महज कागजों में नहीं, अपनेपन के वास्तविक धरातल पर दिखाई दिया 'अतिथि देवो भव' का जज्बा

मैंने भारत के बारे में सुन रखा था कि वहां मेहमान को भगवान माना जाता है। मुझ पर संकट आया और मुझे एक इंटरनेशनल कांफ्रेंस में आमंत्रित करने वाले एसजीटी विश्वविद्यालय ने हर स्तर पर मेरी मदद की।
यह कहना है आर्मेनिया के येरेवन विश्वविद्यालय में
रोमानियन लैंग्वेज इंस्टीट्यूट की स्पेशलिस्ट
डॉ. ऑरोरा मार्टिन का।
वह हाल ही में गुरुग्राम स्थित एसजीटी विश्वविद्यालय द्वारा विशेष एक इंटरनेशनल कांफ्रेंस में विशेष अतिथि के रूप में आमंत्रित की गई थीं।
डॉ. ऑरोरा मार्टिन ने विशेष बातचीत में बताया कि
विश्वविद्यालय में मेरी उपस्थिति “ चेंजिंग डायनामिक्स आफ इंडियाज नैरेटिव डिप्लोमेसी" विषय पर आयोजित सम्मेलन में
संभव हुई, जिसे डॉ. नंदिनी बसिष्ठ के सहयोग से आयोजित किया गया था। यह आयोजन हमारे समकालीन विश्व में हो रहे सामाजिक और बौद्धिक परिवर्तनों पर विचार-विमर्श का एक सशक्त मंच सिद्ध हुआ। उन्होंने कहा,साथ ही, मुझे एक ऐसे जीवंत अकादमिक समुदाय के साथ संवाद का अवसर मिला जो जिज्ञासा, खुलेपन और सार्थक विमर्श की प्रतिबद्धता से परिपूर्ण है।
इस यात्रा की एक विशेष उपलब्धि एसजीटी विश्वविद्यालय और ब्रूसोव स्टेट यूनिवर्सिटी के बीच समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर होना रहा। यह समझौता संस्थागत सहयोग को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है और इस साझा विश्वास को प्रतिबिंबित करता है कि अंतरराष्ट्रीय शैक्षणिक साझेदारियां ज्ञान के आदान-प्रदान, अंतर सांस्कृतिक समझ और छात्रों तथा शोधकर्ताओं के लिए नए अवसरों को बढ़ावा देने में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने बताया कि अपने प्रवास के दौरान मुझे स्कूल ऑफ ह्यूमैनिटीज, सोशल साइंसेज एंड लिबरल आर्ट्स में “जेंडर सिक्योरिटी” विषय पर पांच दिवसीय गहन प्रशिक्षण कार्यक्रम संचालित करने का अवसर भी मिला। इन सत्रों में छात्रों को महिलाओं की सुरक्षा के विभिन्न आयामों—व्यक्तिगत और पारिवारिक स्तर से लेकर सामुदायिक, राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर तक—पर विचार करने के लिए प्रेरित किया गया। साथ ही उन्हें यह समझने के लिए प्रोत्साहित किया गया कि सुरक्षित और समानतापूर्ण समाज के निर्माण में हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी क्या है।
इसके अतिरिक्त मुझे एमर्जिंग मीडिया, कम्युनिकेशन एंड फिल्म स्टडीज़ फैकल्टी में "राइट्स, जस्टिस, एक्शन फार आल वूमेन एंड गर्ल्स ” विषय पर व्याख्यान देने का भी अवसर प्राप्त हुआ। इस व्याख्यान में छात्रों ने यह विश्लेषण किया कि मीडिया, सोशल मीडिया, विज्ञापन और फिल्मों के माध्यम से महिलाओं के बारे में हानिकारक रूढ़िवादी धारणाएं किस प्रकार फैलती रहती हैं। साथ ही उन्होंने ऐसे स्थानीय समाधान खोजने पर भी गंभीर चर्चा की, जो इन नकारात्मक कथाओं को बदलने में सहायक हो सकते हैं।
छात्रों के साथ मेरी बातचीत अत्यंत प्रभावशाली और यादगार रही। उनकी बौद्धिक क्षमता, सामाजिक संवेदनशीलता और वास्तविक जीवन की चुनौतियों का समाधान खोजने की प्रतिबद्धता यह दर्शाती है कि एसजीटी विश्वविद्यालय में तैयार हो रही नई पीढ़ी अत्यंत संभावनाशील है। मुझे परिसर में आयोजित सांस्कृतिक गतिविधियों में भाग लेने का भी अवसर मिला, जिसने विश्वविद्यालय जीवन की जीवंतता और अकादमिक समुदाय की आत्मीयता को करीब से अनुभव करने का अवसर प्रदान किया। डॉ. ऑरोरा मार्टिन के मुताबिक
मेरी भारत यात्रा अनपेक्षित रूप से कुछ समय के लिए बढ़ गई, क्योंकि अप्रत्याशित भू-राजनीतिक परिस्थितियों के कारण मेरी वापसी की उड़ान रद हो गई थी। ऐसे चुनौतीपूर्ण समय में एसजीटी विश्वविद्यालय के नेतृत्व और प्रबंधन ने अत्यंत संवेदनशीलता और सहयोग की भावना का परिचय दिया। उन्होंने मेरे ठहरने की व्यवस्था पहले होटल और बाद में विश्वविद्यालय के अतिथि गृह में की तथा मेरी वापसी की उड़ान के बढ़े हुए खर्च का भी वहन किया।
मेरे अनुभव में भारतीय परंपरा का सुंदर वाक्य “अतिथि देवो भव” वास्तव में सार्थक सिद्ध हुआ—अर्थात अतिथि देवतुल्य होता है। साथ ही मैंने जी-20 के दृष्टिकोण “एक पृथ्वी, एक परिवार, एक भविष्य” की भावना को भी प्रत्यक्ष रूप से अनुभव किया, जो मेरे इस अनपेक्षित प्रवास के दौरान वास्तविकता बनकर सामने आई।
इस असाधारण आतिथ्य, उदारता और सद्भावना के लिए मैं एसजीटी विश्वविद्यालय के नेतृत्व, संकाय सदस्यों, कर्मचारियों और छात्रों के प्रति अपनी हार्दिक कृतज्ञता व्यक्त करती हूं। मुझे विश्वास है कि एसजीटी विश्वविद्यालय और ब्रूसोव स्टेट यूनिवर्सिटी के बीच यह साझेदारी आने वाले वर्षों में और मजबूत होगी तथा ज्ञान, सहयोग और अंतरसांस्कृतिक समझ के स्थायी सेतु का निर्माण करेगी।
यह यात्रा केवल एक पेशेवर कार्यक्रम नहीं थी, बल्कि इसने मुझे यह याद दिलाया कि जब विश्वविद्यालय संवाद, सहयोग और साझा सीखने के लिए अपने द्वार खोलते हैं, तो वे केवल शिक्षा ही नहीं देते—वे संस्कृतियों के बीच पुल भी बनाते हैं। और जहां पुल बनते हैं, वहीं भविष्य की संभावनाएं जन्म लेती हैं।
इसी भावना के साथ मेरी यह यात्रा एक सरल किंतु गहरी सच्चाई को पुनः स्थापित करती है—कि अनेक चुनौतियों के बावजूद हमारा विश्व अभी भी ज्ञान, गरिमा और आशा से जुड़ा एक वैश्विक समुदाय बन सकता है।
•डॉ. ऑरोरा मार्टिन
ब्रूसोव स्टेट यूनिवर्सिटी, येरेवन (आर्मेनिया) में
रोमानियन लैंग्वेज इंस्टीट्यूट की स्पेशलिस्ट
•संस्थापक – मोबाइल म्यूजियम ऑफ मॉडर्न डे स्लेवरी
•ग्लोबल चेयर फॉर इंटरकल्चरल डायलॉग,
जी 100 ग्लोबल वीमेन लीडर्स।

