हैं। अधिकांश मंत्री इन्हें अपनी प्राथमिकता मानते हैं, लेकिन हरियाणा की राजनीति में एक ऐसा भी नाम है जिसने इस परंपरा से बिल्कुल अलग राह चुनी।
ऊर्जा, परिवहन एवं श्रम मंत्री अनिल विज पिछले साढ़े 11 वर्षों से लगातार कैबिनेट मंत्री हैं, लेकिन उन्होंने आज तक न तो मंत्री की सरकारी कोठी ली और न ही एमएलए फ्लैट का उपयोग किया। वे प्रतिदिन अंबाला छावनी से चंडीगढ़ आकर अपने विभागों का कार्य निपटाते हैं और शाम को वापस अपने विधानसभा क्षेत्र लौट जाते हैं। हरियाणा गठन के बाद यह पहला अवसर माना जा रहा है जब कोई वरिष्ठ कैबिनेट मंत्री इतने लंबे समय तक बिना सरकारी आवास के अपनी जिम्मेदारियां निभा रहा है।
तीन सरकारें बदलीं, मंत्री पद कायम रहा, लेकिन नहीं बदला जीवन का तरीका
वर्ष 2014 में हरियाणा में पहली बार भारतीय जनता पार्टी ने पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई। उस सरकार में अनिल विज वरिष्ठ कैबिनेट मंत्री बने। इसके बाद वर्ष 2019 और फिर वर्ष 2024 में भी वे लगातार मंत्री रहे। तीन अलग-अलग कार्यकालों में महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी संभालने के बावजूद उन्होंने कभी सरकारी कोठी लेने की इच्छा व्यक्त नहीं की।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि हरियाणा की राजनीति में यह एक असाधारण उदाहरण है, जहां सत्ता के सर्वोच्च स्तर पर पहुंचने के बाद भी किसी मंत्री ने सरकारी आवास को अपनी प्राथमिकता नहीं बनाया।
जनता के बीच रहना ही सबसे बड़ी ताकत मानते हैं विज
अनिल विज का मानना है कि जनप्रतिनिधि की सबसे बड़ी पहचान जनता के बीच उसकी निरंतर मौजूदगी होती है। यही सोच उनके जीवन और कार्यशैली में भी दिखाई देती है। उन्होंने चंडीगढ़ में स्थायी निवास बनाने के बजाय अपने विधानसभा क्षेत्र अंबाला छावनी को ही अपनी राजनीतिक और सामाजिक गतिविधियों का केंद्र बनाए रखा।
आज भी उनकी दिनचर्या वर्षों पुरानी परंपरा की तरह ही है। सुबह अंबाला से चंडीगढ़ पहुंचना, मंत्रालय और विभागों के कार्यों का निपटारा करना तथा शाम को वापस अपने क्षेत्र लौट जाना उनकी नियमित कार्यशैली का हिस्सा है।
37 वर्ष की उम्र में शुरू हुआ विधायक बनने का सफर
अनिल विज का राजनीतिक जीवन संघर्ष और जनसेवा से शुरू हुआ। 27 मई 1990 को सातवीं हरियाणा विधानसभा की दो रिक्त सीटों पर हुए उपचुनाव में, जब ओम प्रकाश चौटाला मुख्यमंत्री थे, तब 37 वर्षीय अनिल कुमार विज पहली बार अंबाला छावनी से विधायक निर्वाचित हुए।
बैंक की नौकरी छोड़कर राजनीति में आए विज ने बहुत कम समय में अपनी अलग पहचान बनाई। आंदोलनों, जनहित के मुद्दों और संगठनात्मक कार्यों के कारण वे प्रदेश की राजनीति में तेजी से स्थापित हुए।
निर्दलीय जीत से लेकर भाजपा के वरिष्ठतम नेताओं में शुमार होने तक का सफर
अनिल विज का राजनीतिक जीवन कई उतार-चढ़ावों से गुजरते हुए आगे बढ़ा। वर्ष 1996 और 2000 के विधानसभा चुनाव उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में जीतकर अपने मजबूत जनाधार का परिचय दिया। वर्ष 2005 में वे मात्र 615 मतों से चुनाव हार गए।
इसके बाद वर्ष 2007 में उन्होंने "विकास परिषद" नाम से राजनीतिक दल का गठन किया। हालांकि उनकी वैचारिक निकटता भाजपा से बनी रही। वर्ष 2009 में भाजपा ने उन्हें पुनः उम्मीदवार बनाया और इसके बाद उन्होंने लगातार चार विधानसभा चुनाव—2009, 2014, 2019 और 2024—जीतकर नया राजनीतिक रिकॉर्ड बनाया। इसके साथ ही वे सातवीं बार विधायक बने और प्रदेश के सबसे वरिष्ठ जनप्रतिनिधियों में शामिल हो गए।
जनसंपर्क ही बना सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी
अनिल विज की राजनीति की सबसे बड़ी विशेषता उनका निरंतर जनसंपर्क माना जाता है। सत्ता मिलने के बाद भी उन्होंने आम लोगों से दूरी नहीं बनाई। अंबाला छावनी में वे आज भी नागरिकों, व्यापारियों, सामाजिक संगठनों और पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच सहज रूप से उपलब्ध रहते हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जनता से उनका सीधा संवाद और निरंतर संपर्क ही उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत है।
टी-प्वाइंट बना जनसंवाद का स्थायी मंच
अंबाला छावनी का प्रसिद्ध टी-प्वाइंट पिछले लगभग पांच दशकों से अनिल विज की राजनीतिक कार्यशैली का अभिन्न हिस्सा बना हुआ है। यहां वे नियमित रूप से लोगों से मिलते हैं, उनकी समस्याएं सुनते हैं और बिना किसी औपचारिकता के समाधान का प्रयास करते हैं।
महत्वपूर्ण बात यह है कि यह सिलसिला केवल चुनावी मौसम तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे वर्ष लगातार जारी रहता है।
सरकारी सुविधाओं से ऊपर रखा जनसेवा का भाव
ऐसे दौर में जब राजनीति में सरकारी सुविधाओं और सत्ता के प्रतीकों को विशेष महत्व दिया जाता है, अनिल विज का सरकारी कोठी और एमएलए फ्लैट से दूरी बनाए रखना उन्हें अलग पहचान देता है। उनका मानना है कि जनप्रतिनिधि की वास्तविक पहचान सरकारी आवास, सुरक्षा या सुविधाओं से नहीं, बल्कि जनता के विश्वास, उपलब्धता और निरंतर संवाद से बनती है।
हरियाणा की राजनीति में उनका यह निर्णय केवल व्यक्तिगत सादगी का उदाहरण नहीं, बल्कि जनप्रतिनिधि के दायित्व और जनता के प्रति समर्पण की एक अलग कार्यशैली के रूप में भी देखा जा रहा है।

