बचपन को बोझ नहीं, अवसर बनाइए

बाल मनोविज्ञान बताता है कि जीवन के पहले पाँच वर्ष बच्चे के व्यक्तित्व निर्माण के लिए सबसे महत्वपूर्ण होते हैं। इस अवधि में बच्चे का मस्तिष्क तेजी से विकसित होता है, परंतु यह विकास खेल, जिज्ञासा, बातचीत और अनुभवों के माध्यम से होता है, न कि पुस्तकों के बोझ से। प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिकों के अनुसार तीन वर्ष से पहले बच्चे को औपचारिक शिक्षा के दबाव में डालना उसके मानसिक और भावनात्मक विकास के लिए उचित नहीं माना जाता।
मनोविज्ञान के अध्यापकों का मानना है कि लगभग तीन से चार वर्ष की आयु में बच्चे को हल्के और खेल आधारित प्री-स्कूल वातावरण से परिचित कराया जा सकता है। यहां उद्देश्य पढ़ाई नहीं बल्कि सामाजिकता, भाषा और रचनात्मकता का विकास होना चाहिए। बच्चे को रंगों, कहानियों, गीतों और खेलों के माध्यम से सीखने का अवसर देना अधिक प्रभावी होता है।
इसी प्रकार बच्चों पर भारी स्कूल बैग का बोझ डालना भी चिंता का विषय है। विशेषज्ञों का कहना है कि छोटे बच्चों के बैग का वजन उनके शरीर के वजन का लगभग दस प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए। अत्यधिक बोझ न केवल उनकी रीढ़ की हड्डी पर प्रभाव डालता है बल्कि पढ़ाई के प्रति तनाव भी पैदा कर सकता है।
जहां तक दो वर्ष की आयु में ट्यूशन शुरू करने की बात है, अधिकांश मनोवैज्ञानिक इसे अनावश्यक मानते हैं। इतनी कम उम्र में बच्चे को ट्यूशन की नहीं बल्कि माता-पिता के साथ संवाद, खेल और स्नेह की आवश्यकता होती है। परिवार ही बच्चे का पहला विद्यालय होता है।
समाज के लिए सबसे महत्वपूर्ण निर्णय यह होना चाहिए कि बचपन को प्रतियोगिता का मैदान न बनाया जाए। शिक्षा का उद्देश्य केवल अंक प्राप्त करना नहीं बल्कि स्वस्थ, जिज्ञासु और संवेदनशील व्यक्तित्व का निर्माण करना है। यदि हम बच्चों को उनके स्वाभाविक बचपन के साथ सीखने का अवसर देंगे, तभी वे भविष्य में सचमुच सक्षम और आत्मविश्वासी नागरिक बन सकेंगे।
कंचन मेहता
मनोविज्ञान में स्नातकोत्तर
दिशा सिरसा

