सिरसा का इतिहास : प्राचीन एवं आधुनिक सिरसा-14

इतिहास समाज को संस्कृति व विकास की जानकारी देता है
सिरसा नगर एक ऐतिहासिक नगर है। इतिहासकारों द्वारा समय-समय पर सिरसा के इतिहास के संबंधित अनेक दस्तावेजों को लिखा गया मगर सिरसा के इतिहास के संबंध में एक राय नहीं है कि यह नगर कब व किसने बसाया मगर अनेक इतिहासकारों का मानना है कि ईसा से १३०० वर्ष पूर्व राजा सरस ने सिरसा नगर की स्थापना की। कुछ लोगों का मानना है कि सरस्वती के किनारे होने के कारण इस नगर का नाम सिरसा रखा गया वहीं अनेक लोग बाबा सरसाईंनाथ की नगरी के रुप में सिरसा को जानते हैं मगर प्राचीन नगर के संबंध में अनेक मान्यताएं होने के बावजूद वर्तमान नगर १८३८ में अंग्रेज अधिकारी थोरबाये द्वारा बसाया गया तथा यह नगर जयपुर के नक्शे पर अंग्रेज अधिकारी द्वारा ८ चौपट 16 बाजार के स्थान पर ४ चौपट 8 बाजार स्थापित किए गए। सिरसा के इतिहास से जुड़े विभिन्न पहलुओं को लेकर पल पल के संपादक सुरेन्द्र भाटिया व मनोविज्ञानी डॉ. रविन्द्र पुरी द्वारा वर्ष २०१६ में प्राचीन एवं आधुनिक सिरसा नामक एक पुस्तक का लेखन किया गया। इस पुस्तक का विमोचन हरियाणा के मुख्यमंत्री श्री मनोहर लाल १३ फरवरी २०१६ को चंडीगढ़ में किया गया। पुस्तक की प्रस्तावना नागरिक परिषद के अध्यक्ष व उस समय मुख्यमंत्री के राजनीतिक सलाहकार श्री जगदीश चोपड़ा द्वारा लिखी गई। इसके अतिरिक्त पूर्व मंत्री स्व. श्री जगदीश नेहरा द्वारा सिरसा तब व अब नामक एक लेख इस पुस्तक में शामिल किया गया। उनके अतिरिक्त नामधारी इतिहासकार चिंतक श्री स्वर्ण सिंह विर्क का एक लेख भी पुस्तक में प्रकाशित किया गया। प्रस्तुत है इस पुस्तक के विभिन्न अध्यायों को क्रमवार प्रकाशित किया जा रहा है।
आज के सिरसा की नींव
अंग्रेज शासकों ने इसे हरियाणा को दिल्ली डिविजन के अंतर्गत रखा और सिरसा का क्षेत्र हिसार जिले के अंतर्गत रखा गया। सिरसा को एक तहसील के रूप में मान्यता मिली और इसका मुखिया एक तहसीलदार को नियुक्त किया गया। 1837 में अंग्रेजों ने सिरसा और रानियां को हिसार से अलग करके भटियाना नाम का एक नया जिला बना दिया। इस समय इस क्षेत्र का नियंत्रण कैप्टन थोरस बे के हाथ में आ गया। यहां यह बताना आवश्यक है कि कैप्टन थोरस बे को ही वर्तमान सिरसा का निर्माता कहा जाता है। कैप्टन थोरस बे 1837 से लेकर 1839 तक इस क्षेत्र के सर्वेसर्वा रहे। इससे पूर्व बीकानेर और पटियाला के शासक सिरसा पर अपना हक जताने के लिए अंग्रेजों के दरबार में कई बार हाजिरी लगा चुके थे। उनका यह विवाद सुलझाने का जिम्मा भी कैप्टन थोरस बे के पास था। पटियाला के महाराजा कर्म सिंह और बीकानेर के महाराजा रतन सिंह बार-बार सिरसा क्षेत्र पर काबिज होने के लिए अपने-अपने संदेशवाहक भेज रहे थे। 1856 में अंग्रेजों द्वारा सिरसा के 26 गांवों को महाराजा पटियाला को सौंपने का फैसला लिया गया। 1812--1813, 1817-1818 और 1833-1834 के बीच सिरसा में पड़े भयावह अकाल ने इस क्षेत्र में रहने वाले लोगों का जीना मुश्किल कर दिया था। लोग जीने के लिए पेड़ की छालों को खाने तक मजबूर थे। इन वर्षों में यहां पर काबिज किसी भी राजा या सरदार ने लोगों की स्थिति को समझने की कोशिश नहीं की। सिरसा से फाजिल्का का क्षेत्र बेहद खरतरनाक होता जा रहा था। कोई भी व्यक्ति यहां से अकेला नहीं गुजर सकता था और यहां की यह स्थिति अंग्रेज शासकों के लिए मुश्किल पैदा कर रही थी क्योंकि वे इस क्षेत्र संसाधनों का दोहन करने में असफलता महसूस कर रहे थे, इसलिए अंग्रेजों ने 1843 में बीकानेर के महाराजा रतन सिंह को सिरसा क्षेत्र में सराय और मीनार बनाने के लिए निर्देश दिए। इस समय इस क्षेत्र में कुछ सराय और मीनार बनाई भी गई ताकि अंग्रेज व्यापारी इस क्षेत्र में आसानी से आवागमन कर सके। 1838 में कैप्टन थोरस बे ने फिर से इस क्षेत्र को रहने योग्य बनाने के लिए प्रयास आरंभ कर दिया। वे यहां का सामाजिक ताना बाना बदलना चाहते थे। उन्होंने आसपास के क्षेत्रों के लोगों से सिरसा में बसने के लिए प्रार्थना की। उस समय सिरसा में एक भी स्कूल नहीं था और यदि इस क्षेत्र में सामाजिक विकास करना था तो यहां पर व्यापारिक और शिक्षण संस्थाओं को बढ़ावा देना आवश्यक था। उधर दूसरी तरफ इंग्लैंड में औद्योगिक क्रांति हो चुकी थी और 18वीं शताब्दी में वहां के उद्योगों को कच्चा माल और बाद में बना हुआ माल बेचने के लिए बाजारों की आवश्यकता थी। चूंकि सिरसा क्षेत्र में गेहूं, चावल और कपास का भरपूर उत्पादन होने की संभावना थी इसलिए अंग्रेज इस क्षेत्र पर अपना विशेष ध्यान रखते थे। जब 1837 में कैप्टन थोरस बे ने इस क्षेत्र का नेतृत्व संभाला तो यहां के हालात बहुत उदासीपूर्ण थे। उन्होंने इसे एक शहर और एक जिला मुख्यालय के रूप में विकसित करने का प्रयास किया। उस समय कोई गांव नहीं था और लोग यहां पर न के बराबर रहते थे। उन्होंने इस क्षेत्र को संवारने के लिए दूसरे शहरों के व्यापारियों को यहां व्यापार धंधा शुरू करने के लिए प्रेरित करना शुरू कर दिया। सिरसा दुर्ग के पूर्व में काफी बड़ा हिस्सा जंगलों से भरा हुआ था। यहां पर पानी भी उपलब्ध था और पास के दुर्ग की पुरानी ईंटें भी काम में ली जा सकती थी। सबसे पहले उन्होंने इस क्षेत्र की सफाई करवाई और बाद में बांसों का सहारा लेकर गली, बाजारों और कुंओं की निशानदेही की। 1837-38 में इस क्षेत्र में वर्षा नहीं हुई। नतीजतन एक बार फिर से यह क्षेत्र अकाल की गिरफ्त में आ गया किंतु अंग्रेज अपने फायदे को लेकर इस क्षेत्र को विकसित करने के लिए अडिंग थे। उन्होंने सिरसा को फिर से बसाने के लिए 6000 रुपए का अनुदान भी दे दिया। सिरसा का एक नक्शा बनवाया गया जो 2800 स्केवर एकड़ में फैला हुआ था। शहर के 9 गेट बनवाए गए। गुद गेट जिसे अब रोड़ी गेट कहते है। लाहौरी गेट जिसे अब बंद गेट कहते हैं। भादरा और नोहर गेट, राजगढ़ गेट जो अब विद्यामान नहीं हैं। दिल्ली गेट जिसे अब हिसारिया गेट कहते हैं। सदर गेट और फोर्ट गेट (जो अब विद्यामान नहीं है) और रानियां गेट स्थापित कर दिया गया। शहर को कुल 9 सेक्टरों में बांट दिया गया। चारों तरफ पानी की व्यवस्था के लिए कुएं भी बनवाए गए। शहर में एक दूसरे को सीधे काटते हुए बाजारों की व्यवस्था रखी गई जो आज़ भी देखने को मिलती है। शहर की बड़ी और चौड़ी गलियों में व्यापारिक प्रतिष्ठान स्थापित किए गए और उनके पीछे की संकरी गलियों में लोगों के निवास थे। किले से निकली हुई ईंटों से सड़कें और गलियां बनवाई गई। पानी की व्यवस्था के लिए रानियां गेट पर बावड़ी बनवाई गई। सिरसा शहर का यह नक्शा देखकर लोगों को पिंक सिटी जयपुर की याद आ जाती है। पानी के संग्रह के लिए बहुत से तालाब बनवाए गए जैसे भादरा तालाब, बिच्छु साहिब तालाब, लक्खी तालाब, जोगी तालाब इत्यादि । भादरा तालाब के किनारों पर मंदिर वगैरह भी विकसित होने लगे। इसमें पुरुष और स्त्रियों के नहाने के लिए अलग-अलग घाट थे। सिरसा के दक्षिण क्षेत्र में पाना तालाब मुख्य रूप से पानी के लिए था। लेकिन सरस्वती नदी के लुप्त होने के बाद यह क्षेत्र भी वीरान रहने लगा। किंतु यहां पर देवी मंदिर, हनुमान मंदिर इत्यादि विकसित हो गए। जिन पर आज भी लोग श्रद्धा से माथा टेकने आते हैं। इस क्षेत्र में सिरसा के पूर्व में लक्खी तालाब बनवाया गया था जोकि लक्खी नाम के एक बंजारे व्यक्ति के नाम से प्रभावित है। गौरतलब है 1705-06 में सिख गुरु गोबिंद सिंह जी भी लक्खी तालाब के किनारे आकर रुके थे। दूसरी तरफ एक सूफी संत बिच्छी साहिब जिस तालाब के किनारे पर रहते थे, उसे बिच्छु तालाब के नाम से जाने जाना लगा। बाद में इस तालाब के स्थान पर नेहरू पार्क बनवाया गया जो आज भी सिरसा के आकर्षण का केंद्र है। कहा जाता है कि उस समय सिरसा में पानी निकासी की एक अद्भुत व्यवस्था बनवाई गई थी। जिसके चलते यहां बारिश में पानी का जमाव नहीं होता था। किंतु समयांतर में सिरसा के बाजार और गलियों को इस तरह से ऊंचा नीचा कर दिया कि अब शहर की पानी निकासी की व्यवस्था बेहद खराब हो गई ।

