'रामानुजन के गणित को राष्ट्रीय शिक्षा नीति का हिस्सा बनाया जाना चाहिए'

विरासत व भविष्य की पीढ़ियों के लिए गणित व उससे आगे तक की प्रेरणा- विषय पर श्री गुरु गोबिंद सिंह ट्राई सेंटेनरी यूनिवर्सिटी (एसजीटीयू) में आज से आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में देश- विदेश के शीर्ष चिंतकों ने गणित में रामानुजन के असाधारण योगदान को राष्ट्रीय शिक्षा नीति में शामिल किए जाने की आवश्यकता और अनिवार्यता बताई। दो दिवसीय इस सम्मेलन में रामानुजन की प्रतिभा को पहचानने में इतनी देरी होने पर आश्चर्य मिश्रित अफसोस जताया गया। वक्ताओं का कहना था भारतीय ज्ञान परंपरा के दम पर ही देश 2047 तक विकसित राष्ट्र और विश्व गुरु बन सकता है। देश को बदलना है तो शिक्षा को बदलना होगा। रामानुजन ने भारतीय गणित ज्ञान परंपरा की दुनिया में डंका बजाया लेकिन चिराग तले अंधेरे की तरह उन्हें अपनी ही मातृभूमि पर बिसरा दिया गया।
एसजीटी विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. (डॉ.) हेमंत वर्मा के नेतृत्व में यह सम्मेलन शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास और एसोसिएशन ऑफ इंडियन यूनिवर्सिटीज (एआईयू) के सहयोग व मुख्य संरक्षक एवं एसजीटीयू के कुलाधिपति पद्मश्री व पद्म भूषण राम बहादुर राय के मार्गदर्शन में किया गया।
अंतरराष्ट्रीय कांफ्रेंस
को डॉ अनिता शर्मा, प्रो (डॉ) पंकज मित्तल, डॉ अशोक कुमार अग्रवाल,
प्रो. दिनेश सिंह (पूर्व कुलपति, दिल्ली विश्वविद्यालय), प्रो. श्रीराम चौथाईवाले (राष्ट्रीय संयोजक, वैदिक गणित, शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास, नई दिल्ली) व डॉ. राकेश भाटिया तथाअन्य ने संबोधित किया।
शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास की स्कूल शिक्षा की नेशनल कन्वीनर डॉ अनिता शर्मा ने अपने संबोधन में रामानुजन के जीवन, गणित में उनकी साधना से संबंधित अनेक पहलुओं को छुआ। उन्होंने कहा कि गणित में रामानुजन के अहम योगदान की पहचान हो, विविध पहलुओं पर शोध व अनुसंधान किया जा जाए। रामानुजन के
'इन्क्लूजन' पर आधारित मैथ के सूत्र, प्रमेह, फार्मूलों का प्रमाणीकरण आज पूरा विश्व कर रहा है, उनके मैथ पर दुनिया भर में अनुसंधान हो रहा है। उन्होंने बताया कि रामानुजन की 138 पेजों की नोट बुक पांच दशकों तक 'लोस्ट नोट बुक' बनी रही यानी किसी को उसका पता ही चला। इस नोट बुक में हजारों नए फार्मूले थे।
अनिता शर्मा ने प्रोफेसर जार्ज ई एंड्रयूज व प्रोफेसर ब्रूस सी बर्न्ट के बारे में बताया जिन्होंने यह नोट बुक ढूंढ़ने और दुनिया तक रामानुजन की विलक्षण गणितीय प्रतिभा सामने लाने में अहम भूमिका निभाई।
पंजाब यूनिवर्सिटी, चंडीगढ़ के डॉ अशोक कुमार अग्रवाल ने रामानुजन की लास्ट डिस्कवरी 'द मॉक थेटा फंक्शन' पर विस्तार से बताया।
शिक्षा, संस्कृति उत्थान न्यास के राष्ट्रीय सचिव अतुल कोठारी ने इस आयोजन के लिए एसजीटीयू प्रबंधन की प्रशंसा की। उन्होंने बताया कि शिक्षा, संस्कृति उत्थान न्यास के प्रयासों से आज एक हजार से अधिक स्थानों पर रामानुजन का जन्म दिन (22 दिसंबर) राष्ट्रीय गणित दिवस के रूप में मनाया जाता है। उन्होंने रामानुजन के अल्पायु में निधन को देश का दुर्भाग्य बताया। उन्होंने कहा कि यदि वह कुछ और वर्ष जीवित रहते तो भारत सूचना एवं प्रसारण क्षेत्र का विश्व गुरु होता।
रामानुजन ने 13 वर्ष की उम्र में रिसर्च शुरू कर दिया, 15 साल में फार्मूलों पर नोटबुक लिख ली, 16 साल का होने पर सूत्र हल कर लिये थे।
सत्र के दौरान गणमान्य अतिथियों द्वारा सम्मेलन के 'एब्स्ट्रैक्ट बुक' का औपचारिक लोकार्पण किया गया।
मुख्य भाषण डीयू के पूर्व कुलपति प्रो. (डॉ.) दिनेश सिंह द्वारा ऑनलाइन माध्यम से दिया गया। अपने संबोधन में उन्होंने महान गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन के कार्यों से अपने व्यक्तिगत शैक्षणिक जुड़ाव को साझा किया और संख्या सिद्धांत तथा अभाज्य संख्याओं के क्षेत्र में रामानुजन के गहन योगदान पर प्रकाश डाला।
उन्होंने कहा कि रामानुजन अपने पूरे जीवन गणित के चिंतन में डूबे रहे और छात्रों व शोधकर्ताओं में भी इसी प्रकार की समर्पित अध्ययन-संस्कृति विकसित करने की आवश्यकता है। प्रो. सिंह ने शैक्षणिक संस्थानों से आह्वान किया कि वे विद्यार्थियों को कठोर शैक्षणिक शोध के लिए प्रेरित करें और पारंपरिक अकादमिक सीमाओं से आगे सोचने के लिए प्रोत्साहित करें, ताकि वे ज्ञान की उन्नति में सार्थक योगदान दे सकें।
कान्फ्रेंस के दौरान गणित क्षेत्र में असाधारण योग्यता रखने वाले दो मेधावी बच्चों,देविका त्रिपाठी और कृशव अग्रवाल को सम्मानित किया गया।
वैदिक गणित पर विशेष सत्र भी आयोजित हुए।
40 से अधिक शोधपत्र प्रस्तुतियों के लिए स्वीकृत किए गये तथा 10 आमंत्रित व्याख्यान और एक उच्चस्तरीय पैनल चर्चा भी आयोजित की गई।

