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अगर बच्चा जिद करे तो क्या करें अभिभावक

 
 अगर बच्चा जिद करे तो क्या करें अभिभावक
 छोटे बच्चों का जिद करना माता-पिता के लिए अक्सर चिंता और परेशानी का कारण बन जाता है। लेकिन मनोविज्ञान के अनुसार 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों का जिद करना (Tantrum) उनके सामान्य विकास का एक हिस्सा है। इस उम्र में बच्चे अपनी इच्छाओं और भावनाओं को व्यक्त करना सीख रहे होते हैं, परंतु उन्हें अपनी भावनाओं को नियंत्रित करना अभी पूरी तरह नहीं आता। इसलिए अभिभावकों को चाहिए कि वे बच्चों की जिद को समझदारी, धैर्य और प्रेम के साथ संभालें, न कि डांट-डपट या कठोर व्यवहार से।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जब बच्चा जिद करे तो माता-पिता स्वयं शांत रहें। यदि अभिभावक गुस्सा करेंगे या चिल्लाने लगेंगे तो बच्चा और अधिक उत्तेजित हो सकता है। शांत स्वर में बच्चे से बात करना उसे सुरक्षित और समझा हुआ महसूस कराता है। कई बार बच्चे भूख, थकान या ध्यान की कमी के कारण भी जिद करने लगते हैं। इसलिए पहले यह समझना जरूरी है कि बच्चा आखिर जिद क्यों कर रहा है। यदि अभिभावक बच्चे से कहें—“मुझे पता है तुम्हें यह चीज चाहिए, लेकिन अभी यह संभव नहीं है”—तो बच्चा धीरे-धीरे अपनी भावनाओं को समझना सीखता है।
बच्चों के पालन-पोषण में स्पष्ट सीमाएँ (Boundaries) भी बहुत जरूरी होती हैं। हर जिद को पूरा कर देना बच्चे को यह सिखा देता है कि रोकर या जिद करके वह अपनी बात मनवा सकता है। इसलिए यदि किसी बात के लिए “ना” कहना आवश्यक है, तो उसे प्यार से लेकिन दृढ़ता के साथ कहना चाहिए। साथ ही माता-पिता का व्यवहार भी एक-सा होना चाहिए। कभी “हाँ” और कभी “ना” कहने से बच्चा भ्रमित हो जाता है।
छोटे बच्चों का ध्यान जल्दी बदल जाता है, इसलिए जिद के समय ध्यान भटकाने की तकनीक भी काफी प्रभावी होती है। जैसे ही बच्चा जिद शुरू करे, उसे किसी खेल, कहानी या नई गतिविधि में लगा दिया जाए। इससे उसका ध्यान जिद से हटकर किसी सकारात्मक काम में लग सकता है।
अच्छे व्यवहार की प्रशंसा करना भी बहुत महत्वपूर्ण है। जब बच्चा बिना जिद किए अच्छा व्यवहार करता है तो उसकी तारीफ करनी चाहिए। इससे बच्चे को यह संदेश मिलता है कि अच्छा व्यवहार करने पर उसे सकारात्मक प्रतिक्रिया मिलती है। इसी तरह बच्चे को छोटे-छोटे विकल्प देना भी उपयोगी होता है। उदाहरण के लिए, “तुम लाल खिलौना लोगे या नीला?” इससे बच्चे को लगता है कि वह भी निर्णय का हिस्सा है और उसकी जिद कम हो सकती है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बच्चे को समय, प्यार और संवाद मिले। कई बार बच्चे केवल माता-पिता का ध्यान पाने के लिए जिद करते हैं। यदि अभिभावक रोज कुछ समय बच्चे के साथ खेलें, उससे बातचीत करें और उसे महत्व दें, तो उसका व्यवहार अधिक संतुलित और सकारात्मक बन सकता है।
इस प्रकार धैर्य, प्रेम, स्पष्ट नियम और सकारात्मक संवाद के माध्यम से अभिभावक बच्चों की जिद को सही दिशा में बदल सकते हैं और उनके स्वस्थ व्यक्तित्व के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

कंचन मेहता 

दिशा सिरसा