आधुनिक पैरेंटिंग की चुनौतियाँ: क्या हम बच्चों की प्रगति में बाधा बन रहे हैं?
Mar 19, 2026, 20:57 IST

आज के समय में पैरेंट्स अपने बच्चों को बेहतर से बेहतर सुविधाएँ देना चाहते हैं। अच्छी शिक्षा, आधुनिक साधन और सुरक्षित माहौल देने में वे कोई कमी नहीं छोड़ते। लेकिन कई बार यही प्रयास अनजाने में बच्चों की मानसिक, भावनात्मक और सामाजिक विकास में रुकावट बन जाते हैं। आधुनिक पैरेंटिंग की कुछ आदतें बच्चों के आत्मविश्वास और स्वतंत्र सोच को प्रभावित कर रही हैं।
सबसे पहले बात करें अत्यधिक सुरक्षा (Overprotection) की। आजकल माता-पिता बच्चों को हर कठिनाई से बचाने की कोशिश करते हैं। वे चाहते हैं कि बच्चे को किसी भी तरह की परेशानी न हो, लेकिन यही सोच बच्चों को कमजोर बना देती है। जब बच्चे खुद छोटी-छोटी समस्याओं का सामना नहीं करते, तो वे जीवन की बड़ी चुनौतियों के लिए तैयार नहीं हो पाते।
दूसरी बड़ी समस्या है अत्यधिक अपेक्षाएँ (High Expectations)। कई पैरेंट्स अपने बच्चों से हर क्षेत्र में श्रेष्ठ प्रदर्शन की उम्मीद करते हैं—चाहे वह पढ़ाई हो, खेल हो या अन्य गतिविधियाँ। यह दबाव बच्चों में तनाव और चिंता पैदा करता है। वे असफलता से डरने लगते हैं और उनका आत्मविश्वास धीरे-धीरे कम हो जाता है।
तीसरी समस्या है डिजिटल डिवाइस का बढ़ता उपयोग। आज के समय में मोबाइल, टीवी और टैबलेट बच्चों की दिनचर्या का हिस्सा बन चुके हैं। व्यस्त माता-पिता अक्सर बच्चों को शांत रखने के लिए उन्हें स्क्रीन के हवाले कर देते हैं। इसका असर यह होता है कि बच्चे वास्तविक दुनिया से दूर होते जाते हैं، उनकी रचनात्मकता और सामाजिक कौशल प्रभावित होते हैं।
इसके अलावा, तुलना करने की आदत भी एक बड़ी समस्या है। जब माता-पिता अपने बच्चों की तुलना दूसरे बच्चों से करते हैं, तो इससे बच्चों में हीन भावना विकसित होती है। हर बच्चा अलग होता है, उसकी अपनी क्षमताएँ और रुचियाँ होती हैं। तुलना करने से बच्चा खुद को कमतर समझने लगता है।
एक और महत्वपूर्ण पहलू है संवाद की कमी (Lack of Communication)। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में माता-पिता बच्चों के साथ पर्याप्त समय नहीं बिता पाते। वे बच्चों की बातों को सुनने और समझने की बजाय केवल निर्देश देने पर ध्यान देते हैं। इससे बच्चों और माता-पिता के बीच भावनात्मक दूरी बढ़ने लगती है।
अंततः, यह समझना जरूरी है कि अच्छी पैरेंटिंग का मतलब केवल सुविधाएँ देना नहीं, बल्कि बच्चों को सही मार्गदर्शन देना भी है। बच्चों को स्वतंत्रता देना, उनकी भावनाओं को समझना और उन्हें अपनी गलतियों से सीखने का मौका देना बहुत जरूरी है। जब माता-पिता संतुलन बनाकर चलते हैं, तभी बच्चे आत्मनिर्भर, आत्मविश्वासी और सफल बन पाते हैं।
— लेखिका: कंचन मेहता, दिशा, सिरसा
मनोविज्ञान में स्नातकोत्तर
सबसे पहले बात करें अत्यधिक सुरक्षा (Overprotection) की। आजकल माता-पिता बच्चों को हर कठिनाई से बचाने की कोशिश करते हैं। वे चाहते हैं कि बच्चे को किसी भी तरह की परेशानी न हो, लेकिन यही सोच बच्चों को कमजोर बना देती है। जब बच्चे खुद छोटी-छोटी समस्याओं का सामना नहीं करते, तो वे जीवन की बड़ी चुनौतियों के लिए तैयार नहीं हो पाते।
दूसरी बड़ी समस्या है अत्यधिक अपेक्षाएँ (High Expectations)। कई पैरेंट्स अपने बच्चों से हर क्षेत्र में श्रेष्ठ प्रदर्शन की उम्मीद करते हैं—चाहे वह पढ़ाई हो, खेल हो या अन्य गतिविधियाँ। यह दबाव बच्चों में तनाव और चिंता पैदा करता है। वे असफलता से डरने लगते हैं और उनका आत्मविश्वास धीरे-धीरे कम हो जाता है।
तीसरी समस्या है डिजिटल डिवाइस का बढ़ता उपयोग। आज के समय में मोबाइल, टीवी और टैबलेट बच्चों की दिनचर्या का हिस्सा बन चुके हैं। व्यस्त माता-पिता अक्सर बच्चों को शांत रखने के लिए उन्हें स्क्रीन के हवाले कर देते हैं। इसका असर यह होता है कि बच्चे वास्तविक दुनिया से दूर होते जाते हैं، उनकी रचनात्मकता और सामाजिक कौशल प्रभावित होते हैं।
इसके अलावा, तुलना करने की आदत भी एक बड़ी समस्या है। जब माता-पिता अपने बच्चों की तुलना दूसरे बच्चों से करते हैं, तो इससे बच्चों में हीन भावना विकसित होती है। हर बच्चा अलग होता है, उसकी अपनी क्षमताएँ और रुचियाँ होती हैं। तुलना करने से बच्चा खुद को कमतर समझने लगता है।
एक और महत्वपूर्ण पहलू है संवाद की कमी (Lack of Communication)। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में माता-पिता बच्चों के साथ पर्याप्त समय नहीं बिता पाते। वे बच्चों की बातों को सुनने और समझने की बजाय केवल निर्देश देने पर ध्यान देते हैं। इससे बच्चों और माता-पिता के बीच भावनात्मक दूरी बढ़ने लगती है।
अंततः, यह समझना जरूरी है कि अच्छी पैरेंटिंग का मतलब केवल सुविधाएँ देना नहीं, बल्कि बच्चों को सही मार्गदर्शन देना भी है। बच्चों को स्वतंत्रता देना, उनकी भावनाओं को समझना और उन्हें अपनी गलतियों से सीखने का मौका देना बहुत जरूरी है। जब माता-पिता संतुलन बनाकर चलते हैं, तभी बच्चे आत्मनिर्भर, आत्मविश्वासी और सफल बन पाते हैं।
— लेखिका: कंचन मेहता, दिशा, सिरसा
मनोविज्ञान में स्नातकोत्तर

