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अधिकारियों की मिलीभगत से खेला जाता है फर्जी फर्मों का खेल

कई विभागों के अधिकारियों की जेब में जाता है बेईमानी से कमाया गया पैसा
 
अधिकारियों की मिलीभगत से खेला जाता है फर्जी फर्मों का खेल

सिरसा, 20 नवंबर। फर्जी फर्मों का खेल एक झटके में व्यक्ति को करोड़पति और अरबपति बना देता है। सिरसा में ऐसे ही कई लोगों को फर्श से अर्श की ओर बढ़ते देखा गया है। फर्जी फर्मों का खेल यूं तो देशभर में खेला जा रहा है पर हरियाणा में सिरसा, सोनीपत और कैथल में यह खेल कुछ ज्यादा ही खेला जा रहा है।  इस खेल को कभी भी अकेला नहीं खेला जा सकता, आबकारी व कराधान विभाग, बैैंक वाले, जीएसटी वाले शामिल होते हैं जबकि जांच के नाम पर एक और खेल खेला जाता है तभी तो ऐसे लोगों के घर तक आंच नहीं पहुंच पाती। आबकारी एवं कराधान विभाग के कुछ भ्रष्ट अधिकारियों की अहम भूमिका होती है। ये  अधिकारी वेतन जरूर सरकारी खजाने से हासिल करते हैं पर काम फर्जी फर्मों के सरगनाओं के लिए करते हैं। कदम कदम पर इन्हें बचाने की कोशिश की जाती है। जब तक जांच अधिकारियों और फर्जी फर्म संचालकों की एक दूसरे पर  कृपा बनी रहती है खेल जारी रहता है। पर सरकार का हाथ न तो भ्रष्ट अधिकारियों की गिरेबां तक पहुंच पाता है और न ही फर्जी फर्मो के संचालकों तक। जितनी फर्म कागजों में सिरसा में दौड़ रही हैं उस हिसाब से सिरसा में एक भी बेरोजगार नहीं रहना चाहिए। सिरसा जिला में भले ही फर्जी फर्मों के खिलाफ कई केस दजे हुए हैं पर संख्या बहुत ज्यादा है। ऐेसे फर्म संचालकों को कौन बचा रहा है इसकी भी ईमानदारी से जांच होनी चाहिए, कम से कम भाजपा सरकार से तो ऐसी उम्मीद की जा सकती है। सिरसा में फर्जी फर्म संचालकों की संख्या कहीं ज्यादा है। जब भी कोई मामला प्रकाश में आता है जांच के नाम पर कुछ दिनों बाद उसे फाइलों में दफन कर दिया जाता है। आबकारी एवं कराधान विभाग सिरसा कार्यालय की अगर गहनता से जांच हो तो करोड़ों के खेल का पटाक्षेप हो सकता है।
फर्जी फर्म बनाकर करोड़ों रुपयों का टैक्स गबन करने के काले कारनामे की पोल खोलने का काम तत्तकालीन एसएसपी डॉ. अरुण सिंह ने किया था। एक डीएसपी के नेतृत्व में पूरे प्रकरण की जांच करने के लिए एसआईटी गठित हुर्ई थी। जिसमें  पहली बार आबकारी एवं कराधान विभाग के अधिकारी को भी शामिल किया गया ताकि फर्म बनाने और इसको प्रयोग करने बारे में सभी जानकारी पुलिस को मिल जाए। फर्जी फर्मों के खेल में सिरसा शहर के बड़े बड़े कारोबारियों के नाम सामने आए थे। उनके खिलाफ केस भी दर्ज हुए, मगर अभी तक पुलिस ने जांच में कुछ नहीं निकाला। केस की फाइल बंद ही पड़ी है। इसके अलावा कभी इन मामलों को गंभीरता से नहीं लिया गया, जब भी केस दर्ज किया गया हवलदार या एएसआई को जांच देकर फाइल को दबा दिया गया। अकेले सिरसा में 20 से अधिक फर्जी फर्म के मामले उजागर हो चुके हैं।
फर्जी फर्म मामलों में अब तक सेंटिंग का खेल करके जांच को दबाए बैठे सरगनाओं की मुश्किलें आज नहीं तो कल जरूर बढ़ेगी। अगर ईमानदारी से जांच ही करनी है तो इस गोरखधंधे में शामिल बैंकों की भी पड़ताल करनी होगी। यह करोडों रुपयों का कारोबार करना बिना बैंक की मिलीभगत के संभव ही नहीं है। सभी फर्जी फर्मों के बैंक खातों का रिकॉर्ड खंगालना होगा। वैसे देखा जाए तो फर्जी फ र्म संचालकों ने फर्जी फर्म के  ज्यादातर खाते प्राइवेट बैंकों में ही खुलवा रखे हैं। फर्जी फर्मों के संचालन में बैंक अधिकारियों ने भी पूरी भूमिका अदा की होती है। दूसरे के नाम से बनाई गई फर्म का बैंक अकाउंट फर्जी फर्मों के संचालक ही आपरेट करते हैं।  जिस व्यक्ति के नाम से फर्म बनी है, जिसके नाम से बैंक में खाता है। उसके खाते का संचालन दूसरा ही करता था। माना जा रहा है कि बैंक अधिकारियों की ओर से हस्ताक्षर तसदीक नहीं किए गए। खातों के हस्ताक्षर फर्जी फर्मों के जनक के ही चलते थे। बैंक अधिकारी लाखों की एफडी बटोरने के लिए नियमों को ताक पर धर देते थे। सिरसा में दर्जनभर से अधिक प्राइवेट बैंकों का कारोबार ही फर्जी फर्मों पर चला। जिसका खाता खोला गया उसकी पहचान ही बैंक ने नहीं की। केवल दस्तावेज के आधार ही खाता खोल दिया गया।
फर्जी फर्मों के मामले में सामने आया है कि कागजों में जो फर्म के मालिक थे, वह हकीकत में दुकान पर पानी पिलाने वाले, रसोइया, ड्राइवर, माली व अन्य गरीब लोग रहे। फर्जी फर्मों के इस खेल से सर्वाधिक चूना सरकार को लगा। फर्जी फर्म के नाम पर करोड़ों रुपये की खरीद की गई। खरीद पर टैक्स देय हुआ। वह टैक्स अदा नहीं किया गया। शहर के व्यापारियों के दो नंबर के माल को देश के किसी भी कोने में भेजने के लिए फर्जी फर्म के दस्तावेज का इस्तेमाल किया गया। माल की ट्रांजेक्शन के समय दस्तावेज होने पर यह वैध बने रहें, लेकिन टैक्स की अदायगी के समय फर्म गायब हो गई।

एक एक कमरे में अनेक फर्मों के कार्यालय:
पहले जांच के दौरान पता था कि फर्जी फर्मों के कार्यालय जहां पर दिखाए गए है वहां पर कोई कार्यालय नहीं है, किसी भी कालोनी में कार्यालय दिखा दिया गया और एक एक कमरे वाले कार्यालय में कई फर्मों के कार्यालय दिखाए गए। ये खेल बिना अन्य विभागों की भूमिका के नहीं खेला जा सकता। कहीं कालांवाली में सरिया मिल दिखाया गया तो कही पर कोई और बड़ा उद्योग।  कागजों में माल गुजरात भेजा जा रहा है, पैसा खाते में दिखाया फिर जीएसटी रिटर्न का खेल शुरू। बिना किसी जांच के कैसे पैसा खातों में पैसा डाल दिया जाता है। अब तक की गई जांच में क्या क्या हुआ। पैसा लेकर कौन कौन से जांच की फाइलों को पानी पिलाया गया। इसकी भी जांच होनी चाहिए। जिन कर्मचरियों के नाम पर फर्जी फर्म  खोली गई उन्हें भी न्याय मिलना चाहिए।

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