राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक स्वयंसेवी सघठन की राष्ट्र सेवा एवं साधना की शत वर्षी यात्रा

भूपेन्द्र धर्माणी,पूर्व राज्य सूचना आयुक्त
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की 100 वर्ष की यात्रा त्याग, तपस्या, सेवा और संगठन शक्ति की एक असाधारण कहानी है। यह उन लाखों गुमनाम स्वयंसेवकों के प्रयासों का परिणाम है जिन्होंने निस्वार्थ भाव से राष्ट्र को सर्वोपरि रखा। संघ का लक्ष्य स्पष्ट है—भारत को विश्वगुरु के स्थान पर प्रतिष्ठित करना, जहाँ सभी मत-पंथों का सम्मान हो, समाज समरस हो और देश आत्मनिर्भरता के शिखर पर पहुँचे।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) विश्व के सबसे बड़े स्वयंसेवी संगठनों में से एक हैI इस संगठन ने अपनी स्थापना के सौ वर्षों में देश के सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक परिदृश्य पर एक अमिट छाप छोड़ी है। 27 सितंबर 1925 को विजयादशमी के अवसर पर डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने महाराष्ट्र के नागपुर में इसकी स्थापना की थी। संघ की यह यात्रा केवल एक संगठन का विस्तार नहीं, बल्कि 'व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण' के एक विचार की दृढ़ साधना रही है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की स्थापना का मूल उद्देश्य हिंदू समाज का संगठन और चरित्र निर्माण के माध्यम से राष्ट्र को परम वैभव पर ले जाना है।संघ (आरएसएस) के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के बचपन से ही विचार देशभक्ति और क्रांतिकारी थे। उन्होंने कलकत्ता में मेडिकल की पढ़ाई के दौरान अनुशीलन समिति जैसी क्रांतिकारी संस्थाओं में सक्रिय भूमिका निभाई। अनुशीलन समिति भारत के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान बंगाल में सक्रिय एक प्रमुख गुप्त, क्रांतिकारी संगठन थी। इसकी स्थापना 1902 में कलकत्ता में सतीश चंद्र बसु की प्रेरणा से हुई थी। 'अनुशीलन' का शाब्दिक अर्थ है 'चिंतन' या 'अभ्यास'।
अनुशीलन समिति शुरुआत में एक फिटनेस सोसायटी के रूप में उभरी, लेकिन इसका मुख्य उद्देश्य युवाओं को मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक रूप से मजबूत बनाकर तत्कालीन अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भूमिका निभाना था Iअरबिंदो घोष, बरिंद्र कुमार घोष, जतिंद्रनाथ बनर्जी और खुदीराम बोस जैसे महान क्रांतिकारी इससे जुड़े थे। अनुशीलन समिति ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में एक महत्वपूर्ण और प्रेरणादायक अध्याय लिखा।
स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेते हुए डॉ. हेडगेवार जेल भी गए। इसी दौरान डॉ. हेडगेवार ने यह अनुभव किया कि देश की स्वतंत्रता और एकता के लिए चरित्र निर्माण और हिंदू समाज का संगठन अत्यंत आवश्यक है। इसी उद्देश्य को लेकर उन्होंने 1925 में दशहरे के दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की स्थापना की। अपने अंतिम समय तक वे संघ के पहले सरसंघचालक रहे, और संगठन को एक मजबूत नींव दी।
आरंभ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में दैनिक शाखाओं के माध्यम से स्वयंसेवकों को शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक प्रशिक्षण दिया गया, जिससे एक अनुशासित और समर्पित कार्यकर्ता समूह तैयार हुआ । स्वतंत्रता के बाद संघ ने खुद को केवल शाखाओं तक सीमित नहीं रखा, बल्कि समाज के विभिन्न क्षेत्रों में योगदान दिया।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने अपनी स्थापना के सौ वर्षों में देश के सामाजिक, सांस्कृतिक निस्वार्थ सेवा और राजनीतिक परिदृश्य पर एक अमिट छाप छोड़ी है। भारतीय समाज में राष्ट्रीय स्वाभिमान की कमी और सामाजिक बिखराव को दूर कर ब्रिटिश दासता से मुक्ति के साथ-साथ, हिंदू समाज को एकजुट, अनुशासित और संस्कारित करने का अत्यंत आवश्यक कार्य किया है ताकि राष्ट्र एक सशक्त इकाई के रूप में खड़ा हो सके। संघ का मूल उद्देश्य एक चरित्रवान स्वयंसेवक तैयार करना है। इसी विचार के साथ 'शाखा' की अनूठी कार्यपद्धति विकसित हुई, जहाँ शारीरिक व्यायाम, खेल, देशभक्ति गीत और बौद्धिक चर्चाओं के माध्यम से स्वयंसेवकों को राष्ट्र के प्रति समर्पित किया जाता है।
डॉ. हेडगेवार के पश्चात माधव सदाशिव गोलवलकर 'गुरुजी' ने संघ के विचार को वैचारिक गहराई दी और इसका व्यापक विस्तार किया। उन्होंने स्वयंसेवकों को राष्ट्र सेवा का अर्थ केवल राजनीतिक गतिविधि में भाग लेना नहीं, बल्कि समाज के हर क्षेत्र में योगदान देना सिखाया। उनके नेतृत्व में, संघ का कार्य देश के कोने-कोने तक पहुँचा।गुरुजी ने भारतीय राष्ट्रवाद की सांस्कृतिक अवधारणा को सुदृढ़ किया।
संघ की इस 100 वर्षों की यात्रा में कई चुनौतियाँ भी आईं। यह कालखंड संघ के वैचारिक और सांगठनिक विस्तार के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण रहा और स्वयंसेवकों को यह सिखाया कि राष्ट्र सेवा का अर्थ समाज के हर क्षेत्र में योगदान देना है।
इस यात्रा में संघ को जिन दो बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ा:
• महात्मा गांधी की हत्या के बाद प्रतिबंध (1948): गांधीजी की हत्या के बाद संघ पर प्रतिबंध लगा दिया गया। स्वयंसेवकों ने शांतिपूर्ण सत्याग्रह किया। बाद में, तत्कालीन गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल के साथ हुए संवाद के बाद 1949 में प्रतिबंध हटा लिया गया।
• आपातकाल में लोकतंत्र की रक्षा (1975-1977): इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपातकाल के दौरान, संघ ने लोकतंत्र की बहाली के लिए एक बड़ा और संगठित भूमिगत आंदोलन चलाया। लाखों स्वयंसेवकों ने जेल यातनाएँ सहीं और इस संघर्ष ने संघ को राष्ट्रीय स्तर पर एक मजबूत संगठन के रूप में स्थापित किया। इसी आंदोलन ने संघ की संगठनात्मक क्षमता और राष्ट्र के प्रति समर्पण को सिद्ध किया। इसी दौरान संघ के अनेक विरोधी भी संघ से पृभावित हुए और संघ के कार्यकर्ताओं के अनुशासन, देशभक्ति , शांतिपूर्ण जनांदोलन की क्षमता की सरहाना करने लगे I
इन चुनौतिओं के साथ संघ के कार्य की सराहना भी राष्ट्रीयस्त्तर पर अनेक बार हुई।
- राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की गणतंत्र दिवस परेड में भागीदारी की एक ऐतिहासिक घटना 1963 में हुई थी। 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान स्वयंसेवकों द्वारा किए गए उत्कृष्ट नागरिक सेवा कार्यों से प्रभावित होकर, तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने RSS को गणतंत्र दिवस परेड में शामिल होने के लिए आधिकारिक रूप से आमंत्रित किया था।
यह निमंत्रण राष्ट्रीय सुरक्षा प्रयासों में संघ के योगदान के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन का प्रतीक था। उस वर्ष, 3,000 से अधिक गणवेशधारी स्वयंसेवकों ने राजपथ (वर्तमान कर्तव्य पथ) पर मार्च किया था। इस घटना को संघ की राष्ट्रीय स्वीकृति और राष्ट्र निर्माण में उसकी भागीदारी के प्रमाण के रूप में देखा जाता है। यह परेड इतिहास में नागरिक एकजुटता के एक महत्वपूर्ण क्षण के रूप में दर्ज है।
- दूसरी घटना 1965 के भारत-पाक युद्ध के दौरान, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने नागरिक सहयोग और स्वयंसेवा के माध्यम से देश के युद्ध प्रयासों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
उस समय के प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री ने युद्ध के दौरान देश की आंतरिक व्यवस्था बनाए रखने में मदद के लिए RSS के सरसंघचालक, श्री गुरुजी (एम.एस. गोलवलकर) को सर्वदलीय बैठक में आमंत्रित किया था। गुरुजी ने सरकार को हर प्रकार से पूर्ण सहयोग का आश्वासन दिया और संघ के स्वयंसेवकों ने युद्ध के 22 दिनों के दौरान, दिल्ली में यातायात नियंत्रण जैसे आवश्यक नागरिक कार्यों का जिम्मा संभाला, जिससे पुलिसकर्मी सीमा सुरक्षा और अन्य महत्वपूर्ण रक्षा कर्तव्यों के लिए मुक्त हो सके।
इसके अलावा, घायल जवानों के लिए रक्तदान करने वालों में संघ के स्वयंसेवक सबसे आगे थे। कुछ रिपोर्टों के अनुसार, स्वयंसेवकों ने सीमावर्ती क्षेत्रों में सेना को भोजन और अन्य आवश्यक सामग्री पहुंचाने में भी सहायता की।
-आपातकाल में लोकतंत्र की रक्षा (1975-1977): इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपातकाल के दौरान, संघ ने लोकतंत्र की बहाली के लिए एक बड़ा और संगठित भूमिगत आंदोलन चलाया। लाखों स्वयंसेवकों ने जेल यातनाएँ सहीं और इस संघर्ष ने संघ को राष्ट्रीय स्तर पर एक मजबूत संगठन के रूप में स्थापित किया। इसी आंदोलन ने संघ की संगठनात्मक क्षमता और राष्ट्र के प्रति समर्पण को सिद्ध किया। इसी दौरान संघ के अनेक विरोधी भी संघ से पृभावित हुए और संघ के कार्यकर्ताओं के अनुशासन, देशभक्ति , शांतिपूर्ण जनांदोलन की क्षमता की सरहाना करने लगे I
संघ ने सेवा कार्य और सामाजिक समरसता पर विशेष जोर दिया है । उनका नारा : "जाति-पाति छोड़ो, हिंदू एक हो"। संघ ने स्पष्ट रूप से अस्पृश्यता को राष्ट्रीय पाप घोषित किया और सामाजिक समानता के लिए गाँव-गाँव में सेवा कार्य शुरू किए है ।
आज संघ ने विभिन्न क्षेत्रों में अनुषांगिक संगठनों का व्यापक जाल बिछाया है :
• सेवा: सेवा भारती के माध्यम से देश भर में लाखों सेवा प्रकल्प चलाए जा रहे हैं, खासकर गरीबों, वंचितों और वनवासी क्षेत्रों में स्वास्थ्य, शिक्षा और स्वावलंबन के लिए।
• शिक्षा: विद्या भारती के अंतर्गत हजारों स्कूल खोले गए, जो भारतीय मूल्यों और संस्कृति पर आधारित शिक्षा दे रहे हैं।
• आपदा प्रबंधन: संघ के स्वयंसेवकों ने भूकंप, बाढ़, और अन्य प्राकृतिक आपदाओं में हमेशा सबसे पहले पहुंचकर निस्वार्थ राहत कार्यों से समाज में संघ के प्रति विश्वास को बढ़ाया।
संघ का कार्य वैश्विक दृष्टि से आगे बढ़ रहा है। संघ अब केवल एक राष्ट्रीय संगठन नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता के मूल्यों का प्रतिनिधित्व करने वाला एक वैश्विक आंदोलन बन चुका है। भारतीय राजनीति में भारतीय जनता पार्टी (BJP) के माध्यम से इसके वैचारिक प्रभाव को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। संघ के कार्यकर्त्ता अटल जी ,अब नरेंदर मोदी जी ने संघ शिक्षित कारकार्ताओ की कार्य क्षमता का लोहा मनवाया है और अपनी अलग पहचान पर्शासन और शासन पर स्थापित की।
वर्तमान शताब्दी वर्ष में संघ ने पाँच मुख्य परिवर्तन लाने का संकल्प लिया है, जो उसके भविष्य के रोडमैप को दर्शाते हैं:
1.कुटुंब प्रबोधन: परिवार में संस्कारों और आत्मीयता को पुनर्जीवित करना।
2.सामाजिक समरसता: जातिगत भेदभाव को पूर्णतः समाप्त कर समरस समाज बनाना।
3.पर्यावरण संरक्षण: जल, जंगल और जमीन की रक्षा करना।
4.स्वदेशी आचरण: आत्मनिर्भरता और देश में बनी वस्तुओं के उपयोग को बढ़ावा देना।
5.नागरिक कर्तव्य बोध: हर नागरिक को अपने अधिकारों से पहले कर्तव्यों के प्रति जागरूक करना।
आज, संघ की लगभग 80,000 से अधिक दैनिक शाखाएँ और लाखों स्वयंसेवक न केवल भारत में बल्कि 40 से अधिक देशों में सक्रिय हैं। सेवा कार्यों में लगभग १ लाख २९ हजार सेवा कार्य चल रहे हैं। आज संघ के ३२ से भी अधिक संघठन विभिन क्षेत्रों में सक्रीय हैं। इनमे प्रमुख हैं अखिल भारतीय विधार्थी परिषद, विद्या भारती, भारतीय मज़दूर संघ, वनवासी कल्याण आश्रम, सेवा भारती, संस्कार भारती, सवदेशी जागरण मंच, लघु उद्योग भारती,भारतीय किसान संघ, प्रज्ञा पृवाह जैसे स्वायत, स्वतंतर, स्वावलम्बी संगठनो के माध्यम से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) अनादि राष्ट्र चेतना का एक नया और पवित्र अवतार,व्यक्ति निर्माण हेतु 'मैं' से 'हम' की यात्रा कर रहा है । संघ का विराट उद्देश्य राष्ट्र निर्माण रहा है । इसके लिए उसने व्यक्ति निर्माण,त्याग, निःस्वार्थ सेवा, राष्ट्र निर्माण हेतु अनुशासन,त्याग की अद्भुत मिसाल प्रस्तुत की है। शताब्दी वर्ष मैं संघ द्वारा लिए गए संकलप सिधि तक पहुंचे यही शुभकामनाये है ।
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