अंतरराष्ट्रीय साझेदारी व राष्ट्रीय मनोबल को सुदृढ़ करने के लिए स्पष्ट व सुसंगत नैरेटिव जरूरी

'चेंजिंग डाइनैमिक्स ऑफ इंडियाज नैरेटिव' विषय पर आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के पहले दिन कई देशों व भारत के कई राज्यों से आए चिंतकों ने बदलते विश्व परिदृश्य में भारत की रीति-नीति, अवधारणा, फॉरेन पॉलिसी, फॉरेन प्रिंसिपल्स के स्टेटस व अपेक्षाओं पर गहन मंथन किया। फैकल्टी ऑफ ह्यूमैनिटीज, सोशल साइंसेज एंड लिबरल आर्ट्स द्वारा इंडियन काउंसिल ऑफ वर्ल्ड अफेयर्स के सहयोग तथा इंडियन काउंसिल ऑफ सोशल साइंस रिसर्च के प्रायोजन में आयोजित इस सम्मेलन की शुरुआत
"नैरेटिव डिप्लोमेसी:थ्योरी एंड प्रैक्सिस"विषय पर पैनल चर्चा से हुई, जिसने आगामी विमर्शों के लिए मजबूत वैचारिक आधार प्रस्तुत किया। डॉ. नंदिनी बसिष्ठ द्वारा संचालित इस सत्र में 21वीं सदी की कूटनीति में कथानक, धारणा-निर्माण और रणनीतिक संप्रेषण की बढ़ती भूमिका पर विस्तार से विचार किया गया। वक्ताओं ने रेखांकित किया कि आज राष्ट्र केवल पारंपरिक शक्ति-राजनीति से नहीं, बल्कि डिजिटल और विमर्शीय मंचों पर वैधता की प्रतिस्पर्धा के माध्यम से भी अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। कहानियां, प्रतीक और सांस्कृतिक स्मृति वैश्विक जनमत को आकार देने में निर्णायक भूमिका निभा रहे हैं।
सत्र में डिजिटल प्लेटफॉर्म, शैक्षणिक संस्थान, प्रवासी भारतीय नेटवर्क और मानवाधिकार विमर्श को वैश्विक धारणा-निर्माण का महत्वपूर्ण माध्यम बताया गया। यह भी कहा गया कि भारत की प्राचीन सभ्यतागत विरासत और सांस्कृतिक पूंजी उसे विशिष्ट कथानकात्मक बढ़त प्रदान करती है, किंतु प्रभावी अभिव्यक्ति के लिए अनुकूलनशीलता, विश्वसनीयता और नैतिक आधार अनिवार्य हैं। चर्चा ने सिद्धांत और व्यवहार के बीच सफल सेतु स्थापित करते हुए स्पष्ट किया कि नैरेटिव कूटनीति केवल बौद्धिक अवधारणा नहीं, बल्कि समकालीन रणनीतिक आवश्यकता भी है।
उद्घाटन सत्र ने औपचारिक गरिमा और गंभीर चिंतन के साथ सम्मेलन की दिशा निर्धारित की। कार्यक्रम का शुभारंभ ‘वंदे मातरम्’ की प्रस्तुति और दीप प्रज्वलन से हुआ, जो एकता और ज्ञान के प्रतीक हैं। विशिष्ट वक्ताओं—डॉ विजय चौथाईवाले, डॉ.अन्वेषा घोष और डॉ अरविंद कुमार—ने अपने संबोधनों में विश्वसनीय कथानक, मीडिया नैतिकता और सभ्यतागत आत्मविश्वास को भारत की वैश्विक छवि के निर्माण में अत्यंत महत्वपूर्ण बताया। वक्ताओं ने कहा कि भू-राजनीतिक परिवर्तन और डिजिटल तीव्रता के इस दौर में स्पष्ट और सुसंगत नैरेटिव अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों और राष्ट्रीय मनोबल को सुदृढ़ करने के लिए आवश्यक है।
इस अवसर पर संपादित पुस्तक “स्टोरीज, सोफ्ट पावर एंड स्ट्रेटेजी: इंडियाज नैरेटिव डिप्लोमेसी इन द 21 सेंचुरी” का लोकार्पण भी किया गया, जिसने कूटनीति के अध्ययन को अंतर्विषयी दृष्टिकोण से समृद्ध करने की अकादमिक प्रतिबद्धता को रेखांकित किया।
“द पावर ऑफ परसेप्शन: नैरेटिव डिप्लोमेसी एंड ऑपरेशन सिंदूर ” विषयक विशेष सत्र ने चर्चा को व्यावहारिक आयाम प्रदान किया। इस सत्र में वडोदरा से भाजपा सांसद हेमांग जोशी और प्रो. (डॉ.) हेमंत वर्मा के मध्य संवाद के माध्यम से यह स्पष्ट किया गया कि आज की रणनीतिक कार्रवाइयां सैन्य और डिजिटल, दोनों क्षेत्रों में समानांतर रूप से संचालित होती हैं। “ऑपरेशन सिंदूर” को एक सुरक्षा पहल के साथ-साथ प्रतीकात्मक रूप से प्रभावशाली घटना के रूप में प्रस्तुत किया गया, जिसने यह दर्शाया कि नामकरण, फ्रेमिंग और संप्रेषण किस प्रकार जनधारणा को प्रभावित करते हैं। यह सत्र ऑडियंस के सवालों के लिए भी खुला रखा गया था।
सत्र में ‘नैरेटिव संप्रभुता’ की अवधारणा पर बल देते हुए कहा गया कि किसी भी राष्ट्र के लिए अपनी दृष्टि को सक्रिय रूप से प्रस्तुत करना अनिवार्य है। साथ ही, राजनीतिक नेतृत्व, मीडिया और लोकतांत्रिक संस्थाओं की यह जिम्मेदारी बताई गई कि वे पारदर्शिता और रणनीतिक संप्रेषण के बीच संतुलन बनाए रखें। इसके उपरांत संबंधित विषयों पर तकनीकी सत्र आयोजित किए गए।
विशेष सत्र में एसीटी के कुलाधिपति पद्मश्री व पद्मभूषण राम बहादुर राय ने 'नैरेटिव' व 'सॉफ्ट पावर' शब्दों की सटीक व्याख्या व भावार्थ स्पष्ट करते हुए कहा कि जैसा हम सोचते हैं, वैसा ही बोल दें, ऐसा करने की आजादी 2014 के बाद भारत में है। उन्होंने कहा कि कि अब सरकार हर कार्य से पहले कड़ा होमवर्क करती है, इसीलिए दुनिया हमारी ओर देखती है। राम बहादुर राय ने महात्मा गांधी, सीआईए, इंदिरा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, चाउ एन लाइ, तिब्बत मामला ,पूर्व पीएम चंद्रशेखर
व योग आदि का अलग-अलग संदर्भों में जिक्र करते हुए विषयों की प्रासंगिकता, जवाबदेही प्रकाश डाला।
समग्र रूप से, सम्मेलन के पहले दिन की कार्यवाही ने यह स्थापित किया कि समकालीन कूटनीति में धारणा-निर्माण शक्ति का एक निर्णायक साधन बन चुका है।

