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काउंसलर की आवश्यकता क्यों पड़ती है?

 
  काउंसलर की आवश्यकता क्यों पड़ती है?
बदलते सामाजिक ढांचे में मानसिक सहारे की बढ़ती जरूरत
आज के आधुनिक जीवन में मानसिक तनाव, अकेलापन और भावनात्मक समस्याएँ तेजी से बढ़ रही हैं। पहले समाज और परिवार की संरचना ऐसी थी कि व्यक्ति अपनी समस्याएँ परिवार के सदस्यों, रिश्तेदारों या मित्रों से साझा कर लेता था। संयुक्त परिवारों में दादा-दादी, चाचा-चाची, भाई-बहन और अन्य सदस्य होते थे, जिनसे बातचीत और सलाह मिल जाती थी। लेकिन समय के साथ संयुक्त परिवार टूटकर छोटे-छोटे एकल परिवारों में बदल गए। यही कारण है कि आज लोगों को अपनी मानसिक और भावनात्मक समस्याओं के समाधान के लिए काउंसलर की आवश्यकता महसूस होने लगी है।
संयुक्त परिवार के टूटने का सबसे बड़ा प्रभाव यह हुआ कि व्यक्ति अकेलापन महसूस करने लगा। पहले घर में कई लोग होते थे, जिनसे बातचीत करने पर मन हल्का हो जाता था। अब अधिकतर लोग अपने काम, नौकरी और व्यक्तिगत जीवन में इतने व्यस्त हो गए हैं कि एक-दूसरे के लिए समय ही नहीं निकाल पाते। परिणामस्वरूप व्यक्ति अपनी समस्याओं को मन के अंदर ही दबाकर रखने लगता है। जब मन की बातें किसी से साझा नहीं होतीं, तो धीरे-धीरे तनाव, चिंता और अवसाद बढ़ने लगते हैं। ऐसे समय में काउंसलर एक ऐसे व्यक्ति के रूप में सामने आता है जो बिना किसी पक्षपात के व्यक्ति की बात सुनता है और उसे सही दिशा देने की कोशिश करता है।
काउंसलर की आवश्यकता केवल पारिवारिक कारणों से ही नहीं होती, बल्कि जीवन की विभिन्न परिस्थितियाँ भी इसका कारण बनती हैं। जैसे नौकरी का दबाव, आर्थिक समस्याएँ, रिश्तों में तनाव, पढ़ाई का दबाव, असफलता का डर या सामाजिक अपेक्षाएँ। इन परिस्थितियों में कई लोग मानसिक रूप से अस्थिर महसूस करने लगते हैं। जब व्यक्ति को यह समझ नहीं आता कि वह अपनी समस्या का समाधान कैसे करे, तब काउंसलिंग एक सहायक माध्यम बन जाती है।
कई बार काउंसलर की आवश्यकता के कुछ स्पष्ट लक्षण भी दिखाई देते हैं। उदाहरण के लिए, परिवार में बैठा हुआ व्यक्ति चुप रहता है और किसी से बातचीत नहीं करता। वह उदास दिखाई देता है और सामान्य गतिविधियों में उसकी रुचि कम हो जाती है। कई बार वह मन ही मन में बहुत कुछ सोचता रहता है, लेकिन अपनी बात किसी से साझा नहीं करता। ऐसा व्यक्ति अपने दर्द और परेशानियों को अंदर ही अंदर दबाकर रखने की कोशिश करता है और समाज के सामने भी सामान्य दिखने का प्रयास करता है।
इसके अतिरिक्त, नींद न आना, छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा आना, किसी काम में मन न लगना, लगातार चिंता में रहना या भविष्य को लेकर अत्यधिक भय महसूस करना भी ऐसे संकेत हो सकते हैं कि व्यक्ति को काउंसलिंग की आवश्यकता है। यदि समय रहते इन संकेतों को समझ लिया जाए और उचित मार्गदर्शन मिल जाए, तो कई मानसिक समस्याओं से बचा जा सकता है।
इस प्रकार काउंसलर केवल समस्या का समाधान देने वाला व्यक्ति नहीं होता, बल्कि वह एक ऐसा मार्गदर्शक होता है जो व्यक्ति को स्वयं को समझने, अपने विचारों को संतुलित करने और जीवन में सकारात्मक दिशा खोजने में मदद करता है। आज के बदलते सामाजिक ढांचे में काउंसलिंग की आवश्यकता इसलिए भी बढ़ गई है क्योंकि यह व्यक्ति को मानसिक संतुलन बनाए रखने और बेहतर जीवन जीने की प्रेरणा देती है।

लेखक: कंचन मेहता
सीडीएलयू, सिरसा